ग्वालियर। स्वतंत्रता दिवस पर देश के अलग-अलग हिस्सों में ग्वालियर के कारीगरों द्वारा तैयार किए गए खादी के तिरंगे फहराए जाएंगे। मध्य भारत खादी संघ में बनाए गए राष्ट्रीय ध्वज मध्य प्रदेश सहित करीब 18 राज्यों और रक्षा बलों के विभिन्न ठिकानों तक भेजे गए हैं। इस बार मांग पूरी करने के लिए 196 कारीगरों ने कई दिनों तक लगातार काम किया। संस्था ने 70 लाख रुपये से अधिक मूल्य के तिरंगों की आपूर्ति करने का दावा किया है।
ग्वालियर स्थित मध्य भारत खादी संघ को भारतीय मानक ब्यूरो के निर्धारित मानकों के अनुसार खादी के राष्ट्रीय ध्वज बनाने का लाइसेंस मिला हुआ है। यह उत्तर भारत में बीआईएस प्रमाणित खादी तिरंगे तैयार करने वाले प्रमुख संस्थानों में शामिल है। यहां बनाए गए तिरंगे मध्य प्रदेश के साथ उत्तर प्रदेश दिल्ली राजस्थान बिहार छत्तीसगढ़ गुजरात और दक्षिण भारत के विभिन्न राज्यों में भेजे जाते हैं।
हालांकि कुछ रिपोर्टों में लाल किले पर ग्वालियर में तैयार तिरंगा फहराए जाने का दावा किया गया है लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। केंद्र सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर पर फहराया जाने वाला रेशमी राष्ट्रीय ध्वज आयुध वस्त्र निर्माणी शाहजहांपुर में तैयार किया जाता रहा है। इसलिए लाल किले से संबंधित दावे को आधिकारिक पुष्टि के बिना तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
मध्य भारत खादी संघ का इतिहास करीब एक शताब्दी पुराना बताया जाता है। संस्था की शुरुआत वर्ष 1925 में चरखा संघ के रूप में हुई थी। शुरुआती वर्षों में यहां प्रतिवर्ष लगभग 10 से 12 हजार राष्ट्रीय ध्वज तैयार किए जाते थे। समय के साथ खादी के प्रमाणित तिरंगों की मांग बढ़ी और अब संस्था हर वर्ष करीब 20 से 30 हजार ध्वज तैयार करती है।
इस वर्ष संस्था ने 70 लाख रुपये से अधिक मूल्य के राष्ट्रीय ध्वजों की आपूर्ति की है। यह आंकड़ा पिछले साल के मुकाबले करीब 25 प्रतिशत अधिक बताया गया है। बड़ी संख्या में मिले ऑर्डर पूरे करने के लिए 196 कारीगरों ने धागा तैयार करने से लेकर बुनाई रंगाई सिलाई और गुणवत्ता जांच तक की जिम्मेदारी संभाली। संस्था के मुताबिक एक मानक तिरंगा पूरी तरह तैयार होने में करीब पांच से छह दिन का समय लग सकता है।
तिरंगा बनाने की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। सबसे पहले निर्धारित गुणवत्ता वाला धागा तैयार किया जाता है। इसके बाद उससे कपड़े की बुनाई होती है। कपड़े को भगवा सफेद और हरे रंग में निर्धारित मानकों के मुताबिक रंगा जाता है। अशोक चक्र की बनावट और उसकी तीलियों का आकार भी नियमों के अनुसार रखा जाता है। इसके बाद तीनों पट्टियों को तय अनुपात में जोड़कर सिलाई की जाती है।
राष्ट्रीय ध्वज तैयार होने के बाद उसके रंग आकार कपड़े की मजबूती सिलाई और अनुपात की जांच की जाती है। संस्था का दावा है कि प्रत्येक तिरंगे को करीब 20 से 25 स्तरों की गुणवत्ता जांच से गुजरना पड़ता है। सभी मानकों पर सही पाए जाने के बाद ही उसे आपूर्ति के लिए भेजा जाता है। सरकारी और आधिकारिक प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल होने वाले राष्ट्रीय ध्वज का बीआईएस की विशिष्टताओं के अनुरूप होना जरूरी है।
संघ में लगभग नौ से दस आकार के तिरंगे तैयार किए जाते हैं। इनमें दो गुणा तीन फीट और छह गुणा चार फीट आकार के राष्ट्रीय ध्वजों की मांग अधिक रहती है। इसके अलावा संवैधानिक पदाधिकारियों और अधिकृत अधिकारियों के वाहनों पर लगाए जाने वाले छोटे आकार के झंडे भी बनाए जाते हैं। प्रत्येक आकार के लिए लंबाई चौड़ाई रंग और अशोक चक्र से संबंधित निर्धारित माप का पालन किया जाता है।
देश में बीआईएस लाइसेंस प्राप्त खादी तिरंगा निर्माण संस्थानों की संख्या को लेकर भी अलग-अलग दावे किए जाते हैं। केंद्र सरकार ने जुलाई 2023 में राज्यसभा को बताया था कि उस समय चार खादी संस्थानों के पास भारतीय मानक के राष्ट्रीय ध्वज बनाने का लाइसेंस था। इनमें हुब्बल्ली ग्वालियर मुंबई और धारवाड़ की संस्थाएं शामिल थीं। ग्वालियर का मध्य भारत खादी संघ इनमें प्रमुख स्थान रखता है। स्वतंत्रता दिवस पर इन तिरंगों के साथ 196 कारीगरों की मेहनत और खादी की परंपरा भी देशभर में दिखाई देगी।