जमशेदपुर। झारखंड के बहुचर्चित सांसद सुनील महतो हत्याकांड में करीब 19 साल बाद एक महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माओवादी की रीजनल कमेटी के सदस्य रहे रामप्रसाद मार्डी उर्फ सचिन मार्डी ने पश्चिम बंगाल पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने के बाद पूछताछ में इस हत्याकांड में अपनी संलिप्तता स्वीकार करने का दावा किया है। उसने कथित रूप से बताया कि वह सांसद की हत्या के लिए चलाए गए माओवादी ऑपरेशन में शामिल था।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, सचिन मार्डी ने पूछताछ के दौरान दावा किया कि उसने माओवादी राहुल के साथ मिलकर सुनील महतो की हत्या के ऑपरेशन को अंजाम दिया था। उसने संगठन की ओर से किए गए कई अन्य हमलों और हिंसक गतिविधियों में शामिल रहने की बात भी कही है। पुलिस अब उसके बयानों की पुराने मामलों में उपलब्ध साक्ष्यों और दस्तावेजों से पुष्टि कर रही है।
रामप्रसाद मार्डी उर्फ सचिन ने हाल ही में अपनी पत्नी मीता के साथ पश्चिम बंगाल पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। सचिन पर झारखंड सरकार ने 15 लाख रुपये और उसकी पत्नी पर 10 लाख रुपये का इनाम घोषित कर रखा था। दोनों पर कुल 25 लाख रुपये का इनाम था। सचिन लंबे समय से झारखंड और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय बताया जा रहा था।
माओवादी संगठन में सचिन को रीजनल कमेटी सदस्य के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली हुई थी। उसका प्रभाव पूर्वी सिंहभूम के पटमदा, बोड़ाम और एमजीएम क्षेत्र से लेकर पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम एवं पुरुलिया तक बताया जाता है। विभिन्न थानों में उसके खिलाफ माओवादी हिंसा, सुरक्षाबलों पर हमला, लेवी वसूली और अन्य आपराधिक गतिविधियों से संबंधित दर्जनों मामले दर्ज होने की बात कही गई है।
सुनील महतो की हत्या 4 मार्च 2007 को पूर्वी सिंहभूम जिले के घाटशिला अनुमंडल स्थित बाघुड़िया गांव में हुई थी। उस समय वह जमशेदपुर से झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसद थे। सुनील महतो एक फुटबॉल प्रतियोगिता में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने पहुंचे थे। कार्यक्रम के दौरान हथियारबंद माओवादियों ने अचानक हमला कर अंधाधुंध गोलीबारी की थी।
इस हमले में सांसद सुनील महतो के साथ उनके दो अंगरक्षकों और एक पार्टी कार्यकर्ता की भी मौत हो गई थी। हमलावर सुरक्षाकर्मियों के हथियार भी अपने साथ ले गए थे। दिनदहाड़े हुए इस हत्याकांड ने पूरे झारखंड के साथ राष्ट्रीय राजनीति को भी झकझोर दिया था। घटना के पीछे माओवादी संगठन के वरिष्ठ नेताओं और उनके दस्ते की भूमिका सामने आई थी।
हत्याकांड के बाद मामले की जांच अलग-अलग एजेंसियों के पास रही। राज्य की एजेंसियों के अलावा केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने भी मामले की जांच की और आरोपियों के विरुद्ध कार्रवाई की। बाद में वर्ष 2018 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने मामले की जांच अपने हाथ में ली। इसके बावजूद हत्या के पीछे की पूरी साजिश और उसका आदेश देने वाले लोगों से जुड़े कई प्रश्न लंबे समय तक अनसुलझे रहे।
जांच के दौरान माओवादी रंजीत पाल उर्फ राहुल सहित कई लोगों के नाम सामने आए थे। राहुल ने वर्ष 2017 में पश्चिम बंगाल में आत्मसमर्पण कर दिया था। अब सचिन ने कथित रूप से राहुल के साथ मिलकर हत्या को अंजाम देने की बात कही है। इससे जांच एजेंसियों को पुराने घटनाक्रम की कड़ियां जोड़ने में मदद मिल सकती है।
हालांकि पुलिस पूछताछ में किया गया कथित कबूलनामा अपने आप में किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं माना जाता। जांच एजेंसी को उसके बयान के आधार पर स्वतंत्र साक्ष्य जुटाने होंगे। इसके बाद अदालत में उन साक्ष्यों को प्रस्तुत किया जाएगा। आरोपी की जिम्मेदारी और दावे की सत्यता पर अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होगा।
पुलिस सचिन से यह जानकारी जुटाने का प्रयास कर रही है कि सांसद की हत्या की योजना कहां और कब बनाई गई थी। ऑपरेशन में कितने माओवादी शामिल थे, किस व्यक्ति ने हमले का आदेश दिया था और किस तरह सांसद के कार्यक्रम की जानकारी हमलावरों तक पहुंची थी, इन प्रश्नों के जवाब भी तलाशे जा रहे हैं। इसके अलावा वारदात के बाद हमलावर किस रास्ते से भागे और लूटे गए हथियारों का क्या हुआ, इस संबंध में भी पूछताछ हो सकती है।
सचिन ने संगठन के कई अन्य हमलों में शामिल होने की बात भी कथित रूप से स्वीकार की है। पुलिस उसके बयान के आधार पर झारखंड और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में हुई पुरानी माओवादी घटनाओं की फाइलों को दोबारा देख सकती है। संबंधित थानों में दर्ज मामलों और जब्त दस्तावेजों से उसके बयान का मिलान किया जाएगा।
जांच एजेंसियों के लिए सचिन का आत्मसमर्पण इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वह लंबे समय तक माओवादी संगठन की रीजनल कमेटी का सदस्य रहा। संगठन की रणनीति, हथियारों की व्यवस्था, लेवी वसूली, स्थानीय नेटवर्क और शीर्ष माओवादी नेताओं से जुड़े सवालों पर उससे महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की संभावना जताई जा रही है।
सचिन को शीर्ष माओवादी कमांडर असीम मंडल उर्फ आकाश के दस्ते का करीबी और भरोसेमंद सदस्य बताया गया है। सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से उसकी तलाश कर रही थीं। हाल के वर्षों में झारखंड और पश्चिम बंगाल पुलिस के लगातार अभियानों के कारण सीमावर्ती क्षेत्रों में संगठन पर दबाव बढ़ा है। ऐसे समय में सचिन और उसकी पत्नी का आत्मसमर्पण माओवादी संगठन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
सचिन करीब दो दशक से सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर था। अब उससे पूछताछ में सामने आए दावों की जानकारी झारखंड पुलिस और मामले की जांच से जुड़ी केंद्रीय एजेंसी के साथ साझा की जा सकती है।
सुनील महतो के परिजन और समर्थक वर्षों से हत्याकांड की पूरी साजिश सामने लाने की मांग करते रहे हैं। अब सचिन के कथित खुलासे से मामले में नई उम्मीद बनी है। आगे की जांच में यदि उसके दावों की पुष्टि करने वाले साक्ष्य मिलते हैं तो हत्याकांड की साजिश और इसमें शामिल अन्य लोगों की भूमिका से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।