भीलवाड़ा । नगर निगम चुनाव के नतीजों ने भीलवाड़ा की सियासत में भाजपा का दबदबा और मजबूत कर दिया। मतगणना के बाद सामने आई तस्वीर में भाजपा ने बंपर जीत दर्ज करते हुए निगम में अपनी मजबूत मौजूदगी साबित की। नतीजे घोषित होते ही भाजपा खेमे में खुशी की लहर दौड़ गई। कार्यकर्ताओं ने जीत का जश्न मनाया और एक दूसरे को मिठाई खिलाकर बधाइयां दीं। चुनाव से पहले वार्डों में चल रही खींचतान, टिकटों को लेकर असंतोष और निर्दलीय प्रत्याशियों के मैदान में उतरने से मुकाबला रोचक माना जा रहा था। मतदान के बाद भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अपने-अपने आंकड़ों को लेकर दावे कर रहे थे, लेकिन ईवीएम खुलने के साथ तस्वीर तेजी से साफ होती गई। कई वार्डों में भाजपा प्रत्याशियों ने बढ़त बनाते हुए मुकाबले को एकतरफा कर दिया। 70 वार्डों के परिणाम में भाजपा ने 45 सीटों पर जीत दर्ज कर स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि कांग्रेस महज 10 वार्डों में सिमट गई। वहीं 15 निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी जीत दर्ज कर निगम की नई तस्वीर में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। परिणाम सामने आते ही भाजपा खेमे में जश्न का माहौल बन गया। चुनाव परिणाम की खास बात भाजपा की सीटों की संख्या ही नहीं, बल्कि कई वार्डों में स्थानीय और युवा चेहरों का प्रभावी प्रदर्शन भी रहा। कांग्रेस के मजबूत माने जाने वाले चेहरों को युवाओं ने चुनौती दी और तीन युवा पार्षदों ने कांग्रेस के दिग्गजों को पटखनी देकर चुनावी समीकरण बदल दिए। ऐसे में निगम की सत्ता पर भाजपा का दावा बेहद मजबूत हो गया है। महापौर पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित होने के कारण अब भाजपा के भीतर अगली बड़ी कवायद शुरू होगी।

नगर निगम चुनाव में एक खास परिणाम भी सामने आया, जहां पति-पत्नी दोनों ने चुनाव जीतकर सफलता हासिल की। रमेश खोईवाल और उनकी पत्नी प्रेम देवी खटीक ने अपने-अपने वार्ड से जीत दर्ज की। दोनों की जीत के बाद समर्थकों और कार्यकर्ताओं में खुशी का माहौल रहा। नगर निगम चुनाव में कांग्रेस को जो बुरी गत हुई है, उसके लिए जिम्मेदार कांग्रेस की आपसी गुटबाजी है। इसी का नतीजा रहा कि कांग्रेस ने 17 वार्डों में तो नामांकन के अंतिम समय तक अपने प्रत्याशी के लिए सिंबल ही नहीं दे पाए। रिटर्निंग अधिकारी के पास सिंबल जमा नहीं होने से जनता में निगेटिव मैसेज गया और पार्टी को बुरी हार का सामना करना पड़ा। 45 पार्षदों की मजबूत संख्या के बाद पार्टी में महापौर पद के संभावित दावेदारों को लेकर सियासी हलचल तेज होना तय है। 15 निर्दलीयों की जीत ने यह भी साफ किया कि कई वार्डों में स्थानीय समीकरणों ने राजनीतिक दलों के गणित को प्रभावित किया। टिकट से नाराजगी, व्यक्तिगत जनाधार और स्थानीय मुद्दों के चलते निर्दलीय प्रत्याशियों ने दोनों प्रमुख दलों को चुनौती दी और जीत हासिल की। अब चुनावी मुकाबला खत्म हो चुका है और निगाहें निगम की अगली सत्ता, महापौर के चेहरे और नई परिषद के कामकाज पर टिक गई हैं।

मंजू पोखरणा का सियासी किला ढहा

चुनाव में कांग्रेस के पुराने और मजबूत गढ़ों को भी भाजपा प्रत्याशियों ने भेद दिया। मंजू पोखरणा का सियासी किला ढहना इसी बदलाव का बड़ा संकेत माना जा रहा है। लंबे समय से प्रभाव रखने वाले चेहरों के सामने युवा प्रत्याशियों की जीत ने शहर की राजनीति में नई पीढ़ी के बढ़ते प्रभाव को सामने ला दिया है।

किंगमेकर बनने का सपना टूटा

चुनाव से पहले जिन निर्दलीय उम्मीदवारों को बोर्ड गठन में ‘किंगमेकर’ माना जा रहा था और जिनके समीकरण बिगाड़ने की चर्चाएं थीं, वे चुनावी मैदान में 15 सीटों पर जीत तो दर्ज करने में सफल रहे, लेकिन भाजपा को अपने दम पर स्पष्ट बहुमत मिलने के कारण उनका राजनीतिक महत्व लगभग समाप्त हो गया है। अब इन निर्दलीय पार्षदों की भूमिका मुख्य रूप से अपने-अपने वार्ड के विकास कार्यों और स्थानीय मुद्दों तक सीमित रहने की संभावना है।

दिग्गजों के गढ़ में मतदाताओं की नाराजगी बनी चुनौती

नगर निकाय चुनाव में इस बार मतदाताओं की नाराजगी ने दोनों प्रमुख दलों के कई दिग्गजों की सियासी राह मुश्किल कर दी। भाजपा के खेमे से प्रीति झुर्रानी, सुनीता कटारिया, शेखर अग्रवाल, खुशबू शुक्ला और वार्ड 29 से अमित सारस्वत जैसे नाम चुनाव मैदान में हार गये। वहीं कांग्रेस की ओर से पूर्व सभापति ओम नराणीवाल की पत्नी लीला नराणीवाल, शहर जिला अध्यक्ष जीपी खटीक की पत्नी समदु देवी, उनके भाई उमेश खटीक तथा वार्ड 26 से पूर्व सभापति मंजू पोखरना, पुर्व नेता प्रतिपक्ष धर्मेन्द्र पारीक जैसे चर्चित चेहरों को भी करारी शिकस्त झेलनी पडी।

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