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राजस्थान के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में MBBS की 61% से ज्यादा सीटें खाली
Rajeshwari Nishad
5 Oct 2026 6:17 PM IST
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राजस्थान । राजस्थान में मेडिकल एडमिशन की तस्वीर इस बार चौंकाने वाली नजर आ रही है। एक तरफ सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की एक-एक सीट हासिल करने के लिए छात्रों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा रहती है, वहीं दूसरी तरफ राज्य के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में तीसरे राउंड की NEET UG काउंसलिंग के बाद भी बड़ी संख्या में सीटें खाली रह गई हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक निजी मेडिकल कॉलेजों में सामान्य कोटे की 61 प्रतिशत से अधिक एमबीबीएस सीटों पर अब तक एडमिशन नहीं हो पाया है।
सामने आए आंकड़ों के अनुसार राजस्थान के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में सामान्य कोटे की कुल 3336 एमबीबीएस सीटें हैं। तीसरे राउंड की काउंसलिंग के बाद इनमें से केवल 1275 सीटों पर ही एडमिशन हुआ है। यानी 2061 सीटें अभी भी खाली हैं। प्रतिशत के हिसाब से देखें तो करीब 61.78 प्रतिशत सीटें नहीं भर पाई हैं।
यह स्थिति इसलिए ज्यादा चर्चा में है क्योंकि मेडिकल की पढ़ाई के लिए हर साल बड़ी संख्या में छात्र NEET UG परीक्षा में शामिल होते हैं। सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट पाने के लिए उम्मीदवारों को कड़ी प्रतिस्पर्धा से गुजरना पड़ता है। अच्छी रैंक के बावजूद कई उम्मीदवारों को अपनी पसंद का सरकारी मेडिकल कॉलेज नहीं मिल पाता। इसके विपरीत प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में इतनी बड़ी संख्या में सीटों का खाली रह जाना मेडिकल एजुकेशन से जुड़े कई सवाल खड़े करता है।
सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों के बीच छात्रों की प्राथमिकता में बड़ा अंतर देखने को मिलता है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों की फीस आमतौर पर निजी संस्थानों के मुकाबले कम होती है। यही कारण है कि अधिकांश छात्र और उनके परिवार पहले सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश की कोशिश करते हैं। सरकारी सीट नहीं मिलने पर ही बड़ी संख्या में उम्मीदवार निजी कॉलेजों के विकल्प पर विचार करते हैं।
प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की पढ़ाई परिवार के लिए बड़ा आर्थिक फैसला हो सकती है। कोर्स कई वर्षों तक चलता है और इस दौरान ट्यूशन फीस के अलावा हॉस्टल, भोजन, किताबें तथा दूसरे खर्च भी जुड़ सकते हैं। ऐसे में परिवार प्रवेश लेने से पहले अपनी आर्थिक स्थिति और पूरे कोर्स पर होने वाले संभावित खर्च का आकलन करते हैं।
राजस्थान के निजी मेडिकल कॉलेजों में तीसरे राउंड के बाद भी 61.78 प्रतिशत सामान्य कोटे की सीटें खाली रहना इस बात की ओर ध्यान खींचता है कि केवल सीट उपलब्ध होना ही एडमिशन के लिए पर्याप्त नहीं है। उम्मीदवार कॉलेज का चुनाव करते समय फीस, स्थान, सुविधाएं, अस्पताल में मरीजों की संख्या, क्लीनिकल एक्सपोजर और दूसरे पहलुओं पर भी विचार कर सकते हैं।
NEET UG काउंसलिंग में उम्मीदवारों को उनकी रैंक, कैटेगरी, उपलब्ध सीट और भरी गई पसंद के आधार पर कॉलेज आवंटित किया जाता है। काउंसलिंग के अलग-अलग चरणों के दौरान सीटों की स्थिति बदलती रहती है। कई उम्मीदवार बेहतर विकल्प की उम्मीद में अगले राउंड तक इंतजार करते हैं, जबकि कुछ सीट मिलने के बाद भी निर्धारित प्रक्रिया पूरी नहीं करते। इससे सीटें दोबारा खाली हो सकती हैं।
राजस्थान में सामने आए आंकड़ों में सबसे ज्यादा ध्यान सामान्य कोटे की निजी एमबीबीएस सीटों की ओर गया है। कुल 3336 सीटों में केवल 1275 का भरना और 2061 का खाली रह जाना बड़ा अंतर है। तीसरे राउंड तक पहुंचने के बाद भी इतनी सीटें खाली रहना निजी मेडिकल शिक्षा की मांग और उसकी लागत के बीच अंतर की तरफ ध्यान खींचता है।
मेडिकल की पढ़ाई करने का सपना देखने वाले छात्रों के लिए सरकारी कॉलेज पहली पसंद होने के पीछे आर्थिक कारण महत्वपूर्ण होते हैं। एमबीबीएस एक लंबी अवधि का प्रोफेशनल कोर्स है। इसके बाद भी छात्रों को इंटर्नशिप, पोस्ट ग्रेजुएशन की तैयारी और आगे की मेडिकल ट्रेनिंग जैसे चरणों से गुजरना पड़ सकता है। ऐसे में स्नातक स्तर पर ही बहुत ज्यादा खर्च परिवारों के लिए चुनौती बन सकता है।
दूसरी तरफ प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के सामने सीटें भरने की चुनौती भी महत्वपूर्ण है। मेडिकल कॉलेज चलाने के लिए अस्पताल, लैब, फैकल्टी, लाइब्रेरी और दूसरे बुनियादी ढांचे पर बड़ा खर्च होता है। यदि बड़ी संख्या में सीटें खाली रहती हैं तो यह संस्थानों के लिए भी चिंता का विषय बन सकता है।
हालांकि तीसरे राउंड के बाद खाली सीटों का मतलब यह जरूरी नहीं है कि ये सभी सीटें अंतिम रूप से खाली ही रहेंगी। अगर नियमों के तहत आगे कोई काउंसलिंग या खाली सीटों को भरने की प्रक्रिया होती है तो इनमें से कुछ सीटों पर एडमिशन हो सकता है। अंतिम तस्वीर पूरी प्रवेश प्रक्रिया खत्म होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
छात्रों के लिए यह भी जरूरी है कि केवल सीट खाली देखकर जल्दबाजी में किसी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश का फैसला न करें। उन्हें संबंधित कॉलेज की मान्यता, फीस संरचना, अस्पताल और क्लीनिकल सुविधाओं सहित सभी जरूरी जानकारियों की आधिकारिक स्तर पर जांच करनी चाहिए। एमबीबीएस की पढ़ाई में कई वर्ष लगते हैं, इसलिए कॉलेज का चुनाव सोच-समझकर करना जरूरी है।
इस स्थिति ने सरकारी और निजी मेडिकल शिक्षा के बीच फीस और मांग के अंतर को भी फिर चर्चा में ला दिया है। एक तरफ सरकारी कॉलेजों की सीमित सीटों के लिए बड़ी संख्या में उम्मीदवार प्रतिस्पर्धा करते हैं, दूसरी तरफ निजी कॉलेजों में उपलब्ध सीटों का बड़ा हिस्सा तीसरे राउंड तक नहीं भर पाया है।
राजस्थान के आंकड़े फिलहाल यही बताते हैं कि निजी मेडिकल कॉलेजों में सामान्य कोटे की कुल 3336 एमबीबीएस सीटों में से 1275 सीटें ही तीसरे राउंड तक भरी हैं। इस हिसाब से 2061 यानी 61.78 प्रतिशत सीटें खाली हैं।
अब नजर आगे की प्रवेश प्रक्रिया पर रहेगी। अगर खाली सीटों के लिए आगे काउंसलिंग का मौका मिलता है तो छात्रों के पास एमबीबीएस में प्रवेश का एक और अवसर हो सकता है। वहीं इतनी बड़ी संख्या में खाली सीटों ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि जब मेडिकल की पढ़ाई की मांग इतनी ज्यादा है तो निजी कॉलेजों की हजारों सीटें छात्रों को आकर्षित क्यों नहीं कर पा रही हैं।
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