शिमला : 29 अक्टूबर 2026। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राजधानी शिमला के संजौली क्षेत्र में निर्माणाधीन ट्विन ट्यूब टनल परियोजना को लेकर भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) से जवाब मांगा है। अदालत ने सवाल उठाया है कि जब शिमला बाईपास परियोजना के तहत सतही राजमार्ग बनाने के लिए भूमि अधिग्रहण किया जा चुका था और प्रभावित परिवारों को लगभग 600 करोड़ रुपये का मुआवजा भी वितरित कर दिया गया था, तो आखिर उस योजना को छोड़कर घनी आबादी वाली पहाड़ी के नीचे जुड़वां सुरंग बनाने का फैसला क्यों लिया गया। हाईकोर्ट ने इस बदलाव के औचित्य और सरकारी धन के उपयोग को लेकर स्पष्टीकरण मांगा है।न्यायमूर्ति संदीप शर्मा की एकल पीठ ने गुरुवार को संजौली के स्थानीय निवासियों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सुरंग निर्माण के कारण कई मकानों में दरारें आ गई हैं और स्थानीय लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। अदालत ने केंद्र सरकार, हिमाचल प्रदेश सरकार और एनएचएआई सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
600 करोड़ का मुआवजा देने के बाद क्यों बदला प्लान?
अदालत में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, शिमला बाईपास परियोजना के मूल प्रस्ताव में छकरेल, भट्टाकुफर और ढली से होकर एक सतही फोरलेन राजमार्ग बनाने की योजना थी। इस परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण किया गया था और लगभग 88 परिवारों को विस्थापित होना पड़ा था।प्रभावित परिवारों की जमीन और मकानों के बदले करीब 600 करोड़ रुपये का मुआवजा वितरित किए जाने की बात सामने आई है। इसके बावजूद एनएचएआई ने मूल योजना में बदलाव करते हुए चलोंठी-संजौली-भट्टाकुफर क्षेत्र में ट्विन ट्यूब सुरंग बनाने का निर्णय लिया।हाईकोर्ट ने पूछा कि इतनी बड़ी राशि खर्च करने के बाद परियोजना के स्वरूप में बदलाव की आवश्यकता क्यों पड़ी। अदालत ने इस बात पर भी स्पष्टीकरण मांगा है कि पहले से अधिग्रहित भूमि और मुआवजे पर हुए खर्च की उपयोगिता क्या रह गई तथा संभावित वित्तीय नुकसान की जिम्मेदारी किसकी होगी।हालांकि, अदालत की ओर से जवाब मांगे जाने का अर्थ यह नहीं है कि वित्तीय अनियमितता या सरकारी खजाने को हुए नुकसान की अंतिम पुष्टि हो चुकी है। इन सवालों का जवाब एनएचएआई को न्यायिक प्रक्रिया के दौरान देना होगा।
सुरंग निर्माण से मकानों में दरारें आने का आरोप
संजौली के निवासी विनीत शर्मा और अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में दायर याचिका में सुरंग निर्माण के दौरान पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं अपनाए जाने का आरोप लगाया है।याचिकाकर्ताओं का कहना है कि घनी आबादी वाली पहाड़ी के नीचे सुरंग निर्माण के कारण आसपास के कई मकानों में दरारें दिखाई देने लगी हैं। कुछ मकानों को असुरक्षित घोषित किए जाने की जानकारी भी अदालत के सामने रखी गई।स्थानीय निवासियों के अनुसार, संजौली के रिहायशी क्षेत्र में बड़ी संख्या में मकान बने हुए हैं। ऐसे में भूमिगत निर्माण के दौरान जमीन की स्थिरता और आसपास की इमारतों की सुरक्षा सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है।निवासियों ने सुरंग निर्माण को तत्काल रोकने और स्वतंत्र तकनीकी जांच कराने की मांग की है। इससे पहले भी स्थानीय लोगों ने निर्माण कार्य के खिलाफ विरोध जताते हुए अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताएं उठाई थीं।
IIT रुड़की की रिपोर्ट आने तक बंद रहेगा निर्माण
सुनवाई के दौरान एनएचएआई की ओर से अदालत को बताया गया कि सुरंग निर्माण कार्य 18 सितंबर 2026 से निलंबित है। प्राधिकरण ने आश्वासन दिया कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की की तकनीकी टीम की रिपोर्ट आने और आसपास के मकानों की सुरक्षा के पर्याप्त उपाय किए जाने तक निर्माण दोबारा शुरू नहीं किया जाएगा।आईआईटी रुड़की की तकनीकी टीम ने 1 अक्टूबर को प्रभावित क्षेत्र का निरीक्षण किया था। टीम ने निर्माण संबंधी दस्तावेजों का अध्ययन करने और जमीन की स्थिरता का तकनीकी मूल्यांकन करने की प्रक्रिया शुरू की है।एनएचएआई के आश्वासन को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने निर्माण पर अलग से अंतरिम रोक लगाने का आदेश जारी नहीं किया। हालांकि, अदालत ने उम्मीद जताई कि अगली सुनवाई तक क्षेत्र में किसी प्रकार की निर्माण गतिविधि नहीं होगी। पहाड़ी के नीचे महज 14 मीटर की दूरी पर सुरंगयाचिकाकर्ताओं ने अदालत में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) से संबंधित दस्तावेजों का भी हवाला दिया। उनके अनुसार, इस क्षेत्र की भूगर्भीय परिस्थितियों को देखते हुए पहाड़ी के नीचे सुरंग निर्माण को लेकर पहले ही चिंताएं जताई गई थीं।अदालत में प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार, कब्रिस्तान और विशाल मेगा मार्ट के आसपास कुछ स्थानों पर सुरंग और ऊपर की जमीन के बीच की दूरी लगभग 14 मीटर बताई गई है।याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि सुरंग के दोनों ओर से पानी का रिसाव भी हो रहा है। उनका कहना है कि पहाड़ी क्षेत्र में इस तरह की परिस्थितियां निर्माण की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल पैदा करती हैं।हालांकि, सुरंग निर्माण और मकानों को हुए नुकसान के बीच वास्तविक संबंध का निर्धारण तकनीकी जांच के आधार पर ही किया जा सकेगा।
जिला प्रशासन ने पहले भी रुकवाया था ब्लास्टिंग कार्य
स्थानीय निवासियों की शिकायतों के बाद शिमला जिला प्रशासन और एनएचएआई के अधिकारियों ने प्रभावित क्षेत्र का निरीक्षण किया था। सुरक्षा संबंधी चिंताओं को देखते हुए ब्लास्टिंग कार्य रोकने के निर्देश दिए गए थे।इस मामले में यह भी सामने आया कि क्षेत्र की कुछ इमारतों में दरारें दिखाई देने के बाद स्थानीय लोगों में भय का माहौल बन गया था।निवासियों की मांग है कि परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले सभी प्रभावित मकानों का विस्तृत तकनीकी सर्वेक्षण कराया जाए। साथ ही आवश्यक सुरक्षा उपायों के बारे में लोगों को स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
अगली सुनवाई 17 नवंबर को
हाईकोर्ट ने एनएचएआई को मूल सतही राजमार्ग योजना छोड़ने के कारण, भूमि अधिग्रहण पर किए गए खर्च और नई सुरंग परियोजना की सुरक्षा व्यवस्था के संबंध में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।अदालत में प्रस्तुत होने वाली आईआईटी रुड़की की तकनीकी रिपोर्ट भी इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। रिपोर्ट के आधार पर सुरंग निर्माण की सुरक्षा, संभावित जोखिम और आवश्यक सुधारात्मक उपायों को लेकर स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।फिलहाल संजौली ट्विन टनल परियोजना का निर्माण बंद है। अब 17 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई पर स्थानीय निवासियों, प्रशासन और एनएचएआई की नजरें टिकी हैं। यह मामला न केवल शिमला की एक महत्वपूर्ण सड़क परियोजना से जुड़ा है, बल्कि सार्वजनिक धन के उपयोग, विकास परियोजनाओं में पारदर्शिता और नागरिकों की सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण सवाल भी उठा रहा है।