बेंगलुरु: कर्नाटक में इंसान और हाथियों के बीच बढ़ता टकराव गंभीर मानवीय और वन्यजीव संकट बन गया है। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया यानी WII की नई रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2000 से 2025 के बीच मानव-हाथी संघर्ष से जुड़ी घटनाओं में 522 लोगों और 216 हाथियों की मौत दर्ज की गई। इस तरह 25 वर्षों में दोनों तरफ कुल 738 जानें गईं। इन आंकड़ों के अनुसार औसतन हर महीने करीब ढाई लोगों या हाथियों की मौत हुई।
देहरादून स्थित WII और केंद्रीय पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के प्रोजेक्ट एलिफेंट डिवीजन ने मिलकर यह अध्ययन किया है। “ह्यूमन-एलिफेंट कॉन्फ्लिक्ट इन द स्टेट ऑफ कर्नाटक 2000-2025: ट्रेंड्स चैलेंजेज एंड इनसाइट्स” नाम की यह तकनीकी रिपोर्ट 92 पृष्ठों की है। इसे अगस्त 2026 में विश्व हाथी दिवस के अवसर पर जारी किया गया था।
शोधकर्ताओं ने उन प्रमुख वन मंडलों के आंकड़ों का अध्ययन किया जहां जंगली हाथियों की मौजूदगी है। मानव मौतों और हाथियों की मृत्यु के मामलों के साथ संघर्ष के स्थानों, मौसमी स्वरूप और संभावित कारणों का विश्लेषण किया गया। इसके लिए वर्ष 2000 से 2025 के बीच भूमि उपयोग और भूमि आवरण में आए बदलावों को भी देखा गया। अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि संघर्ष किन क्षेत्रों में ज्यादा केंद्रित है और उसके पीछे कौन से कारक काम कर रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार मानव-हाथी संघर्ष पूरे प्रदेश में समान रूप से नहीं फैला है। इसकी घटनाएं कुछ विशेष वन क्षेत्रों और उनसे सटी बस्तियों में अधिक केंद्रित हैं। वन क्षेत्र के आसपास कृषि गतिविधियों के विस्तार, नई बस्तियों, सड़कों, रेल मार्गों और बिजली के ढांचे ने हाथियों के प्राकृतिक आवागमन को प्रभावित किया है। हाथियों के पारंपरिक गलियारों में रुकावट आने पर उनके खेतों और आबादी वाले इलाकों में पहुंचने की आशंका बढ़ जाती है।
हाथी भोजन और पानी की तलाश में लंबी दूरी तय करते हैं। जंगलों के बीच संपर्क टूटने या उनके रास्ते में निर्माण होने पर उन्हें वैकल्पिक मार्ग अपनाना पड़ता है। कई बार ये मार्ग गांवों, खेतों और सड़कों से होकर गुजरते हैं। खेतों में धान, गन्ना, केला और दूसरी फसलें हाथियों को आकर्षित कर सकती हैं। फसल बचाने के प्रयास में ग्रामीणों और हाथियों का आमना-सामना होने पर स्थिति जानलेवा बन सकती है।
मानव-हाथी संघर्ष केवल मौतों तक सीमित नहीं है। इसके कारण लोग घायल होते हैं, मकानों और अनाज भंडार को नुकसान पहुंचता है तथा खड़ी फसलें बर्बाद हो जाती हैं। जंगल के किनारे रहने वाले परिवारों के लिए फसल का नुकसान आजीविका का बड़ा संकट बन सकता है। दूसरी ओर संघर्ष के दौरान बिजली का करंट, वाहनों की टक्कर, रेल दुर्घटनाएं और जवाबी हमले हाथियों की मौत का कारण बन सकते हैं।
अध्ययन ने अलग-अलग अवधियों में भूमि उपयोग के परिवर्तन और संघर्ष की घटनाओं के बीच संबंध समझने का प्रयास किया है। जंगल का कृषि भूमि या बसाहट में बदलना तथा प्राकृतिक गलियारों में निर्माण का विस्तार संघर्ष का जोखिम बढ़ा सकता है। हालांकि हर घटना के पीछे केवल एक कारण नहीं होता। स्थानीय भूगोल, मौसम, फसल का प्रकार, पानी की उपलब्धता और हाथियों के झुंड का व्यवहार भी इसमें भूमिका निभाता है।
WII ने कहा है कि संघर्ष वाले हॉटस्पॉट की सटीक पहचान कर वहां प्राथमिकता के आधार पर कदम उठाने की जरूरत है। एक ही उपाय सभी क्षेत्रों में प्रभावी नहीं हो सकता। किसी स्थान पर समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणाली उपयोगी हो सकती है तो कहीं हाथी गलियारे को सुरक्षित करना अधिक जरूरी होगा। सड़क और रेल मार्गों पर हाथियों के आवागमन वाले स्थानों की पहचान कर वाहनों की गति नियंत्रित करने तथा चेतावनी संकेत लगाने जैसे उपाय भी किए जा सकते हैं।
वन विभाग और स्थानीय समुदायों के बीच बेहतर समन्वय को संघर्ष कम करने की प्रमुख जरूरत माना गया है। हाथियों की गतिविधियों की सूचना गांवों तक तेजी से पहुंचने पर लोग सुरक्षित स्थानों पर जा सकते हैं। मोबाइल संदेश, स्थानीय अलर्ट नेटवर्क, थर्मल या कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित कैमरे, ड्रोन और प्रशिक्षित त्वरित प्रतिक्रिया दल इस व्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं। इसके साथ ही उपकरणों की नियमित देखरेख और ग्रामीणों को उनका प्रशिक्षण देना भी आवश्यक है।
रिपोर्ट में बिजली संबंधी बुनियादी ढांचे की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया है। जंगल से सटे इलाकों में लटकते तार, असुरक्षित बिजली कनेक्शन और अवैध विद्युतीकृत बाड़ हाथियों के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं। ऐसी व्यवस्थाओं की नियमित जांच और दोषियों पर प्रभावी कानूनी कदम उठाना जरूरी है। संघर्ष रोकने के लिए लगाई जाने वाली खाई या बाड़ भी वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप होनी चाहिए ताकि वे स्वयं वन्यजीवों के लिए खतरा न बनें।
पीड़ित परिवारों को समय पर मुआवजा देना भी संघर्ष प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। फसल या संपत्ति के नुकसान का आकलन और भुगतान देर से होने पर स्थानीय समुदायों में नाराजगी बढ़ सकती है। दावा प्रक्रिया आसान बनाने तथा नुकसान का शीघ्र सत्यापन करने से संरक्षण प्रयासों में ग्रामीणों का भरोसा बढ़ाया जा सकता है।
WII की रिपोर्ट बताती है कि मानव-हाथी संघर्ष को केवल वन विभाग की समस्या मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। भूमि उपयोग की योजना बनाने वाली संस्थाओं, बिजली कंपनियों, रेलवे, सड़क निर्माण एजेंसियों, स्थानीय प्रशासन और समुदायों को मिलकर काम करना होगा। विकास परियोजनाओं की मंजूरी से पहले हाथियों के गलियारों और उनके आवागमन पर पड़ने वाले प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन जरूरी है।