Snana Yatra : रथ यात्रा से पहले भगवान जगन्नाथ के महा स्नान का विशेष पर्व
Odisha ओडिशा: भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा से पहले आयोजित होने वाली स्नान यात्रा, जिसे देबा स्नान पूर्णिमा भी कहा जाता है, ओडिशा के प्रमुख धार्मिक आयोजनों में से एक है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा का सार्वजनिक रूप से विधि-विधान के साथ पवित्र स्नान कराया जाता है। यह अनुष्ठान केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं माना जाता, बल्कि इससे जुड़ी पौराणिक मान्यताएं, सांस्कृतिक विरासत और कृषि जीवन से जुड़े संकेत भी इसे विशेष महत्व प्रदान करते हैं।
हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा के दिन स्नान यात्रा का आयोजन किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान जगन्नाथ का प्राकट्य दिवस या जन्मोत्सव भी मनाया जाता है। इसी कारण इस अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना और सार्वजनिक स्नान समारोह आयोजित किया जाता है।
पौराणिक ग्रंथ स्कंद पुराण के अनुसार, भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की लकड़ी की प्रतिमाओं की स्थापना राजा इंद्रद्युम्न ने कराई थी। मान्यता है कि उन्हीं के निर्देश पर इन देवताओं के सार्वजनिक स्नान की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी उसी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जाती है।
ओडिशा की धार्मिक परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले ग्रंथ नीलाद्री मोहदय में स्नान यात्रा की पूरी प्रक्रिया और उससे जुड़े रीति-रिवाजों का विस्तार से वर्णन मिलता है। संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कवि श्रीहर्ष ने भी अपने ग्रंथ नैषधीय चरित में पुरी के इस विशेष स्नान उत्सव का उल्लेख किया है, जिससे इसकी प्राचीनता और धार्मिक महत्व का पता चलता है।
स्नान यात्रा से एक दिन पहले भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और सुदर्शन चक्र की प्रतिमा को मंदिर के गर्भगृह से विशेष शोभायात्रा के माध्यम से स्नान मंडप या स्नान बेदी तक लाया जाता है। इस पूरे आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं और पारंपरिक वाद्य यंत्रों तथा धार्मिक मंत्रोच्चार के बीच देवताओं की शोभायात्रा निकाली जाती है।
स्नान मंडप को इस प्रकार बनाया गया है कि मंदिर परिसर के बाहर से भी श्रद्धालु इस धार्मिक अनुष्ठान का दर्शन कर सकें। वर्ष में यही एक ऐसा अवसर होता है जब बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को तीनों देवताओं के सार्वजनिक स्नान का दर्शन करने का अवसर मिलता है।
धार्मिक परंपरा के अनुसार, जगन्नाथ मंदिर परिसर में स्थित शीतला मंदिर के पास बने एक पवित्र कुएं से 108 कलशों में जल लाया जाता है। इन्हीं 108 कलशों के जल से भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और सुदर्शन चक्र का विधिपूर्वक अभिषेक किया जाता है। हिंदू धर्म में 108 संख्या को अत्यंत शुभ और पवित्र माना जाता है, इसलिए इस अनुष्ठान में इसका विशेष महत्व है।
स्नान के बाद देवताओं को विशेष रूप से गजानन या गणेश बेशा धारण कराया जाता है। इस अलंकरण में भगवान जगन्नाथ और अन्य देवताओं को हाथी के स्वरूप जैसी विशेष सजावट से सजाया जाता है। यह स्वरूप श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र होता है और बड़ी संख्या में भक्त इसके दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
स्नान यात्रा के दौरान देवताओं को दैनिक भोग भी स्नान मंडप में ही सार्वजनिक रूप से अर्पित किया जाता है। इस परंपरा को भोगलगी कहा जाता है। श्रद्धालु इस दौरान पूजा, भोग और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का भी दर्शन करते हैं।
धार्मिक महत्व के साथ-साथ स्नान यात्रा का संबंध ओडिशा के पारंपरिक कृषि जीवन से भी माना जाता है। मान्यता है कि यह पर्व मानसून के आगमन का प्रतीक है। लंबे समय से राज्य में कृषि कार्यों की शुरुआत और वर्षा ऋतु के स्वागत के साथ इस पर्व को जोड़ा जाता रहा है।
पश्चिमी ओडिशा का प्रसिद्ध सीतल षष्ठी पर्व भी वर्षा और कृषि से जुड़ी इसी परंपरा का हिस्सा माना जाता है। इस अवसर पर अच्छी वर्षा और सफल खेती की कामना की जाती है ताकि खेतों की तैयारी और नई फसल की बुआई सुचारु रूप से हो सके।
स्नान यात्रा के बाद धार्मिक परंपरा के अनुसार यह माना जाता है कि अत्यधिक स्नान के कारण भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद उन्हें कुछ दिनों तक विशेष विश्राम दिया जाता है और इस अवधि में आम श्रद्धालुओं के लिए उनके दर्शन बंद रहते हैं। इसके पश्चात भगवान नए स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं और फिर विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा का आयोजन होता है।
इस प्रकार स्नान यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा, संस्कृति और प्रकृति के बीच गहरे संबंध का प्रतीक मानी जाती है। यही कारण है कि हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस पावन अवसर के साक्षी बनने के लिए पुरी पहुंचते हैं और भगवान जगन्नाथ के इस विशेष महोत्सव में भाग लेते हैं।