बेंगलुरु। कर्नाटक में इस साल मानसून की कमजोर स्थिति ने राज्य के बड़े हिस्से में सूखे जैसे हालात पैदा कर दिए हैं। उपमुख्यमंत्री और राजस्व मंत्री जी. परमेश्वर ने सोमवार को विधानसभा में राज्य की बारिश और सूखे की स्थिति पर बयान पेश करते हुए बताया कि प्रदेश के 240 तालुकों में से 175 में सामान्य से कम बारिश हुई है, जबकि 14 तालुकों में बारिश की भारी कमी दर्ज की गई है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 1 जून से 24 अगस्त के बीच राज्य में सामान्य तौर पर होने वाली बारिश की तुलना में करीब 31 प्रतिशत कम वर्षा हुई है।

परमेश्वर ने विधानसभा को बताया कि 1 जून से 24 अगस्त के बीच राज्य में 654 मिलीमीटर बारिश होने की उम्मीद थी, लेकिन इस अवधि में केवल 454 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। यानी राज्य में सामान्य से करीब 200 मिलीमीटर कम बारिश हुई है। बारिश की इस कमी का असर खेती, पेयजल और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।

240 में से 175 तालुकों में बारिश कम

राज्य सरकार की ओर से विधानसभा में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, कर्नाटक के 240 तालुकों में से 175 तालुकों में बारिश सामान्य से कम रही है। वहीं 14 तालुकों की स्थिति इससे भी ज्यादा चिंताजनक बताई गई है, जहां बारिश में भारी कमी दर्ज की गई है।

बारिश की कमी का सीधा असर कृषि गतिविधियों पर पड़ सकता है। कर्नाटक के कई हिस्सों में खेती मुख्य रूप से मानसूनी बारिश पर निर्भर है। ऐसे में मानसून के कमजोर रहने से बुवाई, फसल की बढ़वार और सिंचाई व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन इलाकों में किसानों और ग्रामीण आबादी की जरूरतों को पूरा करने की होगी जहां बारिश लगातार कम हुई है।

उत्तर कर्नाटक में 31% कमी

परमेश्वर के मुताबिक, नॉर्थ इंटीरियर कर्नाटक में बारिश में 31 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। यह क्षेत्र राज्य के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में शामिल है और यहां मानसून की बारिश खेती के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है।

बारिश में कमी के कारण किसानों को फसल बचाने के लिए वैकल्पिक सिंचाई स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ सकता है। यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

दक्षिण कर्नाटक सबसे ज्यादा प्रभावित

दक्षिण आंतरिक कर्नाटक में बारिश की कमी 41 प्रतिशत बताई गई है। यह राज्य के विभिन्न हिस्सों में दर्ज की गई कम बारिश के आंकड़ों में सबसे ज्यादा है।

इस क्षेत्र में सामान्य से काफी कम बारिश होने से कृषि और जल स्रोतों पर दबाव बढ़ने की संभावना है। ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों, जलाशयों और अन्य स्थानीय जल स्रोतों में पानी की उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है।

सरकार के लिए दक्षिण आंतरिक कर्नाटक के उन तालुकों पर विशेष ध्यान देना जरूरी होगा जहां लगातार कम बारिश हुई है और किसानों को फसल बचाने के लिए पानी की जरूरत है।

मलनाड में भी 35% कम बारिश

कर्नाटक के मलनाड क्षेत्र को आमतौर पर अधिक बारिश वाले इलाकों में गिना जाता है, लेकिन इस साल यहां भी सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई है। परमेश्वर ने बताया कि मलनाड क्षेत्र में बारिश की कमी 35 प्रतिशत रही है।

मलनाड की भौगोलिक परिस्थितियों और कृषि गतिविधियों को देखते हुए बारिश की कमी का असर जल स्रोतों और खेती पर पड़ सकता है। इस क्षेत्र में भी सरकार को स्थानीय स्तर पर पानी की उपलब्धता और कृषि स्थिति की निगरानी करनी होगी।

तटीय क्षेत्र में 24% कमी

कर्नाटक के तटीय इलाकों में भी सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है। यहां बारिश में करीब 24 प्रतिशत की कमी बताई गई है। हालांकि यह अन्य क्षेत्रों की तुलना में कम है, लेकिन मानसून के पूरे मौसम में बारिश की कमी बनी रहने पर इसका असर जल संसाधनों और कृषि पर पड़ सकता है।

तटीय क्षेत्रों में भारी बारिश की सामान्य स्थिति की तुलना में इस तरह की कमी स्थानीय जल चक्र को भी प्रभावित कर सकती है।

किसानों के सामने बढ़ी चुनौती

मानसून की कमी का सबसे सीधा प्रभाव किसानों पर पड़ता है। समय पर और पर्याप्त बारिश नहीं होने से फसलों की बुवाई और बढ़वार प्रभावित हो सकती है। कई क्षेत्रों में किसान सिंचाई के लिए भूजल और जलाशयों पर निर्भर होते हैं, लेकिन लंबे समय तक बारिश की कमी से इन स्रोतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।

यदि आने वाले सप्ताहों में अच्छी बारिश नहीं होती है तो सरकार को किसानों के लिए राहत उपायों पर विचार करना पड़ सकता है। इसमें फसल की स्थिति का आकलन, प्रभावित क्षेत्रों की पहचान और जरूरत के अनुसार राहत सहायता शामिल हो सकती है।

सरकार की निगरानी बढ़ी

विधानसभा में सरकार की ओर से बारिश की स्थिति का आंकड़ा पेश किया जाना इस बात का संकेत है कि प्रशासन राज्य में मानसून की स्थिति पर नजर रख रहा है। 175 तालुकों में बारिश की कमी और 14 तालुकों में भारी कमी के आंकड़े सरकार के लिए चिंता का विषय हैं।

आने वाले दिनों में बारिश की स्थिति इस बात का निर्धारण करेगी कि मौजूदा कमी किस हद तक सूखे की स्थिति में बदलती है। यदि मानसून के बाकी हिस्से में पर्याप्त बारिश होती है तो कुछ क्षेत्रों में स्थिति में सुधार संभव है। लेकिन लगातार कमी बनी रहने पर सरकार को व्यापक राहत और जल प्रबंधन उपाय करने पड़ सकते हैं।

पेयजल पर भी असर की आशंका

बारिश की कमी केवल कृषि तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक कम बारिश होने पर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पेयजल की उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है। जलाशयों में पानी का स्तर कम होने से गर्मी के अगले मौसम में स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

ऐसे में सरकार के लिए मौजूदा बारिश की स्थिति के साथ-साथ जलाशयों और भूजल स्तर की भी निगरानी महत्वपूर्ण होगी।

कुल मिलाकर, कर्नाटक में इस मानसून अब तक बारिश की कमी ने राज्य के बड़े हिस्से में चिंता बढ़ा दी है। 1 जून से 24 अगस्त के बीच सामान्य 654 मिलीमीटर के मुकाबले 454 मिलीमीटर बारिश होना 31 प्रतिशत की कमी को दर्शाता है। दक्षिण आंतरिक कर्नाटक में 41 प्रतिशत, मलनाड में 35 प्रतिशत और उत्तर आंतरिक कर्नाटक में 31 प्रतिशत कमी दर्ज की गई है। अब सरकार की नजर मानसून के शेष दिनों में होने वाली बारिश पर है। पर्याप्त बारिश होने पर स्थिति सुधर सकती है, लेकिन कमी जारी रही तो किसानों, जल संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव और बढ़ने की आशंका है।

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