नीलाद्रि बिजे के साथ श्रीमंदिर लौटे महाप्रभु

Update: 2026-07-28 04:27 GMT

पुरी: ओडिशा के पुरी में सोमवार को भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध वार्षिक रथ यात्रा का विधिवत समापन हो गया। नीलाद्रि बिजे की पवित्र रस्म के साथ भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा अपने-अपने रथों से उतरकर श्रीमंदिर के गर्भगृह में स्थित रत्न वेदी पर पुनः विराजमान हो गए। इस धार्मिक अनुष्ठान के साथ ही नौ दिनों तक चलने वाले भव्य रथ उत्सव का समापन हुआ।

नीलाद्रि बिजे रस्म को भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। इस अवसर पर विशेष विधि-विधान के साथ भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को पहांडी जुलूस के माध्यम से उनके रथों से मंदिर के अंदर ले जाया गया। पहांडी के दौरान भगवान की प्रतिमाओं को पारंपरिक तरीके से झुलाते हुए और भक्तिमय वातावरण के बीच गर्भगृह तक पहुंचाया गया।

इससे पहले भगवान जगन्नाथ और उनके भाई-बहन गुंडिचा मंदिर में प्रवास के बाद बाहुड़ा यात्रा के माध्यम से श्रीमंदिर के बाहर स्थित अपने-अपने रथों पर पहुंचे थे। रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ, भगवान बलभद्र का तालध्वज रथ और देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ लाखों श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहे।

रथ यात्रा के अंतिम दिन नीलाद्रि बिजे के अवसर पर पुरी शहर में धार्मिक उत्साह और भक्ति का माहौल देखने को मिला। बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान के दर्शन और इस ऐतिहासिक परंपरा के साक्षी बनने के लिए पहुंचे। मंदिर प्रशासन और जिला प्रशासन ने पूरे आयोजन को सफलतापूर्वक संपन्न कराने के लिए व्यापक सुरक्षा और व्यवस्था की थी।

12वीं सदी के प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर में स्थित रत्न वेदी भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा का मुख्य आसन है। नीलाद्रि बिजे के बाद तीनों देवी-देवता इसी पवित्र सिंहासन पर पुनः विराजमान हुए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस रस्म के साथ भगवान का वार्षिक प्रवास समाप्त होता है और वे अपने नियमित स्थान पर लौट आते हैं।

नीलाद्रि बिजे से जुड़ी कई धार्मिक परंपराएं भी निभाई जाती हैं। मान्यता है कि रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर जाते हैं। वहां कुछ दिनों के प्रवास के बाद वे श्रीमंदिर लौटते हैं। इस वापसी के बाद होने वाली रस्मों में नीलाद्रि बिजे का विशेष महत्व है।

इस अवसर पर मंदिर के सेवायतों ने निर्धारित परंपराओं के अनुसार सभी अनुष्ठान पूरे किए। सदियों पुरानी परंपराओं और धार्मिक विधियों का पालन करते हुए भगवान की प्रतिमाओं को रत्न वेदी तक पहुंचाया गया। पूरे आयोजन के दौरान मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रही।

पुरी रथ यात्रा दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक मानी जाती है। हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ के दर्शन और रथ यात्रा में शामिल होने के लिए पुरी पहुंचते हैं। यह उत्सव न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि ओडिशा की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

रथ यात्रा के दौरान प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखना होती है। इस बार भी पुलिस, प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और अन्य एजेंसियों ने मिलकर व्यवस्थाएं संभालीं। भीड़ नियंत्रण, यातायात प्रबंधन और आपातकालीन सेवाओं के लिए विशेष इंतजाम किए गए थे।

श्रद्धालुओं ने नीलाद्रि बिजे के अवसर पर भगवान जगन्नाथ के जयकारे लगाए और इस पवित्र क्षण के दर्शन किए। मंदिर परिसर में भक्ति और उत्साह का वातावरण बना रहा। लोगों ने भगवान से सुख, शांति और समृद्धि की कामना की।

धार्मिक विशेषज्ञों के अनुसार, नीलाद्रि बिजे केवल एक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि भगवान जगन्नाथ की वार्षिक यात्रा के पूर्ण होने का प्रतीक है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और ओडिशा की धार्मिक संस्कृति में इसका विशेष स्थान है।

इस तरह भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के श्रीमंदिर लौटने के साथ ही पुरी की ऐतिहासिक रथ यात्रा का समापन हो गया। भक्तों की आस्था, परंपराओं और भव्य आयोजनों से सजी यह यात्रा एक बार फिर करोड़ों लोगों के लिए आध्यात्मिक अनुभव का केंद्र बनी।

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