इंदौर :  मेट्रो की बिजली जरूरतों को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। मेट्रो परियोजना को बिजली उपलब्ध कराने के लिए जैतपुरा से एमआर-10 तक लगभग 13 किलोमीटर लंबा एक्स्ट्रा हाई वोल्टेज (ईएचवी) ट्रांसमिशन कॉरिडोर तैयार किया गया है। शहर के बड़े मास रैपिड ट्रांजिट प्रोजेक्ट के लिए आवश्यक बिजली ढांचा विकसित करने की दिशा में इसे एक अहम कदम माना जा रहा है।

मध्य प्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी यानी एमपी ट्रांसको ने 132 केवी क्षमता वाली डबल-सर्किट कम्पोजिट ट्रांसमिशन लाइन का निर्माण किया है। यह लाइन एमआर-10 पर प्रस्तावित मेट्रो रिसीविंग सबस्टेशन को बिजली की आपूर्ति करेगी। इस ट्रांसमिशन व्यवस्था को इंदौर मेट्रो के फेज-I इंफ्रास्ट्रक्चर की बिजली जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है।

मेट्रो जैसी आधुनिक सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को चलाने के लिए लगातार और विश्वसनीय बिजली आपूर्ति जरूरी होती है। ट्रेन संचालन के साथ स्टेशन, सिग्नल प्रणाली, नियंत्रण कक्ष और मेट्रो से जुड़े अन्य तकनीकी ढांचे के लिए मजबूत विद्युत नेटवर्क की आवश्यकता होती है। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए जैतपुरा से एमआर-10 तक विशेष ट्रांसमिशन कॉरिडोर बनाया गया है।

132 केवी की डबल-सर्किट लाइन

करीब 13 किलोमीटर लंबी यह ट्रांसमिशन लाइन 132 केवी डबल-सर्किट कम्पोजिट प्रणाली पर आधारित है। डबल-सर्किट व्यवस्था के कारण एक ही कॉरिडोर के माध्यम से बिजली पहुंचाने के लिए दो सर्किट उपलब्ध होते हैं। इससे ट्रांसमिशन नेटवर्क की क्षमता और विश्वसनीयता को मजबूत करने में सहायता मिलती है।

एमआर-10 पर प्रस्तावित मेट्रो रिसीविंग सबस्टेशन इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। जैतपुरा की तरफ से आने वाली हाई वोल्टेज बिजली इस रिसीविंग सबस्टेशन तक पहुंचेगी। इसके बाद मेट्रो परियोजना की जरूरत के अनुसार बिजली को नियंत्रित और वितरित किया जा सकेगा।

यह लाइन उस व्यापक ट्रांसमिशन नेटवर्क का हिस्सा है, जिसे मेट्रो के पहले चरण के लिए विकसित किया जा रहा है। इस व्यवस्था का उद्देश्य मेट्रो संचालन के लिए आवश्यक बिजली आपूर्ति का मजबूत आधार तैयार करना है। इससे परियोजना के अन्य बिजली संबंधी ढांचे को भी निर्धारित योजना के अनुसार जोड़ा जा सकेगा।

घनी आबादी के कारण सामने आई चुनौती

ट्रांसमिशन कॉरिडोर का एक बड़ा हिस्सा घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों से होकर गुजरता है। ऐसे क्षेत्रों में पारंपरिक ट्रांसमिशन लाइन के लिए पर्याप्त जगह प्राप्त करना बड़ी चुनौती होती है। सामान्य टावरों के निर्माण के लिए अपेक्षाकृत अधिक भूमि और चौड़े कॉरिडोर की जरूरत पड़ती है, जबकि आबादी वाले इलाकों में खाली स्थान सीमित होता है।

सड़कों, आवासीय और व्यावसायिक इलाकों तथा पहले से मौजूद शहरी सुविधाओं के बीच ट्रांसमिशन लाइन का मार्ग तैयार करना तकनीकी रूप से जटिल काम था। इसके लिए ऐसा डिजाइन आवश्यक था, जो कम जगह में तैयार हो सके और निर्धारित विद्युत मानकों को भी पूरा करे।

कॉरिडोर की योजना बनाते समय उपलब्ध स्थान के साथ आसपास के शहरी ढांचे का ध्यान रखा गया। एमपी ट्रांसको ने पारंपरिक ढांचे के स्थान पर अलग-अलग हिस्सों की जरूरत के अनुसार आधुनिक तकनीकी विकल्पों का इस्तेमाल किया। इससे सीमित जगह में भी ईएचवी लाइन का मार्ग विकसित करना संभव हुआ।

नैरो-बेस और मोनोपोल टावरों का इस्तेमाल

जगह की कमी से निपटने के लिए कॉरिडोर में नैरो-बेस टावर लगाए गए हैं। इन टावरों का आधार पारंपरिक ट्रांसमिशन टावरों की तुलना में कम स्थान घेरता है। इससे उन इलाकों में लाइन तैयार करने में सुविधा मिली, जहां बड़े आधार वाले सामान्य टावरों के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध नहीं थी।

इसके अलावा मोनोपोल टावर तकनीक का भी उपयोग किया गया है। मोनोपोल संरचना एक मुख्य खंभे पर आधारित होती है और इसके लिए अपेक्षाकृत कम जगह की आवश्यकता होती है। घनी आबादी वाले क्षेत्रों और सीमित मार्गों में ऐसी संरचनाएं उपयोगी साबित होती हैं।

नैरो-बेस और मोनोपोल टावरों का चयन कॉरिडोर की भौगोलिक तथा शहरी परिस्थितियों के आधार पर किया गया। तकनीकी डिजाइन में यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया कि कम जगह में ट्रांसमिशन लाइन तैयार करने के साथ इसकी मजबूती और उपयोगिता भी बनी रहे।

अंडरग्राउंड केबल तकनीक भी अपनाई

कॉरिडोर के जिन हिस्सों में ऊपर से ट्रांसमिशन लाइन ले जाना व्यावहारिक नहीं था, वहां अंडरग्राउंड केबल तकनीक का इस्तेमाल किया गया। जमीन के नीचे केबल बिछाने से घने शहरी क्षेत्र में उपलब्ध सीमित जगह का बेहतर उपयोग किया जा सकता है।

अंडरग्राउंड केबल व्यवस्था के लिए मार्ग की तकनीकी स्थिति, दूसरी भूमिगत सुविधाओं और रखरखाव की जरूरतों को ध्यान में रखना होता है। कॉरिडोर के डिजाइन में इन पहलुओं के अनुसार योजना तैयार की गई। इस प्रकार परियोजना में ओवरहेड ट्रांसमिशन संरचनाओं और भूमिगत केबल का संयुक्त उपयोग किया गया है।

इसी कारण इसे कम्पोजिट ट्रांसमिशन लाइन कहा गया है। अलग-अलग क्षेत्रों की जरूरत के अनुसार टावर, मोनोपोल और भूमिगत केबल जैसी तकनीकों को एक ही कॉरिडोर में शामिल किया गया है। यह व्यवस्था शहरी क्षेत्र की व्यावहारिक चुनौतियों के अनुरूप तैयार की गई है।

मेट्रो के फेज-I को मिलेगा बिजली नेटवर्क

इस ट्रांसमिशन कॉरिडोर से इंदौर मेट्रो के फेज-I इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए आवश्यक विद्युत नेटवर्क को मजबूती मिलेगी। परियोजना के संचालन में बिजली की निरंतर उपलब्धता महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। एमआर-10 पर प्रस्तावित रिसीविंग सबस्टेशन तक 132 केवी लाइन पहुंचने से मेट्रो के लिए अलग और व्यवस्थित बिजली व्यवस्था विकसित होगी।

शहरी परिवहन से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट के लिए रेल ट्रैक, स्टेशन और अन्य भौतिक ढांचे के साथ बिजली आपूर्ति की तैयारी भी जरूरी होती है। जैतपुरा से एमआर-10 तक बनाया गया यह कॉरिडोर इसी आधारभूत तैयारी का हिस्सा है।

करीब 13 किलोमीटर लंबे इस ईएचवी कॉरिडोर में अपनाई गई तकनीक यह दिखाती है कि घनी आबादी वाले इलाके में सीमित स्थान के बावजूद ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जा सकता है। नैरो-बेस टावर, मोनोपोल टावर और अंडरग्राउंड केबल के संयुक्त इस्तेमाल से परियोजना को शहरी परिस्थितियों के अनुरूप तैयार किया गया है। यह कॉरिडोर मेट्रो के पहले चरण के लिए जरूरी बिजली आपूर्ति प्रणाली की महत्वपूर्ण कड़ी बनेगा।

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