प्रौढ़ शिक्षा का पांचवीं प्रमाणपत्र मान्य, सफाईकर्मी की सेवा समाप्ति रद्द

छग

Update: 2026-07-05 10:52 GMT
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी नौकरियों में शैक्षणिक योग्यता को लेकर एक अहम और स्पष्ट निर्णय दिया है। अदालत ने कहा है कि भारत सरकार के राष्ट्रीय साक्षरता मिशन (प्रौढ़ शिक्षा) के तहत जारी पांचवीं कक्षा की अंकसूची और प्रमाणपत्र राज्य शासन के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा जारी पांचवीं कक्षा के प्रमाणपत्र के समान ही मान्य हैं। इस आधार पर हाईकोर्ट ने कांकेर जिले की एक महिला सफाईकर्मी की सेवा समाप्ति को अवैध करार देते हुए उसकी तत्काल बहाली और बकाया वेतन देने का आदेश दिया है।
मामला उत्तर बस्तर कांकेर जिले के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग से जुड़ा है। विभाग ने 18 अक्टूबर 2021 को सफाईकर्मी पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था, जिसमें न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता पांचवीं पास निर्धारित की गई थी। मेरिट के आधार पर चयनित लता कोर्राम को 9 मई 2022 को नियुक्ति पत्र जारी किया गया और उन्होंने 18 मई 2022 को कार्यभार ग्रहण किया। लेकिन मात्र तीन महीने बाद, 18 अगस्त 2022 को मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ), कांकेर ने उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं। विभाग ने तर्क दिया कि लता कोर्राम द्वारा प्रस्तुत प्रौढ़ शिक्षा (राष्ट्रीय साक्षरता मिशन) के तहत प्राप्त पांचवीं कक्षा का प्रमाणपत्र नियमित स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमाणपत्र के बराबर नहीं माना जा सकता।
इस कार्रवाई के बाद लता कोर्राम ने अधिवक्ता अनुष्का पाठक के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि राज्य सरकार द्वारा 25 जुलाई 2012 को स्पष्ट परिपत्र जारी किया गया था, जिसमें राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के तहत जारी पांचवीं कक्षा के प्रमाणपत्र को स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमाणपत्र के समान मान्यता दी गई है। सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि याचिकाकर्ता ने भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय साक्षरता मिशन प्राधिकरण द्वारा आयोजित परीक्षा वर्ष 2014 में सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की थी। इसके बावजूद विभाग ने न तो इस परिपत्र का पालन किया और न ही किसी प्रकार की विस्तृत जांच की। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडे की एकलपीठ में हुई। अदालत ने स्पष्ट कहा कि किसी भी कर्मचारी की सेवा समाप्त करने से पहले कानून के अनुसार पूरी प्रक्रिया अपनाना आवश्यक होता है। बिना उचित जांच और शासन के निर्देशों की अनदेखी करते हुए की गई कार्रवाई को अदालत ने त्रुटिपूर्ण माना। हाईकोर्ट ने पाया कि सीएमएचओ द्वारा जारी सेवा समाप्ति आदेश राज्य शासन के 25 जुलाई 2012 के परिपत्र के विपरीत है। अदालत ने कहा कि जब शासन स्वयं दोनों प्रमाणपत्रों को समान मानता है, तो विभाग द्वारा इसे अस्वीकार करना कानूनी रूप से गलत है।
इस आधार पर हाईकोर्ट ने सीएमएचओ, कांकेर द्वारा जारी सेवा समाप्ति आदेश को निरस्त कर दिया और लता कोर्राम को तत्काल प्रभाव से सफाईकर्मी पद पर पुनः बहाल करने का आदेश दिया। साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि सेवा से बाहर रहने की अवधि का 40 प्रतिशत बकाया वेतन और अन्य सभी सेवा लाभ भी प्रदान किए जाएं। यह फैसला उन हजारों अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिन्होंने प्रौढ़ शिक्षा या राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के तहत शिक्षा प्राप्त की है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार की नीति और परिपत्रों का पालन सभी विभागों के लिए बाध्यकारी है और इसके विपरीत की गई कोई भी कार्रवाई टिकाऊ नहीं मानी जाएगी। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय प्रशासनिक मनमानी पर अंकुश लगाने वाला है और इससे भविष्य में समान मामलों में स्पष्ट दिशा मिलेगी। इस फैसले के बाद सरकारी विभागों को नियुक्ति और सेवा मामलों में अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता होगी। फिलहाल इस आदेश के बाद लता कोर्राम को न केवल नौकरी वापस मिली है बल्कि उन्हें आर्थिक राहत भी मिलेगी, जिससे उनके लंबे संघर्ष को न्यायिक समर्थन मिला है।
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