चेन्नई : तमिलनाडु विधानसभा ने बुधवार को परिसीमन और महिला आरक्षण को लेकर केंद्र सरकार के सामने अपनी चिंताएं रखते हुए एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व में विधानसभा में पेश किए गए प्रस्ताव में केंद्र से लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या को स्थायी रूप से बरकरार रखने और राज्यों के बीच सीटों के मौजूदा आवंटन में बदलाव नहीं करने का आग्रह किया गया है। प्रस्ताव में यह भी मांग की गई है कि मौजूदा 543 लोकसभा सीटों के आधार पर ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाए।
तमिलनाडु विधानसभा का यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब देश में परिसीमन को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो रही है। एक दिन पहले ही विधानसभा में मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET को समाप्त करने से संबंधित विधेयक पेश किया गया था। इसके अगले दिन परिसीमन और महिला आरक्षण का मुद्दा विधानसभा में प्रमुखता से उठाया गया। मुख्यमंत्री विजय के नेतृत्व वाली सरकार का तर्क है कि जनसंख्या के आधार पर भविष्य में लोकसभा सीटों का नया बंटवारा किया गया तो दक्षिणी राज्यों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में नुकसान उठाना पड़ सकता है।
प्रस्ताव में कहा गया है कि लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का व्यापक परिसीमन लंबे समय से नहीं हुआ है। विधानसभा के मुताबिक 2011 की जनगणना के आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए सीटों से संबंधित व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। राज्य सरकार का कहना है कि 1971 के बाद जनसंख्या नियंत्रण के लिए दक्षिणी राज्यों ने कई प्रभावी कदम उठाए हैं। इन राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने की दिशा में बेहतर प्रदर्शन किया है। ऐसे में यदि भविष्य में केवल नई जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण किया जाता है, तो जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे राज्यों की संसद में हिस्सेदारी कम हो सकती है।
तमिलनाडु सरकार का कहना है कि परिसीमन के कारण होने वाला यह बदलाव केवल सीटों की संख्या का मामला नहीं होगा, बल्कि इसका असर राज्यों के राजनीतिक प्रभाव पर भी पड़ेगा। राज्य के अनुसार, यदि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को जनसंख्या के अनुपात में ज्यादा लोकसभा सीटें मिलती हैं तो दक्षिण भारत के राज्यों की संसद में हिस्सेदारी घट सकती है। इसी आशंका के कारण तमिलनाडु लगातार परिसीमन के मुद्दे पर व्यापक चर्चा और संतुलित व्यवस्था की मांग करता रहा है।
प्रस्ताव में लोकसभा और राज्यसभा के बीच मौजूदा 2.2:1 अनुपात को भी बनाए रखने की मांग की गई है। विधानसभा का आग्रह है कि लोकसभा की कुल सीटों को बढ़ाने के बजाय मौजूदा 543 सीटों की संख्या को बरकरार रखा जाए। इसके साथ ही राज्यों के बीच सीटों का वर्तमान आवंटन भी कायम रखा जाए। तमिलनाडु का मानना है कि इससे राज्यों के मौजूदा राजनीतिक प्रतिनिधित्व में अचानक बदलाव नहीं होगा और दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को भी ध्यान में रखा जा सकेगा।
महिला आरक्षण को लेकर भी प्रस्ताव में महत्वपूर्ण मांग की गई है। विधानसभा ने कहा है कि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाना चाहिए, लेकिन इसके लिए लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को ही आधार बनाया जाए। यानी महिला आरक्षण लागू करने के नाम पर लोकसभा की कुल सीटों की संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया न हो। प्रस्ताव में मौजूदा सीटों के आधार पर ही महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग की गई है।
हालांकि, तमिलनाडु विधानसभा के पास कानूनी रूप से लोकसभा सीटों की संख्या को स्थायी रूप से तय करने या परिसीमन पर रोक लगाने का अधिकार नहीं है। विधानसभा का यह प्रस्ताव केंद्र सरकार से राजनीतिक अनुरोध और राज्य का आधिकारिक दृष्टिकोण व्यक्त करने का माध्यम है। इसे केंद्र सरकार पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं माना जा सकता। लोकसभा सीटों की संख्या और परिसीमन से जुड़े अंतिम फैसले का अधिकार संसद और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत संबंधित केंद्रीय संस्थाओं के पास है।
परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों की चिंता का एक प्रमुख कारण यह है कि भविष्य में जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होने पर उत्तर और मध्य भारत के उन राज्यों को अधिक सीटें मिलने की संभावना हो सकती है, जहां जनसंख्या वृद्धि दक्षिणी राज्यों की तुलना में अधिक रही है। दूसरी ओर, तमिलनाडु जैसे राज्यों को अपनी मौजूदा सीटों में कमी की आशंका है। कुछ आकलनों में तमिलनाडु की लोकसभा सीटें मौजूदा 39 से घटकर करीब 32 तक होने की संभावना जताई गई है, हालांकि वास्तविक संख्या परिसीमन की प्रक्रिया और संवैधानिक प्रावधानों पर निर्भर करेगी।
विजय सरकार के इस प्रस्ताव को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके जरिए तमिलनाडु ने केंद्र की संभावित परिसीमन प्रक्रिया को लेकर अपना विरोध और चिंता स्पष्ट कर दी है। राज्य सरकार का कहना है कि विकास, जनसंख्या नियंत्रण और प्रशासनिक प्रदर्शन के आधार पर राज्यों को राजनीतिक रूप से दंडित नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम करने के बजाय ऐसा संतुलन तैयार किया जाना चाहिए, जिससे देश के सभी क्षेत्रों की राजनीतिक भागीदारी बनी रहे।
अब तमिलनाडु विधानसभा के इस प्रस्ताव के बाद परिसीमन को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस और तेज होने की संभावना है। दक्षिणी राज्यों की ओर से पहले भी इस विषय पर चिंता जताई जाती रही है। ऐसे में लोकसभा सीटों की संख्या, राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व और महिला आरक्षण को लेकर आने वाले समय में केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक संवाद महत्वपूर्ण हो सकता है। फिलहाल तमिलनाडु ने 543 सीटों को बनाए रखने और मौजूदा अंतर-राज्यीय सीट आवंटन में बदलाव नहीं करने की मांग के जरिए अपना रुख स्पष्ट कर दिया है।