मंदिर की जमीन पवित्र सम्पतियां, अतिक्रमण हटाने पर भड़के हाईकोर्ट के जज
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मद्रास। मंदिर की जमीन से अतिक्रमण हटाने से जुड़े एक मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई है। अदालत ने कहा है कि एक देवता के पास वोट डालने का अधिकारी नहीं है, तो ऐसे में उन्हें ऐसे ही नहीं छोड़ सकते। दरअसल, अदालत इस बात पर नाराजगी जता रहा था कि उनके करीब 7 साल पुराने के आदेश के बाद भी अतिक्रमण हटाने के लिए कड़े कदम नहीं उठाए गए।
मामला करूर जिले के बालसुब्रमण्यम स्वामी मंदिर से जुड़ा हुआ है। अदालत साल 2024 में ए राधाकृष्ण की तरफ से दाखिल अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही थी। जस्टिस पी वेलमुरुगन और जस्टिस बी पुगलेंधी की डिवीजन बेंच इसपर सुनवाई कर रही थी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जजों ने करूर डीएसपी की तरफ से दाखिल रिपोर्ट पर गौर किया, जिसमें कहा गया था कि अधिकारियों ने साल 2025 में कई मौकों पर लोगों को निकालने की प्रक्रिया की शुरुआत की थी। रिपोर्ट में कहा गया कि जब लोगों को निकालने की प्रक्रिया की, तो स्थानीय सांसद, राजनेताओं और अन्य प्रदर्शनकारियों की तरफ से विरोध प्रदर्शन किए गए थे। ऐसे में प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकी। जब कोर्ट ने अतिक्रमणकारियों की जानकारी निकाली, तो पता चला कि इनमें 27 सरकारी अधिकारी, 49 उद्योगपति और 38 प्रभावशाली लोग थे। बेंच ने कहा, 'मंदिर की जमीनें राज्य की कोई व्यावसायिक संपत्ति नहीं हैं। ये भक्तों की पीढ़ियों की तरफ से धार्मिक पूजा और धर्मार्थ कार्यों को जारी रखने के निश्चित उद्देश्य से दान की गई पवित्र संपत्तियां हैं। यदि ये संपत्तियां साल दर साल कम होती जा रही हैं, तो यह केवल कागजी गड़बड़ी नहीं है, बल्कि यह पूरी व्यवस्था के खत्म होने का संकेत है।'
कोर्ट ने कहा, 'बेचारे भगवान के पास वोट देने का अधिकार नहीं है, जबकि ताकतवर कब्जाधारियों के पास कीमती वोट हैं। कानून में भगवान को एक 'विधिक व्यक्ति' माना गया है, और सिर्फ इसलिए कि वे चुनाव में हिस्सा नहीं लेते, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित नहीं छोड़ा जा सकता। भगवान भले ही वोट न दें, लेकिन संविधान बोलता है। अदालत यहां पैरेन्स पेट्रे के रूप में अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर रही है। लेकिन, जब अदालती आदेशों को संगठित विरोध के जरिए रोका जाता है, तब कानून के शासन की ही परीक्षा होती है।' अदालत ने मंदिर की जमीनों से जुड़े मुकदमों को देख रहे सिविल कोर्ट्स को जल्द से जल्द और संभवत: 6 महीनों में काम पूरा करने के निर्देश दिए हैं। जजों ने टिप्पणी की कि राज्य मशीनरी (प्रशासन और पुलिस) से यह अपेक्षा की जाती है कि वह दृढ़ता और संवैधानिक निष्ठा के साथ काम करे। इसके साथ ही अदालत ने अवमानना याचिका को बंद कर दिया।