शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में गुरुवार को करवाचौथ का त्योहार श्रद्धा, उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ दिनभर निर्जला व्रत रखने वाली महिलाओं ने रात में चंद्रमा के दर्शन के बाद अपना व्रत खोला। चांद दिखाई देने के बाद महिलाओं ने अपने पतियों के साथ विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और चंद्रमा को जल अर्पित कर अर्घ्य दिया। इसके बाद पतियों ने अपनी पत्नियों को पानी पिलाकर उनका व्रत खुलवाया। इस दौरान महिलाओं के चेहरों पर खुशी और उत्साह दिखाई दिया। करवाचौथ के मौके पर शिमला में पारंपरिक संस्कृति, धार्मिक आस्था और पारिवारिक प्रेम का खूबसूरत संगम देखने को मिला।
करवाचौथ के अवसर पर गुरुवार सुबह से ही शहर में त्योहार का उत्साह बना रहा। विवाहित महिलाओं ने सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण कर व्रत की शुरुआत की। इसके बाद दिनभर बिना अन्न और जल ग्रहण किए चंद्रमा के निकलने का इंतजार किया। शाम के समय महिलाओं ने पारंपरिक परिधानों में सज-धजकर पूजा की तैयारियां शुरू कीं। कई घरों में महिलाओं ने सामूहिक रूप से करवाचौथ की कथा सुनी और भगवान शिव, माता पार्वती तथा भगवान गणेश की पूजा की।
शिमला में इस बार करवाचौथ पर चंद्रमा दिखाई देने का अनुमानित समय रात 8 बजकर 5 मिनट बताया गया था। हालांकि, अलग-अलग पंचांगों में चंद्रोदय के समय में कुछ मिनटों का अंतर था। स्थानीय स्तर पर चंद्रदर्शन के बाद महिलाओं ने पारंपरिक तरीके से पूजा संपन्न की। करवाचौथ की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम लगभग 5 बजकर 38 मिनट से 6 बजकर 56 मिनट तक बताया गया था।
शाम ढलते ही महिलाओं की नजरें आसमान की ओर टिक गई थीं। जैसे-जैसे चंद्रमा निकलने का समय नजदीक आया, घरों में पूजा की तैयारियां तेज होती गईं। महिलाओं ने पूजा की थालियों में दीपक, छलनी, करवा, जल और अन्य सामग्री सजाई। कई परिवारों में छतों और खुले स्थानों पर चंद्रदर्शन की व्यवस्था की गई थी।
चंद्रमा दिखाई देने के बाद महिलाओं ने सबसे पहले उसकी पूजा की और जल से अर्घ्य दिया। इसके बाद पारंपरिक रीति के अनुसार छलनी से चंद्रमा के दर्शन किए और फिर अपने पति का चेहरा देखा। कई परिवारों में पतियों ने अपनी पत्नियों को पानी पिलाकर और भोजन कराकर व्रत खुलवाया। इस दौरान पति-पत्नी ने एक-दूसरे के सुखी और स्वस्थ जीवन की कामना की।
करवाचौथ के अवसर पर शिमला की महिलाओं में पारंपरिक पहनावे को लेकर भी खास उत्साह देखने को मिला। महिलाओं ने लाल, गुलाबी, मैरून और अन्य आकर्षक रंगों की साड़ियां, सूट और पारंपरिक परिधान पहने। हाथों में मेहंदी, चूड़ियां, माथे पर बिंदी और अन्य श्रृंगार के साथ महिलाओं ने इस पर्व को विशेष बनाया। नई विवाहित महिलाओं के लिए पहला करवाचौथ विशेष महत्व रखता है। ऐसे परिवारों में त्योहार को लेकर अलग उत्साह देखने को मिलता है।
इससे पहले बुधवार को करवाचौथ की खरीदारी के लिए शिमला के बाजारों में महिलाओं की भीड़ उमड़ी थी। महिलाओं ने पूजा की सामग्री, करवे, छलनी, मिठाइयां, चूड़ियां और श्रृंगार से जुड़ी वस्तुओं की खरीदारी की। त्योहार को लेकर दुकानदारों ने भी विशेष तैयारियां की थीं। करवाचौथ से पहले बाजारों में खरीदारी बढ़ने से उत्सव जैसा माहौल बना रहा।
करवाचौथ का त्योहार हिमाचल प्रदेश सहित उत्तर भारत के कई राज्यों में विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व पारंपरिक रूप से विवाहित महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता के अनुसार, इस दिन व्रत रखने और चंद्रमा की पूजा करने से पति की लंबी आयु और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
करवाचौथ का व्रत हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। इस वर्ष यह पर्व गुरुवार, 29 अक्टूबर को मनाया गया। इस दिन कई महिलाएं सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं। हालांकि, विभिन्न क्षेत्रों और परिवारों में व्रत की परंपराएं अलग-अलग हो सकती हैं।
इस त्योहार में सरगी की परंपरा का भी खास महत्व है। हिमाचल प्रदेश और पंजाब के कई परिवारों में सास अपनी बहू को सरगी देती हैं। इसमें फल, मिठाइयां, सूखे मेवे और अन्य खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं। महिलाएं सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करती हैं, जिसके बाद व्रत शुरू होता है।
शाम के समय करवाचौथ की पूजा में महिलाओं का सामूहिक रूप से शामिल होना भी एक महत्वपूर्ण परंपरा है। कई स्थानों पर महिलाएं एकत्र होकर पूजा करती हैं और करवाचौथ की कथा सुनती हैं। कथा के माध्यम से व्रत के धार्मिक महत्व और पारिवारिक संबंधों से जुड़ी मान्यताओं का वर्णन किया जाता है।
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में करवाचौथ का त्योहार धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का अवसर भी बनता है। इस दिन परिवार के सदस्य एक साथ पूजा में शामिल होते हैं। पति-पत्नी के बीच आपसी सम्मान, प्रेम और विश्वास को इस पर्व की प्रमुख भावनाओं के रूप में देखा जाता है।
बदलते समय के साथ करवाचौथ मनाने के तौर-तरीकों में भी बदलाव आया है। कुछ परिवारों में पति भी अपनी पत्नी के साथ व्रत रखते हैं। वहीं, कई दंपती इस अवसर पर एक-दूसरे को उपहार देकर त्योहार को खास बनाते हैं। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण लोग करवाचौथ की तस्वीरें और वीडियो भी साझा करते हैं।
इस वर्ष भी करवाचौथ को लेकर सोशल मीडिया पर उत्साह दिखाई दिया। पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाओं और पूजा की रस्मों से जुड़े वीडियो तथा तस्वीरें त्योहार की रौनक को दर्शाते रहे। परिवारों में दिनभर चंद्रदर्शन का इंतजार करने के बाद शाम को पूजा संपन्न होने से खुशी का माहौल रहा।
करवाचौथ का महत्व केवल व्रत रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की पारिवारिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ा हुआ है। इस अवसर पर महिलाएं परिवार की खुशहाली और वैवाहिक जीवन में प्रेम बनाए रखने की कामना करती हैं।
हिमाचल प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में यह पर्व स्थानीय परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है। पहाड़ी इलाकों में चंद्रमा के वास्तविक दर्शन का समय आसपास की पहाड़ियों और मौसम की परिस्थितियों से प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि कुछ स्थानों पर महिलाओं को चांद देखने के लिए निर्धारित चंद्रोदय समय से अधिक इंतजार करना पड़ सकता है।
गुरुवार रात शिमला में चंद्रमा के दर्शन के साथ महिलाओं का दिनभर का इंतजार समाप्त हुआ। पति के साथ पूजा और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद सुहागिनों ने विधिपूर्वक अपना व्रत खोला। इस तरह राजधानी शिमला में करवाचौथ का पर्व प्रेम, विश्वास, धार्मिक आस्था और पारिवारिक खुशियों के साथ संपन्न हुआ।
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