भोपाल। सिकल सेल बीमारी को लेकर आदिवासी समुदायों के बीच किए गए काम के लिए भोपाल के होम्योपैथिक चिकित्सक प्रोफेसर निशांत नाम्बिसन और डॉ. स्मिता नाम्बिसन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। उनके प्रयासों का उल्लेख हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित पुस्तक ‘कर्व्ड एयर: ए बायोग्राफी ऑफ सिकल सेल एनीमिया’ में किया गया है। मॉलिक्यूलर जेनेटिसिस्ट और लेखक केविन डेविस की इस पुस्तक में सिकल सेल बीमारी के इतिहास के साथ इससे निपटने के लिए दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में किए गए प्रयासों का जिक्र किया गया है।
पुस्तक में प्रोफेसर निशांत नाम्बिसन और डॉ. स्मिता नाम्बिसन द्वारा छिंदवाड़ा के आदिवासी समुदायों के बीच किए गए काम को जगह दी गई है। दोनों ने वर्ष 2018 में इस क्षेत्र में बड़े स्तर पर सिकल सेल स्क्रीनिंग अभियान चलाया था। इस दौरान करीब 25 हजार लोगों की जांच किए जाने की जानकारी है।
इस अभियान का उद्देश्य केवल बीमारी की पहचान करना नहीं था, बल्कि ऐसे समुदायों तक स्वास्थ्य संबंधी जानकारी पहुंचाना भी था जहां कम साक्षरता, स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच और आनुवंशिक बीमारियों से जुड़े सामाजिक कलंक जैसी चुनौतियां मौजूद थीं।
सिकल सेल एक आनुवंशिक रक्त विकार है। इसमें लाल रक्त कोशिकाओं का आकार सामान्य गोलाकार स्वरूप के बजाय हंसिए जैसा हो सकता है। इससे शरीर के विभिन्न हिस्सों तक ऑक्सीजन पहुंचने में परेशानी हो सकती है और मरीज को दर्द, एनीमिया तथा दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
चूंकि बीमारी आनुवंशिक है, इसलिए इसकी स्क्रीनिंग के साथ जेनेटिक काउंसलिंग भी महत्वपूर्ण होती है। किसी व्यक्ति में सिकल सेल ट्रेट या बीमारी की पहचान होने के बाद परिवार को यह समझाना जरूरी होता है कि यह अगली पीढ़ी तक किस तरह पहुंच सकती है।
लेकिन ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में जेनेटिक्स जैसे जटिल विषय को सरल भाषा में समझाना आसान नहीं होता। कम साक्षरता वाले क्षेत्रों में तकनीकी शब्दावली समस्या को और कठिन बना सकती है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए डॉ. नाम्बिसन ने GIPCI कार्ड तैयार किया।
GIPCI कार्ड को जेनेटिक काउंसलिंग आसान बनाने वाले उपकरण के रूप में विकसित किया गया। यह रंगों और पंच-होल आधारित व्यवस्था का इस्तेमाल करता है। इसके माध्यम से जटिल मेंडेलियन जेनेटिक्स को आसान दृश्य संभावनाओं के रूप में समझाने की कोशिश की जाती है।
साधारण शब्दों में कहा जाए तो इस कार्ड का उद्देश्य किसी परिवार को यह समझाने में मदद करना है कि माता-पिता की आनुवंशिक स्थिति के आधार पर बच्चे में बीमारी या उसके ट्रेट के आने की संभावना क्या हो सकती है। रंगों और दृश्य संकेतों के कारण कम पढ़े-लिखे व्यक्ति के लिए भी जानकारी को समझना अपेक्षाकृत आसान बनाया गया।
आनुवंशिक बीमारियों के मामले में काउंसलिंग की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल जांच रिपोर्ट दे देना पर्याप्त नहीं होता। मरीज और उसके परिवार को रिपोर्ट का अर्थ, संभावित जोखिम और आगे उपलब्ध स्वास्थ्य विकल्प समझाना भी जरूरी होता है।
नाम्बिसन दंपती की पहल में इसी सामाजिक पक्ष पर विशेष ध्यान दिया गया। छिंदवाड़ा के आदिवासी क्षेत्रों में काम करते समय उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता के साथ जागरूकता से जुड़ी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। कई समुदायों में आनुवंशिक बीमारियों को लेकर पर्याप्त जानकारी नहीं होने से गलत धारणाएं पैदा हो सकती हैं।
सिकल सेल जैसी बीमारी से जुड़ा सामाजिक कलंक भी मरीजों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। बीमारी की वैज्ञानिक वजह नहीं समझने पर लोग इसे गलत सामाजिक धारणाओं से जोड़ सकते हैं। इसलिए स्क्रीनिंग के साथ सही जानकारी उपलब्ध कराना ऐसे अभियानों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।
वर्ष 2018 में लगभग 25 हजार लोगों की स्क्रीनिंग अपने पैमाने के कारण भी महत्वपूर्ण रही। इतनी बड़ी आबादी तक पहुंचने के लिए जांच, रिकॉर्ड प्रबंधन और लोगों को बीमारी के बारे में समझाने की व्यापक व्यवस्था की जरूरत होती है।
अब इस काम का उल्लेख हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित पुस्तक में होना स्थानीय स्तर पर किए गए प्रयास को वैश्विक चर्चा से जोड़ता है। ‘कर्व्ड एयर: ए बायोग्राफी ऑफ सिकल सेल एनीमिया’ के लेखक केविन डेविस मॉलिक्यूलर जेनेटिक्स के क्षेत्र से जुड़े हैं और पुस्तक में बीमारी के वैज्ञानिक तथा मानवीय पहलुओं की चर्चा की गई है।
किसी अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन में स्थानीय स्वास्थ्य पहल का उल्लेख होने से ऐसे मॉडलों की उपयोगिता पर व्यापक स्तर पर ध्यान जाता है। विशेष रूप से GIPCI कार्ड जैसा सरल उपकरण उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी अवधारणा पेश करता है जहां चिकित्सा संबंधी जटिल जानकारी को स्थानीय समुदाय तक आसानी से पहुंचाना चुनौतीपूर्ण होता है।
भारत में सिकल सेल बीमारी का मुद्दा खास तौर पर कुछ आदिवासी समुदायों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। ऐसे क्षेत्रों में स्क्रीनिंग के जरिए बीमारी और ट्रेट की समय रहते पहचान करने से लोगों को आवश्यक चिकित्सकीय सलाह और जानकारी उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।
सिकल सेल ट्रेट और सिकल सेल बीमारी के बीच अंतर समझाना भी जागरूकता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी व्यक्ति में ट्रेट होने का मतलब यह जरूरी नहीं कि उसमें बीमारी के गंभीर लक्षण हों, लेकिन आनुवंशिक परामर्श के संदर्भ में यह जानकारी महत्वपूर्ण हो सकती है।
यही वह क्षेत्र है जहां आसान जेनेटिक काउंसलिंग उपकरण उपयोगी साबित हो सकते हैं। जटिल चार्ट और वैज्ञानिक शब्दों के बजाय रंगों तथा दृश्य संकेतों से संभावनाओं को समझाने पर संवाद अधिक प्रभावी हो सकता है।
नाम्बिसन दंपती के काम की खासियत स्वास्थ्य समस्या को केवल चिकित्सा जांच तक सीमित नहीं रखना रही। उनके प्रयासों में बीमारी से जुड़े सामाजिक कलंक, स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता और कम साक्षरता जैसी वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर समाधान विकसित करने की कोशिश दिखाई देती है।
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की पुस्तक में इस पहल का उल्लेख होना भोपाल और मध्य भारत में किए गए स्वास्थ्य संबंधी काम के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। इससे यह भी सामने आता है कि स्थानीय स्तर पर विकसित किए गए सरल समाधान वैश्विक स्वास्थ्य विमर्श में जगह बना सकते हैं।
अब GIPCI कार्ड जैसे उपकरणों के व्यापक उपयोग और प्रभाव का वैज्ञानिक मूल्यांकन भी महत्वपूर्ण होगा। यदि अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में ऐसे मॉडल प्रभावी साबित होते हैं तो जेनेटिक काउंसलिंग को ज्यादा सरल और सुलभ बनाने में मदद मिल सकती है।
प्रोफेसर निशांत नाम्बिसन और डॉ. स्मिता नाम्बिसन द्वारा वर्ष 2018 में लगभग 25 हजार लोगों तक पहुंचने से शुरू हुई पहल अब एक अंतरराष्ट्रीय पुस्तक में दर्ज हुई है। सिकल सेल जैसी जटिल आनुवंशिक बीमारी को समुदाय के लिए आसान भाषा और दृश्य माध्यमों में समझाने का उनका प्रयास स्वास्थ्य जागरूकता के क्षेत्र में स्थानीय नवाचार की अहम मिसाल के रूप में सामने आया है