DMF घोटाले में आरोपी सतपाल छाबड़ा को हाईकोर्ट से बड़ा झटका

छग

Update: 2026-05-23 17:28 GMT
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित जिला खनिज न्यास (DMF) घोटाले में आरोपी व्यवसायी सतपाल सिंह छाबड़ा को हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने उनकी स्थायी जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में आर्थिक अपराधों को लेकर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे अपराध जानबूझकर व्यक्तिगत लाभ के लिए किए जाते हैं, जिनका सीधा असर देश और राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। कोर्ट ने यह भी माना कि मामले की जांच राज्य की एजेंसियों द्वारा गंभीर स्तर पर की जा रही है, ऐसे में आरोपी की हिरासत आवश्यक है। इसी आधार पर याचिकाकर्ता को राहत नहीं दी गई।

जानकारी के अनुसार रायपुर निवासी सतपाल सिंह छाबड़ा को एसीबी (ACB) और ईओडब्ल्यू (EOW) ने DMF घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों के अनुसार छाबड़ा इस पूरे मामले में एक प्रमुख बिचौलिया और कमीशन एजेंट के रूप में कार्य कर रहा था। ईडी और ईओडब्ल्यू की जांच में सामने आया है कि आरोपी ने कृषि विभाग से जुड़ी खरीद और आपूर्ति प्रक्रियाओं में अनियमितताओं को अंजाम देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बताया गया है कि वर्ष 2019 से वह इन सप्लाई कार्यों को प्रभावित करने और सुविधाजनक बनाने में सक्रिय था।

जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि आरोपी का संपर्क मंदीप चावला उर्फ मैडी से हुआ था, जिसने कथित रूप से पूर्व आईएएस अनिल टुटेजा के प्रभाव के माध्यम से विभागीय कार्यों को प्राप्त करने का प्रस्ताव दिया था। इसके बाद कथित रूप से टेंडर और सप्लाई व्यवस्था में गड़बड़ी की गई। सरकारी रिपोर्ट और ईडी की जांच के आधार पर दर्ज मामले में बताया गया है कि DMF फंड के उपयोग में बड़े पैमाने पर आर्थिक अनियमितताएं की गईं। कोरबा जिले के DMF फंड से जुड़े टेंडर आवंटन में नियमों में बदलाव कर ऐसे प्रोजेक्ट शामिल किए गए जिनमें अधिक कमीशन की गुंजाइश थी।

जांच में यह भी सामने आया कि टेंडर प्रक्रिया में शामिल कई लोगों और अधिकारियों को अवैध लाभ पहुंचाया गया। आरोप है कि कलेक्टर स्तर पर 40 प्रतिशत, सीईओ स्तर पर 5 प्रतिशत, एसडीओ स्तर पर 3 प्रतिशत और सब इंजीनियर स्तर पर 2 प्रतिशत तक कमीशन तय किया गया था। इस मामले में ठेकेदारों, बिचौलियों और अधिकारियों के बीच मिलीभगत के गंभीर आरोप सामने आए हैं। ईडी की रिपोर्ट के अनुसार टेंडर लेने वाले कई लोगों ने सरकारी धन का दुरुपयोग करते हुए कमीशन के रूप में भारी रकम का लेनदेन किया। जांच एजेंसियों ने यह भी पाया कि कई भुगतान “अकोमोडेशन एंट्री” के माध्यम से दिखाए गए थे।

ताकि अवैध लेनदेन को छुपाया जा सके। तलाशी के दौरान कई फर्जी फर्मों के दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और नकद राशि भी बरामद की गई। ईडी की जांच में यह भी सामने आया कि ठेकेदारों द्वारा अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों को 25 से 40 प्रतिशत तक कमीशन दिया गया। तलाशी अभियान के दौरान लगभग 76.50 लाख रुपये नकद बरामद किए गए थे और 8 बैंक खातों को सीज किया गया, जिनमें लगभग 35 लाख रुपये पाए गए। इस पूरे मामले में एसीबी द्वारा अदालत में लगभग 6000 पन्नों का चालान भी प्रस्तुत किया गया है, जिसमें बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के सबूत शामिल हैं। फिलहाल हाईकोर्ट के फैसले के बाद आरोपी की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। मामले की जांच अभी भी जारी है और अन्य आरोपियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
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