प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में चार लोगों को कथित रूप से अवैध हिरासत में रखने और पुलिस स्टेशन के सीसीटीवी सिस्टम को लेकर गंभीर लापरवाही के मामले में बेहद सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने संबंधित थाना प्रभारी (SHO) की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए यहां तक कह दिया कि जो थाना प्रभारी सीसीटीवी खराब होने जैसी महत्वपूर्ण घटना की जनरल डायरी यानी GD में एंट्री तक नहीं कर सकता, वह कॉन्स्टेबल रहने के भी योग्य नहीं है। अदालत ने चार याचिकाकर्ताओं की कथित गैरकानूनी हिरासत के लिए कुल 65 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया और यह रकम संबंधित SHO के वेतन से वसूलने को कहा।
मामला देवरिया जिले के गौरी बाजार पुलिस स्टेशन से जुड़ा है। हाईकोर्ट में दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में आरोप लगाया गया कि चार याचिकाकर्ताओं को 13 अप्रैल से 24 अप्रैल 2026 के बीच पुलिस स्टेशन में गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया था। मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस स्टेशन के सीसीटीवी कैमरों की स्थिति भी सवालों के घेरे में आ गई।
12 अप्रैल को खराब हुआ CCTV लेकिन GD में एंट्री नहीं
सुनवाई के दौरान संबंधित SHO ने अदालत को बताया कि पुलिस स्टेशन का सीसीटीवी सिस्टम 12 अप्रैल 2026 को खराब हो गया था। यहीं से हाईकोर्ट के सवाल और तीखे हो गए।
अदालत ने SHO से पूछा कि जब सीसीटीवी सिस्टम खराब हुआ था तो क्या इसकी जानकारी जनरल डायरी में दर्ज की गई थी? SHO ने स्वीकार किया कि इस संबंध में कोई GD एंट्री नहीं की गई थी। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि सीसीटीवी सिस्टम की मरम्मत को लेकर क्या आधिकारिक प्रक्रिया अपनाई गई थी।
पुलिस स्टेशन में जनरल डायरी महत्वपूर्ण आधिकारिक रिकॉर्ड होती है। थाने में होने वाली अहम गतिविधियों और घटनाओं को इसमें दर्ज किया जाता है। ऐसे में सीसीटीवी जैसे महत्वपूर्ण निगरानी तंत्र के खराब होने की जानकारी दर्ज नहीं होना अदालत की नाराजगी का बड़ा कारण बना।
SP से भी हाईकोर्ट ने पूछे तीखे सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान केवल SHO ही नहीं बल्कि पुलिस अधीक्षक से भी जवाब मांगा गया। रिपोर्ट के अनुसार SP ने अदालत को बताया कि उन्हें पुलिस स्टेशन का सीसीटीवी सिस्टम खराब होने की जानकारी नहीं दी गई थी।
इसके बाद अदालत ने सवाल किया कि SHO की इस लापरवाही पर क्या कार्रवाई की गई। अदालत ने पूछा कि क्या संबंधित अधिकारी को निलंबित किया गया या उसकी सेवा समाप्त करने जैसी कोई कार्रवाई की गई?
सुनवाई के दौरान जस्टिस श्रीधरन ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा SHO जो थाने की GD में आवश्यक एंट्री तक नहीं कर सकता, उसे पद पर बने रहने की योग्यता पर सवाल उठता है। अदालत की टिप्पणी थी कि ऐसा अधिकारी कॉन्स्टेबल रहने के भी योग्य नहीं है।
चार लोगों को मिलेगा 65 हजार रुपये मुआवजा
हाईकोर्ट ने मामले में चारों याचिकाकर्ताओं के लिए कुल 65 हजार रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। दूसरे, तीसरे और चौथे याचिकाकर्ता को 20-20 हजार रुपये और पहले याचिकाकर्ता को 5 हजार रुपये देने का आदेश दिया गया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने इस मुआवजे का आर्थिक बोझ केवल सरकारी खजाने पर डालने के बजाय इसकी रकम संबंधित SHO के वेतन से वसूलने का आदेश दिया।
यह आदेश पुलिस अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अदालत का रुख संकेत देता है कि नागरिकों की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में लापरवाही को केवल सामान्य प्रशासनिक चूक मानकर नहीं छोड़ा जा सकता।
आखिर CCTV को लेकर इतना सख्त क्यों हुआ हाईकोर्ट?
पुलिस स्टेशन में सीसीटीवी कैमरे हिरासत में रखे गए लोगों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। हिरासत के दौरान क्या हुआ, किसी व्यक्ति को कब लाया गया, वह कितने समय तक थाने में रहा और उसके साथ कैसा व्यवहार किया गया—इन सवालों की जांच में सीसीटीवी फुटेज महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकती है।
इस मामले में हिरासत की अवधि से ठीक पहले सीसीटीवी सिस्टम खराब होने की बात सामने आई और उसकी GD एंट्री भी मौजूद नहीं थी। इसी कारण अदालत ने पुलिस अधिकारियों से कड़े सवाल किए।
यदि सीसीटीवी सिस्टम खराब हो जाए तो उसके खराब होने, मरम्मत के प्रयास और दोबारा चालू होने से जुड़ा रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसे रिकॉर्ड के अभाव में हिरासत से जुड़े विवादों में वास्तविक घटनाक्रम का पता लगाना कठिन हो सकता है।
13 से 24 अप्रैल के बीच हिरासत का आरोप
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में चार लोगों को 13 अप्रैल से 24 अप्रैल के बीच गौरी बाजार पुलिस स्टेशन में गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखने का आरोप लगाया गया था। इसी कथित हिरासत के समय सीसीटीवी सिस्टम काम नहीं करने का मुद्दा अदालत के सामने महत्वपूर्ण बन गया।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण संवैधानिक उपाय है। यदि किसी व्यक्ति को गैरकानूनी रूप से हिरासत में रखने का आरोप हो तो अदालत संबंधित अधिकारियों से उस व्यक्ति की हिरासत का कानूनी आधार पूछ सकती है।
यही वजह है कि ऐसे मामलों में पुलिस रिकॉर्ड, GD एंट्री, गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े दस्तावेज तथा सीसीटीवी फुटेज बेहद अहम हो जाते हैं।
SHO के खिलाफ स्वतंत्र कार्रवाई पर भी मांगा जवाब
हाईकोर्ट ने मामले को मुआवजे तक सीमित नहीं रखा। अदालत ने पुलिस अधीक्षक को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह बताने का निर्देश दिया कि SHO के खिलाफ स्वतंत्र रूप से क्या कार्रवाई की गई है। रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने यह भी पूछा कि 4 अगस्त से पहले संबंधित SHO के खिलाफ क्या स्वतंत्र कदम उठाए गए थे।
इससे स्पष्ट है कि हाईकोर्ट संबंधित अधिकारी की विभागीय जवाबदेही पर भी जवाब चाहता है।
पहले भी अवैध हिरासत पर सख्त रहा है हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट हाल के महीनों में पुलिस हिरासत और नागरिकों की स्वतंत्रता से जुड़े दूसरे मामलों में भी सख्त टिप्पणियां कर चुका है। मार्च 2026 के एक मामले में अदालत ने न्यायिक आदेश नहीं मानने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की थी और गैरकानूनी हिरासत के लिए एक लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था। उस मामले में भी राज्य सरकार को जिम्मेदार व्यक्तियों के वेतन से रकम वसूलने की स्वतंत्रता दी गई थी।
जून में भी एक अन्य मामले में अंतरिम न्यायिक आदेश के बावजूद गिरफ्तारी को लेकर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई थी और पीड़ित को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था।
पुलिस अधिकारियों के लिए बड़ा संदेश
गौरी बाजार थाने से जुड़े ताजा मामले में हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी और SHO के वेतन से मुआवजा वसूलने का निर्देश पुलिस प्रशासन के लिए बड़ा संदेश माना जा रहा है। मामला केवल सीसीटीवी कैमरा खराब होने तक सीमित नहीं है, बल्कि सवाल पुलिस रिकॉर्ड की पारदर्शिता, कथित गैरकानूनी हिरासत और अधिकारियों की जवाबदेही का है।
अब अगली सुनवाई में पुलिस अधीक्षक को बताना होगा कि संबंधित SHO की कथित लापरवाही को लेकर विभागीय स्तर पर क्या कदम उठाए गए। अदालत के अगले आदेश से यह भी साफ हो सकता है कि SHO के खिलाफ आगे किसी अतिरिक्त कार्रवाई की जरूरत मानी जाती है या नहीं।