इस्लामाबाद: यमन के हूती विद्रोहियों को लेकर सख्त बयान देने वाले पाकिस्तान के तेवर महज एक दिन में बदलते नजर आए हैं। सऊदी अरब की सुरक्षा और मक्का रक्षा समझौते को लेकर पहले कड़ी चेतावनी देने के बाद अब पाकिस्तान ने अपने बयान को नरम कर दिया है। पाकिस्तान की ओर से स्पष्ट किया गया है कि सऊदी अरब के साथ हुए समझौते का मतलब तत्काल किसी सैन्य कार्रवाई में शामिल होना नहीं है।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ
ने हूतियों की ओर से सऊदी अरब को मिल रही चुनौती के बीच कहा था कि यदि सऊदी अरब पर बिना उकसावे के हमला किया जाता है तो दोनों देशों के बीच मौजूद रक्षा व्यवस्था सक्रिय हो सकती है। उनके इस बयान को हूती विद्रोहियों के लिए पाकिस्तान की सीधी चेतावनी के तौर पर देखा गया। इसके बाद सवाल उठने लगे कि क्या पाकिस्तान यमन के हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब की ओर से सैन्य संघर्ष में उतर सकता है। हालांकि एक दिन बाद ही पाकिस्तान के रुख में नरमी देखने को मिली। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता रक्षात्मक प्रकृति का है। इसके तहत फिलहाल किसी सैन्य अभियान या हूतियों के खिलाफ सीधे युद्ध में उतरने को लेकर कोई फैसला नहीं लिया गया है।
पाकिस्तान ने यह भी संकेत दिया कि समझौते को लागू करने से जुड़ी व्यवस्थाओं और प्रक्रियाओं पर अभी काम होना बाकी है। ऐसे में इसे किसी देश या संगठन के खिलाफ तत्काल सैन्य कार्रवाई की घोषणा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इस स्पष्टीकरण के बाद ख्वाजा आसिफ के पहले दिए गए आक्रामक बयान और विदेश मंत्रालय के नरम रुख के बीच अंतर साफ दिखाई दे रहा है।
दरअसल सऊदी अरब की सुरक्षा पाकिस्तान के लिए लंबे समय से अहम मुद्दा रही है। दोनों देशों के बीच रक्षा और रणनीतिक संबंध काफी पुराने हैं। बड़ी संख्या में पाकिस्तानी नागरिक सऊदी अरब में काम करते हैं और दोनों देशों के आर्थिक संबंध भी गहरे हैं। पाकिस्तान कई मौकों पर सऊदी अरब की क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर समर्थन जताता रहा है। दूसरी तरफ यमन के हूती विद्रोही पश्चिम एशिया में एक महत्वपूर्ण सैन्य शक्ति के रूप में उभरे हैं। क्षेत्र में जारी तनाव के बीच हूतियों की गतिविधियों ने सऊदी अरब समेत कई देशों की चिंता बढ़ाई है। यही कारण है कि पाकिस्तान की ओर से आए शुरुआती बयान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा।
अब पाकिस्तान की सफाई से संकेत मिल रहा है कि इस्लामाबाद फिलहाल सीधे सैन्य टकराव में उतरने से बचना चाहता है। पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ अपने रक्षा संबंधों को मजबूत बनाए रखना चाहता है, लेकिन साथ ही वह पश्चिम एशिया के जटिल संघर्ष में सीधे फंसने से भी बचने की कोशिश कर रहा है।
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