भाजपा की निलंबन मांग पर गृह मंत्री का जवाब, कहा—दबाव में नहीं होगी कार्रवाई
बेंगलुरु। कर्नाटक के मैसूर जिले के टी. नरसीपुर पुलिस थाने के इंस्पेक्टर धनंजय से जुड़ा गणेशोत्सव विवाद अब पूरी तरह राजनीतिक रूप ले चुका है। विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने इंस्पेक्टर को तत्काल निलंबित करने की मांग की है। इस पर राज्य के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने स्पष्ट किया कि केवल भाजपा की मांग के आधार पर किसी पुलिस अधिकारी को निलंबित नहीं किया जा सकता। मामले में पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट मिलने और तथ्यों की जांच के बाद ही उचित निर्णय लिया जाएगा।
प्रियांक खड़गे ने कहा कि सरकार किसी राजनीतिक दल के निर्देश पर प्रशासन नहीं चलाती। यदि किसी अधिकारी ने नियमों का उल्लंघन किया है या अनुचित व्यवहार किया है तो निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि संबंधित पुलिस अधीक्षक से रिपोर्ट मांगी गई है। रिपोर्ट में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर सरकार यह तय करेगी कि इंस्पेक्टर के खिलाफ विभागीय या अन्य कार्रवाई की आवश्यकता है या नहीं।
विवाद टी. नरसीपुर में गणेशोत्सव के आयोजकों के साथ हुई एक बैठक से जुड़ा है। आरोप है कि इंस्पेक्टर धनंजय ने आयोजकों को मस्जिद के सामने से गणेश जुलूस निकालने, नारे लगाने और पटाखे फोड़ने को लेकर सख्त चेतावनी दी थी। उनके कथित बयान के वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित होने के बाद भाजपा नेताओं ने इसे हिंदू त्योहार पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाने की कोशिश बताया। हालांकि, विवादित बातचीत की परिस्थितियों और पुलिस की ओर से जारी वास्तविक निर्देशों की आधिकारिक जांच अभी बाकी है।
कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने मामले को लेकर सरकार और पुलिस प्रशासन पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि गणेशोत्सव के आयोजकों के साथ इंस्पेक्टर का व्यवहार अनुचित और धमकी भरा था। अशोक ने टी. नरसीपुर पहुंचकर भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ प्रदर्शन किया और इंस्पेक्टर धनंजय को तत्काल निलंबित करने की मांग की। भाजपा ने यह सवाल भी उठाया कि शांतिपूर्ण धार्मिक आयोजन और परंपरागत मार्ग से निकाले जाने वाले जुलूस पर पाबंदियां क्यों लगाई जा रही हैं।
भाजपा की मांग पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रियांक खड़गे ने पूर्व गृह मंत्री आर. अशोक के कार्यकाल का उल्लेख किया। उन्होंने सवाल किया कि जब अशोक गृह मंत्री थे, तब क्या पुलिस अधिकारियों के साथ शांति बैठकों का आयोजन नहीं किया जाता था और क्या धार्मिक आयोजनों के दौरान सुरक्षा संबंधी निर्देश जारी नहीं किए जाते थे? खड़गे ने कहा कि अशोक के कार्यकाल में लागू नियम आज भी वही हैं। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को आयोजकों के साथ बैठक करने और आवश्यक शर्तें बताने का अधिकार है।
गृह मंत्री ने यह भी कहा कि धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन के साथ सार्वजनिक सुरक्षा और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। संवेदनशील इलाकों में जुलूस का मार्ग, ध्वनि की सीमा, पटाखों का इस्तेमाल और भीड़ नियंत्रण जैसे विषय पुलिस की तैयारियों का हिस्सा होते हैं। उन्होंने संकेत दिया कि केवल नियम समझाना कार्रवाई का आधार नहीं हो सकता, लेकिन यदि अधिकारी की भाषा या व्यवहार मर्यादा के अनुरूप नहीं था तो रिपोर्ट के आधार पर उसका परीक्षण किया जाएगा।
दरअसल, भाजपा का मुख्य विरोध नियम लागू करने से अधिक इंस्पेक्टर के कथित तौर-तरीके और भाषा को लेकर है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि आयोजकों को समझाने के बजाय उन्हें डराने का प्रयास किया गया। भाजपा ने कहा कि पुलिस शांति व्यवस्था से जुड़े निर्देश दे सकती है, लेकिन किसी समुदाय के धार्मिक आयोजन को लेकर अपमानजनक या धमकी भरी भाषा का उपयोग स्वीकार नहीं किया जा सकता। पार्टी ने सरकार पर मामले को हल्के में लेने का आरोप भी लगाया है।
दूसरी ओर, कांग्रेस का कहना है कि भाजपा गणेशोत्सव के विषय को राजनीतिक विवाद में बदलने की कोशिश कर रही है। सत्तारूढ़ दल के नेताओं के मुताबिक धार्मिक जुलूसों के दौरान पुलिस द्वारा आयोजकों के साथ बैठक करना सामान्य प्रक्रिया है। ऐसे आयोजनों में विभिन्न समुदायों के धार्मिक स्थलों, यातायात व्यवस्था और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दिशा-निर्देश दिए जाते हैं। कांग्रेस नेताओं ने भाजपा पर जांच पूरी होने से पहले ही अधिकारी को दोषी घोषित करने का आरोप लगाया।
विवाद के बीच इंस्पेक्टर धनंजय से जुड़े कुछ पुराने आरोप और तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रही हैं। इनमें पूछताछ के दौरान लोगों से कथित मारपीट किए जाने के आरोप शामिल हैं। इन पुराने दावों की वर्तमान स्थिति और सत्यता की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। ऐसे में उन्हें प्रमाणित तथ्य मानने के बजाय जांच के दायरे में आने वाले आरोपों के रूप में देखा जाना जरूरी है।
पूरे मामले में अब मैसूर जिला पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रिपोर्ट में आयोजकों के साथ हुई बैठक, वायरल वीडियो के संदर्भ, इंस्पेक्टर द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्दों और क्षेत्र की कानून-व्यवस्था संबंधी परिस्थितियों का विवरण शामिल हो सकता है। गृह मंत्री ने निलंबन की मांग को तत्काल स्वीकार करने से इनकार जरूर किया है, लेकिन अधिकारी को पूरी तरह दोषमुक्त भी घोषित नहीं किया। उन्होंने साफ किया कि फैसला राजनीतिक दबाव के बजाय रिपोर्ट और नियमों के आधार पर होगा।
इस विवाद ने एक बार फिर धार्मिक आयोजनों के दौरान पुलिस की भूमिका, अधिकारियों की भाषा और राजनीतिक हस्तक्षेप की सीमा पर बहस खड़ी कर दी है। अब निगाहें एसपी की रिपोर्ट और उसके बाद राज्य सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदम पर टिकी हैं।