ड्रैगन फ्रूट की खेती ने बदली किसान की किस्मत, दो बीघा जमीन से हुई 2 लाख की कमाई
मंडी। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में किसानों के लिए ड्रैगन फ्रूट की खेती आमदनी का नया जरिया बनकर उभर रही है। जिले के सरकाघाट क्षेत्र के बागवान रूप लाल और टेकचंद ने पारंपरिक खेती से अलग हटकर ड्रैगन फ्रूट की बागवानी शुरू की है। दोनों ने दो-दो बीघा जमीन पर ड्रैगन फ्रूट के बगीचे तैयार किए हैं। भरनाल गांव के रहने वाले रूप लाल को पहली व्यावसायिक पैदावार से करीब दो लाख रुपये की आमदनी हुई है। उनकी इस सफलता ने क्षेत्र में वैकल्पिक बागवानी की संभावनाओं को नई चर्चा दी है।
रूप लाल ने वर्ष 2023 में बागवानी विभाग, सरकाघाट से ड्रैगन फ्रूट की खेती के बारे में जानकारी प्राप्त की थी। इसके बाद उन्होंने गोपालपुर की पंजीकृत नर्सरी से जंबो-रेड फ्लेश किस्म के लगभग 400 पौधे खरीदे। खास बात यह है कि पौधों की खरीद पर उन्हें बागवानी विभाग के माध्यम से 50 प्रतिशत अनुदान मिला। उन्होंने आरसीसी रिंग पोल सपोर्टेड तकनीक से बगीचा तैयार किया और पौधों की देखभाल के लिए प्राकृतिक एवं जैविक विधियों को अपनाया।
पारंपरिक खेती छोड़कर शुरू की ड्रैगन फ्रूट की बागवानी
भरनाल गांव के बागवान रूप लाल ने खेती में बदलाव का फैसला वर्ष 2023 में लिया था। उस समय उन्हें बागवानी विभाग, सरकाघाट से ड्रैगन फ्रूट की खेती के बारे में जानकारी मिली।
इसके बाद उन्होंने इस फल की व्यावसायिक खेती करने की योजना बनाई और अपनी दो बीघा जमीन पर बगीचा लगाने का निर्णय लिया।
रूप लाल ने पारंपरिक फसलों के बजाय ऐसे फल की खेती को प्राथमिकता दी, जिसकी बाजार में अलग पहचान है।
उनका यह प्रयोग पहली व्यावसायिक पैदावार के बाद आमदनी के लिहाज से उत्साहजनक साबित हुआ।
50 प्रतिशत अनुदान पर खरीदे 400 पौधे
ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू करने के लिए रूप लाल ने गोपालपुर स्थित पंजीकृत नर्सरी से लगभग 400 पौधे खरीदे।
उन्होंने जंबो-रेड फ्लेश किस्म का चयन किया, जिसके फल का गूदा लाल रंग का होता है।
बागवानी विभाग के माध्यम से पौधों की खरीद पर उन्हें 50 प्रतिशत अनुदान प्राप्त हुआ।
इस सहायता से पौधों की शुरुआती खरीद लागत का बोझ कम हुआ।
हालांकि, बगीचा तैयार करने में पौधों, पोल, सिंचाई और अन्य व्यवस्थाओं पर कुल कितना खर्च आया, इसका विस्तृत आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
दो बीघा जमीन से करीब दो लाख रुपये की आमदनी
रूप लाल को ड्रैगन फ्रूट की पहली व्यावसायिक पैदावार से लगभग दो लाख रुपये की आमदनी हुई है।
सीमित भूमि पर की गई इस बागवानी से मिली राशि उनके लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
हालांकि, यह आमदनी बिक्री से प्राप्त कुल राशि है या सभी खर्च निकालने के बाद का शुद्ध लाभ, इसकी जानकारी स्पष्ट नहीं है।
इसलिए दो लाख रुपये को निश्चित शुद्ध मुनाफा बताना उचित नहीं होगा।
फिर भी यह अनुभव दर्शाता है कि सही तकनीक, पौधों की देखभाल और बाजार उपलब्ध होने पर वैकल्पिक फल उत्पादन किसानों के लिए आय का अवसर बन सकता है।
आरसीसी रिंग पोल तकनीक से तैयार किया बगीचा
ड्रैगन फ्रूट एक कैक्टस प्रजाति का पौधा है, जिसे व्यवस्थित तरीके से बढ़ाने के लिए सहारे की जरूरत होती है।
रूप लाल ने बगीचे में आरसीसी रिंग पोल सपोर्टेड तकनीक का उपयोग किया।
इस पद्धति में कंक्रीट के खंभों और ऊपरी सहारे की मदद से पौधों को ऊपर चढ़ाया जाता है।
इससे पौधों की शाखाओं को व्यवस्थित रूप से फैलने में मदद मिलती है और फल उत्पादन के दौरान उनकी देखभाल आसान हो सकती है।
हालांकि, इस तकनीक को लगाने की शुरुआती लागत भी होती है। किसानों को अपनी भूमि और बजट के अनुसार इसकी योजना बनानी चाहिए।
रासायनिक उर्वरकों के बिना पौधों की देखभाल
रूप लाल की बागवानी की एक खास बात प्राकृतिक और जैविक विधियों का उपयोग है।
उनके मुताबिक, उन्होंने पौधों की देखभाल के दौरान रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल नहीं किया।
उन्होंने पौधों के रखरखाव में प्राकृतिक तरीकों को प्राथमिकता दी।
इससे यह सामने आता है कि उन्होंने खेती की तकनीक के साथ पौधों के पोषण और देखभाल की पद्धति पर भी ध्यान दिया।
हालांकि, उनकी उपज के औपचारिक जैविक प्रमाणीकरण की जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे प्रमाणित ऑर्गेनिक उत्पाद बताना उचित नहीं होगा।
टेकचंद ने भी दो बीघा में लगाया बगीचा
सरकाघाट क्षेत्र के एक अन्य बागवान टेकचंद ने भी ड्रैगन फ्रूट की खेती को अपनाया है।
उन्होंने अपनी दो बीघा जमीन पर इसका बगीचा लगाया है। दोनों किसानों की पहल से क्षेत्र में इस फल की खेती को लेकर रुचि बढ़ने की संभावना है।
हालांकि, टेकचंद के बगीचे से प्राप्त उत्पादन और आमदनी का विवरण सामने नहीं आया है।
इसलिए रूप लाल की दो लाख रुपये की आमदनी को दोनों किसानों की संयुक्त कमाई नहीं माना जाना चाहिए।
पहाड़ी क्षेत्रों में नई संभावनाएं
हिमाचल प्रदेश में सेब सहित कई पारंपरिक फलों की बागवानी की जाती है। अब कुछ किसान नई फल प्रजातियों के साथ प्रयोग कर रहे हैं।
ड्रैगन फ्रूट की खेती भी इसी दिशा में एक विकल्प बन सकती है। हालांकि, इसकी सफलता तापमान, जल निकासी, सिंचाई, मिट्टी और स्थानीय मौसम पर निर्भर करती है।
हर पहाड़ी क्षेत्र में इसकी खेती समान रूप से सफल होगी, ऐसा जरूरी नहीं है।
इसलिए इच्छुक किसानों के लिए बागवानी विभाग से स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तकनीकी सलाह लेना महत्वपूर्ण है।
बाजार और सही देखभाल से बढ़ सकती है आय
ड्रैगन फ्रूट की व्यावसायिक खेती में अच्छी गुणवत्ता वाले पौधों का चयन, सहारा देने की व्यवस्था और नियमित देखभाल महत्वपूर्ण होती है।
इसके साथ ही फलों की बिक्री के लिए उपयुक्त बाजार मिलना भी जरूरी है।
रूप लाल के अनुभव से पता चलता है कि नई फसल अपनाने से पहले तकनीकी जानकारी प्राप्त करना उपयोगी हो सकता है।
हालांकि, उनकी उपज कितने किलो हुई और फल किस कीमत पर बेचा गया, इसका विवरण उपलब्ध नहीं है।
अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बनी पहल
मंडी जिले के सरकाघाट क्षेत्र में रूप लाल और टेकचंद की पहल वैकल्पिक बागवानी की संभावनाओं को सामने लाती है।
रूप लाल ने वर्ष 2023 में विभागीय मार्गदर्शन लेकर 400 पौधों से शुरुआत की और पहली व्यावसायिक पैदावार से करीब दो लाख रुपये की आमदनी प्राप्त की।
उनकी सफलता में 50 प्रतिशत अनुदान, आरसीसी रिंग पोल तकनीक और नियमित पौध देखभाल की भूमिका रही।
यह उदाहरण उन किसानों के लिए उपयोगी हो सकता है, जो सीमित भूमि पर नई फसलों की खेती की संभावनाएं तलाश रहे हैं।
हालांकि, खेती में निवेश करने से पहले लागत, स्थानीय जलवायु और बाजार की मांग का आकलन करना आवश्यक है।