नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत 107 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने से भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों की चिंता बढ़ गई है। यदि कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो भारत के आयात बिल, महंगाई और पेट्रोलियम उत्पादों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है।

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के साथ ही वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने कच्चे तेल की कीमतों को सहारा दिया है। खासकर ईरान और आसपास के समुद्री मार्गों से होने वाली तेल आपूर्ति को लेकर बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ट्रेडर्स संभावित सप्लाई संकट को ध्यान में रखते हुए तेल की कीमतों में जोखिम का प्रीमियम जोड़ रहे हैं।
भारत पर क्यों पड़ेगा बड़ा असर?
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेश से आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश के आयात खर्च पर पड़ता है। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी रहने पर तेल कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। इसका प्रभाव पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और विमान ईंधन जैसे पेट्रोलियम उत्पादों पर भी देखने को मिल सकता है। तेल की ऊंची कीमतें केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहतीं। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थ, सब्जियां और रोजमर्रा की दूसरी वस्तुओं को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना महंगा हो सकता है। इसका असर अंततः खुदरा महंगाई पर पड़ने की आशंका रहती है।
रुपये पर भी बढ़ सकता है दबाव
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से भारत को आयात के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ सकते हैं। इससे विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव पड़ सकता है। कमजोर रुपया आयात को और महंगा कर सकता है, जिससे अर्थव्यवस्था के सामने दोहरी चुनौती पैदा हो सकती है। महंगाई बढ़ने की स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक के लिए भी ब्याज दरों को लेकर फैसले मुश्किल हो सकते हैं। केंद्रीय बैंक को आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने के साथ महंगाई को नियंत्रित रखने के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर नजर
वैश्विक तेल बाजार की सबसे बड़ी चिंता पश्चिम एशिया के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के तेल व्यापार के लिए बेहद अहम है। इस मार्ग पर किसी तरह की बड़ी बाधा आती है तो वैश्विक आपूर्ति प्रभावित होने का जोखिम बढ़ सकता है और तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है। भारत के लिए फिलहाल सबसे अहम सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें कितने समय तक ऊंची रहती हैं। यदि अमेरिका-ईरान तनाव कम होता है और तेल आपूर्ति सामान्य बनी रहती है तो कीमतों पर दबाव घट सकता है। लेकिन तनाव लंबा खिंचने या आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में भारत के आयात बिल, महंगाई और आम उपभोक्ताओं पर इसका व्यापक असर देखने को मिल सकता है।
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