धर्मशाला: नेपाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने एक बार फिर हिमालयी राज्यों की आपदा तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्लेशियरों में बदलाव, अचानक बादल फटना, तेज बारिश और भूस्खलन जैसी घटनाएं पहाड़ी इलाकों के लिए लगातार बड़ा खतरा बनती जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल की त्रासदी से हिमाचल प्रदेश समेत सभी हिमालयी राज्यों को सबक लेने की जरूरत है।
हिमाचल प्रदेश का कांगड़ा जिला भी अतीत में कई बार प्राकृतिक आपदाओं का दर्द झेल चुका है। पहाड़ी भौगोलिक स्थिति, लगातार बढ़ता निर्माण कार्य और बदलता मौसम यहां के जोखिम को और बढ़ाते हैं। हाल के वर्षों में बादल फटने, भारी बारिश और भूस्खलन की घटनाओं ने कई इलाकों में भारी नुकसान पहुंचाया है।
कांगड़ा ने कब-कब झेली आपदा की मार
कांगड़ा जिले में बारिश और भूस्खलन से तबाही का इतिहास पुराना है। पहाड़ी क्षेत्रों में अचानक आई बाढ़ और मलबे के बहाव ने कई बार गांवों, सड़कों और पुलों को नुकसान पहुंचाया है। वर्ष 2023 की मानसूनी आपदा के दौरान हिमाचल के कई जिलों की तरह कांगड़ा भी प्रभावित हुआ था। भारी बारिश से सड़कें टूटीं, भूस्खलन हुए और जनजीवन प्रभावित हुआ। वर्ष 2026 में भी कांगड़ा के कुछ इलाकों में बादल फटने की घटनाएं सामने आईं। बोह घाटी के गढ़गुन और स्पदा गांवों में बादल फटने से 25 घर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे। प्रशासन ने राहत और पुनर्वास अभियान चलाया था।
नेपाल जैसी आपदा का खतरा क्यों बढ़ रहा है
नेपाल में आई तबाही ने ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों से जुड़े खतरे को फिर सामने ला दिया है। वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में बर्फ पिघलने की रफ्तार बढ़ रही है, जिससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ता है।
हिमाचल प्रदेश में भी 67 संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है। इनमें से कुछ के लिए शुरुआती चेतावनी प्रणाली विकसित करने की योजना बनाई जा रही है ताकि खतरे की स्थिति में समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके।
कितनी तैयार है हिमाचल सरकार
हिमाचल में आपदा प्रबंधन को मजबूत करने के लिए निगरानी तंत्र, मौसम अलर्ट और राहत एजेंसियों की तैयारियों पर जोर दिया जा रहा है। राज्य में बादल फटने, भारी बारिश और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं को लेकर प्रशासन को अलर्ट जारी किए जाते हैं। केंद्र सरकार भी हिमालयी राज्यों में बहु-खतरा पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करने पर काम कर रही है। इसमें मौसम निगरानी, पूर्वानुमान मॉडल और जीआईएस आधारित तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।
निर्माण और पर्यावरण संतुलन बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ राहत और बचाव व्यवस्था मजबूत करना काफी नहीं है। पहाड़ों में अनियंत्रित निर्माण, नदी किनारे बस्तियां और पर्यावरण की अनदेखी आपदा के प्रभाव को बढ़ा सकती है। नेपाल की घटना ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्रों में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। कांगड़ा समेत हिमाचल के अन्य जिलों के लिए आने वाला समय चुनौतीपूर्ण हो सकता है। समय रहते चेतावनी प्रणाली, सुरक्षित निर्माण नीति और स्थानीय लोगों की जागरूकता ही भविष्य की बड़ी आपदाओं से नुकसान को कम कर सकती है।
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