अहमदाबाद। करीब 14.5 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी के मामले में सात साल से गिरफ्तारी से बच रहे नीलेश धीरूभाई पटेल को अहमदाबाद पुलिस ने मध्य प्रदेश के बैतूल से गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक आरोपी ने पहचान छिपाने के लिए अपना हुलिया बदल लिया था। उसकी तलाश में करीब 10 महीने तक निगरानी रखने के बाद वासना पुलिस ने ‘ऑपरेशन हॉक आई’ के तहत कार्रवाई की। पुलिस ने नीलेश के कथित साथी दीपक आहूजा उर्फ दीपू टैंक को भी गिरफ्तार किया है।
पुलिस के अनुसार नीलेश धीरूभाई पटेल पर करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी से जुड़े मामले में संलिप्त होने का आरोप है। लंबे समय से उसकी तलाश की जा रही थी, लेकिन वह कथित तौर पर लगातार अपने ठिकाने और पहचान बदलकर पुलिस से बचता रहा।
आरोपी की तलाश आसान नहीं थी। सात साल का लंबा समय गुजरने के कारण पुलिस के सामने उसके वर्तमान ठिकाने का पता लगाना बड़ी चुनौती थी। इसके लिए वासना पुलिस ने करीब दस महीने तक अलग-अलग सूचनाओं और गतिविधियों पर नजर रखी।
अंततः पुलिस को उसके मध्य प्रदेश के बैतूल में होने की जानकारी मिली। इसके बाद टीम ने वहां पहुंचकर कार्रवाई की और शुक्रवार को नीलेश को गिरफ्तार कर लिया। इस पूरे अभियान को पुलिस ने ‘ऑपरेशन हॉक आई’ नाम दिया।
पुलिस के अनुसार नीलेश ने कथित तौर पर गिरफ्तारी से बचने के लिए अपना हुलिया भी बदल लिया था। ऐसे में पुरानी तस्वीरों और पहचान के आधार पर उसे तलाशना मुश्किल हो गया था। जांच टीम ने विभिन्न जानकारियों को जोड़ते हुए आखिरकार उसकी पहचान और लोकेशन की पुष्टि की।
इस मामले में पुलिस के सामने एक बड़े वित्तीय नेटवर्क की जानकारी भी आई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक नीलेश कथित तौर पर हांगकांग से 65 बैंक खातों और करीब 19 से 20 शेल कंपनियों का नेटवर्क संचालित करता था।
अब पुलिस इन बैंक खातों और कंपनियों से जुड़े वित्तीय लेनदेन की विस्तृत जांच कर सकती है। यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि इन खातों में पैसा कहां से आया, किन खातों में भेजा गया और कथित धोखाधड़ी की रकम का इस्तेमाल किस तरह किया गया।
शेल कंपनियों का कथित नेटवर्क भी जांच का अहम हिस्सा है। पुलिस यह जानने का प्रयास करेगी कि इन कंपनियों का वास्तविक कारोबारी काम क्या था और उनका इस्तेमाल वित्तीय लेनदेन के लिए किस तरह किया गया।
आरोप है कि नीलेश खुद को स्टॉक मार्केट एडवाइजर के रूप में पेश करता था। लोगों का भरोसा हासिल करने के लिए वह कथित तौर पर खुद को आर्थिक रूप से बेहद सफल व्यक्ति के रूप में प्रदर्शित करता था।
इसके लिए लग्जरी कारों और हाई-टेक गैजेट्स का इस्तेमाल किए जाने की बात भी सामने आई है। कथित तौर पर महंगी जीवनशैली दिखाकर संभावित निवेशकों या संपर्क में आने वाले लोगों के सामने अपनी मजबूत वित्तीय स्थिति की छवि बनाई जाती थी।
पुलिस जांच में अब यह पता लगाया जाएगा कि खुद को स्टॉक मार्केट एडवाइजर बताकर किन-किन लोगों से संपर्क किया गया और उन्हें निवेश के नाम पर क्या भरोसा दिया गया था। कथित धोखाधड़ी की पूरी कार्यप्रणाली सामने आने के बाद मामले का दायरा और स्पष्ट होगा।
नीलेश के साथ दीपक आहूजा उर्फ दीपू टैंक को भी गिरफ्तार किया गया है। पुलिस दोनों की कथित भूमिकाओं की अलग-अलग जांच कर रही है। यह पता लगाया जा रहा है कि वित्तीय नेटवर्क के संचालन और लोगों से संपर्क करने में किसकी क्या भूमिका थी।
पुलिस के मुताबिक दोनों संदिग्धों से करीब 35 लाख रुपये मूल्य की संपत्ति बरामद की गई है। इनमें एक कार, लैपटॉप और मोबाइल फोन शामिल बताए गए हैं।
बरामद लैपटॉप और मोबाइल फोन मामले में महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य साबित हो सकते हैं। इन उपकरणों में बैंक खातों, कंपनियों, निवेशकों या अन्य लोगों से संबंधित जानकारी मिलने की संभावना है। हालांकि इनमें वास्तव में क्या डेटा मिला है, इसकी पुष्टि जांच के बाद ही होगी।
डिजिटल उपकरणों की फोरेंसिक जांच से ई-मेल, दस्तावेज, संदेश और वित्तीय रिकॉर्ड जैसी जानकारी सामने आ सकती है। इससे कथित नेटवर्क के अन्य सदस्यों और लेनदेन की कड़ियों का पता लगाने में मदद मिल सकती है।
पुलिस ने आरोपियों से जुड़े बताए जा रहे 65 बैंक खातों में मौजूद करीब 20 लाख रुपये की रकम भी फ्रीज कर दी है। इससे इन खातों से आगे लेनदेन पर रोक लग गई है।
अब इन खातों की बैंकिंग हिस्ट्री की जांच महत्वपूर्ण होगी। सात साल की अवधि और उससे पहले हुए लेनदेन को खंगालकर यह पता लगाया जा सकता है कि कुल कितनी रकम इन खातों से होकर गुजरी और पैसा आखिर किन लोगों या संस्थाओं तक पहुंचा।
मामले में हांगकांग का कनेक्शन सामने आने से जांच का दायरा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेनदेन तक पहुंच सकता है। यदि विदेशी खातों या संस्थाओं से संबंधित लेनदेन की पुष्टि होती है तो आवश्यक प्रक्रियाओं के तहत संबंधित रिकॉर्ड जुटाए जा सकते हैं।
करीब 14.5 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी की रकम और अभी तक बरामद या फ्रीज की गई संपत्ति के बीच बड़ा अंतर है। ऐसे में पुलिस के लिए बाकी रकम का पता लगाना भी जांच का प्रमुख हिस्सा होगा।
यह देखा जाएगा कि कथित रकम संपत्तियों में निवेश की गई, अलग-अलग खातों में भेजी गई या किसी अन्य तरीके से इस्तेमाल हुई। बैंकिंग रिकॉर्ड और डिजिटल उपकरण इस संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी दे सकते हैं।
दस महीने की निगरानी के बाद हुई गिरफ्तारी पुलिस के लिए महत्वपूर्ण सफलता मानी जा रही है। सात साल से गिरफ्तारी से बच रहे आरोपी तक पहुंचने के लिए पुराने रिकॉर्ड के साथ उसकी हाल की गतिविधियों को जोड़ना पड़ा।
पुलिस अब गिरफ्तार दोनों आरोपियों से पूछताछ के जरिए नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की जानकारी जुटा सकती है। यदि जांच में अन्य व्यक्तियों की भूमिका सामने आती है तो मामले में आगे और गिरफ्तारियां या कार्रवाई संभव हो सकती है।
हालांकि सभी आरोप अभी जांच और न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं। गिरफ्तार व्यक्तियों के खिलाफ लगाए गए आरोप अदालत में साबित होना बाकी हैं। उनका पक्ष सामने आने पर मामले से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी स्पष्ट हो सकती है।
फिलहाल ‘ऑपरेशन हॉक आई’ के तहत नीलेश धीरूभाई पटेल और दीपक आहूजा उर्फ दीपू टैंक की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की नजर कथित वित्तीय नेटवर्क पर है। 65 बैंक खाते, करीब 20 शेल कंपनियां और करोड़ों रुपये के कथित लेनदेन की कड़ियां अब जांच के केंद्र में हैं।