बेंगलुरु। कर्नाटक में ईसाई समुदाय के प्रतिनिधियों ने कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात कर धर्मांतरण निषेध कानून को निरस्त करने समेत कई मांगें रखी हैं। बेंगलुरु के आर्कबिशप मोस्ट रेव. डॉ. पीटर मचाडो के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने समुदाय से जुड़े मुद्दों पर खड़गे से हस्तक्षेप और समर्थन मांगा। प्रतिनिधियों ने ईसाई समुदाय के लिए पिछड़ा वर्ग श्रेणी के तहत 1 प्रतिशत अलग आरक्षण और राजनीतिक तथा प्रशासनिक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग भी उठाई।
प्रतिनिधिमंडल ने 14 सितंबर को बेंगलुरु में खड़गे से मुलाकात की। इस दौरान कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे भी मौजूद थे। ईसाई नेताओं ने अपनी मांगों को विस्तार से सामने रखते हुए कहा कि राज्य सरकार के स्तर पर इन पर विचार किया जाना चाहिए।
धर्मांतरण निषेध कानून को रद्द करने की मांग
प्रतिनिधिमंडल की प्रमुख मांग कर्नाटक प्रोटेक्शन ऑफ राइट टू फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट को निरस्त करने की रही, जिसे आम तौर पर धर्मांतरण निषेध या एंटी-कन्वर्जन कानून कहा जाता है।
यह कानून पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल में 2022 में पारित हुआ था। कानून में गलत बयानी, बल, अनुचित प्रभाव, जबरदस्ती, प्रलोभन, धोखाधड़ी या विवाह के वादे जैसे माध्यमों से धर्म परिवर्तन कराने पर रोक लगाने के प्रावधान हैं। कांग्रेस सरकार ने 2023 में सत्ता संभालने के बाद इसे निरस्त करने की दिशा में कदम उठाने की बात कही थी, लेकिन कानून अब भी लागू है।
ईसाई प्रतिनिधिमंडल ने कानून के कुछ प्रावधानों को लेकर चिंता जताई। प्रतिनिधियों का कहना है कि इसका प्रभाव संविधान के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता तथा अपनी आस्था का पालन और प्रचार करने के अधिकार पर पड़ सकता है। यह प्रतिनिधिमंडल का पक्ष है, जबकि कानून का घोषित उद्देश्य गैरकानूनी तरीकों से होने वाले धर्मांतरण को रोकना है।
1 प्रतिशत अलग आरक्षण की मांग
ईसाई नेताओं ने खड़गे के सामने दूसरी महत्वपूर्ण मांग आरक्षण को लेकर रखी। प्रतिनिधिमंडल ने पिछड़ा वर्ग श्रेणी के तहत ईसाई समुदाय के लिए 1 प्रतिशत अलग आरक्षण देने पर विचार करने की मांग की।
प्रतिनिधिमंडल ने समुदाय के कुछ वर्गों की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों का हवाला देते हुए कहा कि शिक्षा, रोजगार और विकास के दूसरे क्षेत्रों में अवसर बढ़ाने के लिए अलग व्यवस्था की आवश्यकता है।
रिपोर्टों के मुताबिक वर्तमान व्यवस्था में ईसाई समुदाय के कुछ वर्ग अन्य समुदायों के साथ आरक्षण श्रेणी साझा करते हैं। आर्कबिशप पीटर मचाडो ने अलग 1 प्रतिशत हिस्से की मांग करते हुए कहा कि इससे समुदाय के पात्र लोगों को सरकारी रोजगार और अन्य लाभ हासिल करने में बेहतर अवसर मिल सकेंगे।
आरक्षण में किसी भी बदलाव पर अंतिम फैसला राज्य सरकार को लागू संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए करना होगा।
विधान परिषद में मांगा प्रतिनिधित्व
प्रतिनिधिमंडल ने कर्नाटक विधान परिषद में भी ईसाई समुदाय के प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया। नेताओं ने मांग की कि समुदाय से एक उपयुक्त प्रतिनिधि को विधान परिषद में मनोनीत किया जाए।
प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि विधान परिषद में प्रतिनिधित्व मिलने से समुदाय से जुड़े सामाजिक और दूसरे मुद्दों को विधायी मंच पर उठाने का अवसर मिलेगा। साथ ही राज्य की नीतियों और विकास से जुड़े विषयों पर समुदाय की भागीदारी बढ़ेगी।
ईसाई नेताओं ने इसे केवल राजनीतिक पद से जोड़ने के बजाय निर्णय लेने की प्रक्रिया में समुदाय की भागीदारी के मुद्दे के रूप में पेश किया है।
बोर्ड और निगमों में भी हिस्सेदारी की मांग
प्रतिनिधिमंडल ने सरकारी बोर्डों, निगमों, वैधानिक संस्थाओं और अन्य मनोनीत निकायों में भी ईसाई समुदाय को पर्याप्त और सार्थक प्रतिनिधित्व देने की मांग की।
नेताओं का कहना है कि इन संस्थाओं में उचित भागीदारी होने से समुदाय के लोग सार्वजनिक प्रशासन और राज्य के विकास से जुड़ी प्रक्रिया में अधिक प्रभावी रूप से योगदान दे सकेंगे।
सरकारी बोर्ड और निगम विभिन्न क्षेत्रों में योजनाओं तथा नीतियों के क्रियान्वयन में भूमिका निभाते हैं। ऐसे में प्रतिनिधिमंडल चाहता है कि इन संस्थाओं में होने वाली नियुक्तियों के दौरान ईसाई समुदाय को भी पर्याप्त अवसर दिए जाएं।
प्रतिनिधिमंडल में कई प्रमुख धर्मगुरु शामिल
आर्कबिशप पीटर मचाडो के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल में मंगलुरु के बिशप रेव. डॉ. पीटर पॉल, मैसूर के बिशप रेव. डॉ. फ्रांसिस सेराओ, रेव. फादर अरुण लुईस एसजे, प्रवीण पीटर, एंथनी विक्रम और जे.ए. कंठराज समेत अन्य प्रतिनिधि शामिल थे।
बैठक के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने अपनी मांगों के पीछे सामाजिक, आर्थिक और प्रतिनिधित्व से जुड़े कारण खड़गे के सामने रखे।
खड़गे ने सरकार के सामने मुद्दे उठाने का दिया भरोसा
प्रतिनिधिमंडल के अनुसार मल्लिकार्जुन खड़गे ने उनकी मांगों को विस्तार से सुना और भरोसा दिया कि इन विषयों को कर्नाटक सरकार के संबंधित नेताओं के सामने उठाया जाएगा। उन्होंने मांगों पर उचित स्तर पर विचार किए जाने की बात भी कही।
हालांकि मुलाकात के बाद धर्मांतरण निषेध कानून को निरस्त करने, 1 प्रतिशत आरक्षण देने या अन्य मांगों को स्वीकार करने संबंधी किसी सरकारी फैसले की घोषणा नहीं हुई है। फिलहाल ये ईसाई प्रतिनिधिमंडल की ओर से सरकार के समक्ष रखी गई मांगें हैं।
इस मुलाकात के बाद कर्नाटक में धर्मांतरण निषेध कानून का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक चर्चा में आ गया है। अब नजर राज्य सरकार के रुख पर रहेगी कि वह कानून को लेकर आगे क्या कदम उठाती है और आरक्षण तथा राजनीतिक-प्रशासनिक प्रतिनिधित्व से संबंधित मांगों पर किस तरह विचार करती है।