हरियाणा Haryana : चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (एचएयू) के सूत्रकृमि विभाग और अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना सूत्रकृमि ने कृषि में सूत्रकृमि के महत्व - नमूनाकरण, सर्वेक्षण, निष्कर्षण, सूत्रकृमि रोग की पहचान और निदान पर 10 दिवसीय संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया।शनिवार को विश्वविद्यालय के मानव संसाधन प्रबंधन निदेशालय में आयोजित लघु प्रशिक्षण कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलपति बीआर काम्बोज मुख्य अतिथि थे।इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में मणिपुर, केरल, बिहार, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, असम, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तराखंड, राजस्थान, अरुणाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और हरियाणा सहित देश के 16 राज्यों के 23 वैज्ञानिकों ने भाग लिया। कुलपति ने सूत्रकृमि वैज्ञानिकों से उन तकनीकों का उपयोग करने का आग्रह किया, जो भविष्य में सूत्रकृमि प्रबंधन के लिए नई परियोजनाएं बनाने में सहायक होंगी।
उन्होंने कहा कि नेमाटोड से पौधों को होने वाले नुकसान को रोकने के लिए किसान फसल चक्र, मृदा प्रबंधन, प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग, जैविक नियंत्रण में नीम तेल तथा रासायनिक नियंत्रण में नेमाटोसाइड का उपयोग कर सकते हैं। कुलपति ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से नेमाटोड प्रभावित फसलों की पहचान की जा सकती है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से संसाधनों तथा नेमाटोसाइड के उचित उपयोग से मिट्टी को हानिकारक रसायनों से बचाया जा सकता है। जलवायु परिवर्तन, फसल पैटर्न में विविधता, पौध सामग्री के आदान-प्रदान की समस्या के कारण हरियाणा के साथ-साथ देश के विभिन्न भागों में नेमाटोड की समस्या बढ़ रही है। इस समस्या से निपटने के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन तथा अन्य सुविधाओं की आवश्यकता है। विभाग किसानों को नेमाटोड समस्याओं के बारे में जागरूक करने के लिए नियमित रूप से नेमाटोड जागरूकता दिवस का आयोजन कर रहा है।