Market. मंडी। हिमालय की वादियों में प्राकृतिक रूप से उगने वाली औषधीय और जंगली खाद्य वनस्पतियां आने वाले समय में किसानों की आर्थिक तस्वीर बदल सकती हैं। यदि इनका वैज्ञानिक उत्पादन, संरक्षण और व्यावसायिक उपयोग सुनिश्चित किया जाए, तो यह क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए हरा सोना साबित होगा। यही संदेश चंडीगढ़ स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्निकल टीचर्स ट्रेनिंग एंड रिसर्च में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला डेयरी फार्मिंग, डेयरी मैनेजमेंट एंड ऑर्गेनिक फार्मिंग फॉर विकसित भारत में प्रमुखता से सामने आया। कार्यशाला में मुख्य वक्ता के रूप में वल्लभ राजकीय महाविद्यालय मंडी के वनस्पति विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डा. तारा देवी सेन ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने वाले औषधीय एवं जंगली खाद्य पौधे केवल प्राकृतिक धरोहर नहीं हैं, बल्कि किसानों के लिए आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का बड़ा माध्यम बन सकते हैं।
उन्होंने कहा कि इन पौधों का वैज्ञानिक एवं योजनाब उत्पादन पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर भी पैदा करेगा। कार्यशाला में हिमाचल, पंजाब, हरियाणा दिल्ली और राजस्थान सहित उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों से 50 से अधिक प्रगतिशील किसानों, कृषि विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने औषधीय पौधों की वैज्ञानिक खेती, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सतत कृषि प्रणाली पर विस्तार से विचार-विमर्श किया। कार्यक्रम के दौरान आयोजित प्रदर्शनी भी आकर्षण का केंद्र रही। जहां हर्बल उत्पादों, जैविक कृषि, औषधीय पौधों, प्राकृतिक खेती की आधुनिक तकनीकों तथा कृषि आधारित नवाचारों से जुड़े विभिन्न संस्थानों और उद्यमियों ने अपने उत्पाद एवं मॉडल प्रस्तुत किए।