मुंबई: 28 दिसंबर का दिन भारतीय इतिहास में दो घटनाओं को रेखांकित करती हैं। 1885 में राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा और 1896 में राष्ट्रभक्ति की चेतना को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
1885 में बंबई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पहले अधिवेशन ने भारत में संगठित राजनीतिक संघर्ष की नींव रखी। 72 प्रतिनिधियों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि शिक्षित भारतीय वर्ग अब औपनिवेशिक शासन के खिलाफ एक मंच पर आकर अपनी बात रखने लगा था। कांग्रेस ने प्रारंभ में संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों से भारतीयों की समस्याएँ उठाईं, लेकिन आगे चलकर यही संस्था स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बनी।
1896 के कोलकाता अधिवेशन में “वंदे मातरम्” का पहली बार गायन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में भावनात्मक और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बना। यह गीत केवल एक रचना नहीं रहा, बल्कि देशभक्ति, त्याग और मातृभूमि के प्रति समर्पण का मंत्र बन गया। इसने जनता को भावनात्मक रूप से जोड़ा और स्वतंत्रता संघर्ष को जन-आंदोलन में बदलने में अहम भूमिका निभाई।