आरक्षण खत्म करने की कोई ताकत नहीं, यह संवैधानिक अधिकार है: चिराग पासवान
बिहार। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए जातिगत आरक्षण विरोधी आंदोलन के बीच आरक्षण को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। अलग-अलग राजनीतिक दलों की ओर से आंदोलन और आरक्षण व्यवस्था को लेकर प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। इसी बीच केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान ने आरक्षण को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आरक्षण कोई खैरात नहीं है, बल्कि संविधान से मिला अधिकार है और इसे किसी के कहने मात्र से समाप्त नहीं किया जा सकता।
चिराग पासवान ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति आरक्षण खत्म करने की बात करता है तो केवल उसके कहने से आरक्षण समाप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसे सामाजिक न्याय से जुड़ा संवैधानिक अधिकार बताते हुए कहा कि दुनिया की कोई भी ताकत इसे खत्म नहीं कर सकती।
‘आरक्षण कोई खैरात नहीं’
आरक्षण विरोधी आंदोलन के संदर्भ में अपनी प्रतिक्रिया देते हुए चिराग पासवान ने कहा, “क्या आरक्षण को सिर्फ इसलिए खत्म किया जा सकता है क्योंकि कोई ऐसा कहता है? यह एक संवैधानिक अधिकार है।”
उन्होंने आगे कहा कि आरक्षण किसी को दी जाने वाली खैरात नहीं है। यह संविधान द्वारा दिया गया अधिकार है। चिराग ने कहा कि आरक्षण को समाप्त करने की बात करने वालों को यह समझना चाहिए कि इसकी जरूरत क्यों पड़ी और इसके पीछे सामाजिक परिस्थितियां क्या रही हैं।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आरक्षण को लेकर समीक्षा या सुधार की बात करने वालों को भी यह समझने की आवश्यकता है कि सामाजिक और ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करने में आरक्षण की क्या भूमिका रही है।
‘दुनिया की कोई ताकत खत्म नहीं कर सकती’
चिराग पासवान ने आरक्षण के मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि यह संवैधानिक अधिकार है और इसे खत्म करना आसान नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि दुनिया की कोई भी ताकत आरक्षण को खत्म नहीं कर सकती।
उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर जातिगत आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। आरक्षण व्यवस्था को लेकर देश में अलग-अलग मत रहे हैं। एक ओर आरक्षण के समर्थक इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व और समान अवसर सुनिश्चित करने का माध्यम मानते हैं, वहीं विरोध करने वाले इसके स्वरूप और मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की मांग करते रहे हैं।
चिराग पासवान ने अपने बयान में आरक्षण के औचित्य को सामाजिक असमानता से जोड़ते हुए कहा कि इसके महत्व को समझना जरूरी है।
सामाजिक भेदभाव का किया जिक्र
केंद्रीय मंत्री ने अपने बयान में सामाजिक भेदभाव की घटनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ उत्तराखंड में हुई कथित घटना का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं आज भी समाज में मौजूद असमानता को दिखाती हैं।
चिराग पासवान ने कहा कि खरगे के वहां से जाने के बाद मंच को कथित तौर पर शुद्ध किया गया था। उन्होंने इस घटना को सामाजिक भेदभाव का उदाहरण बताते हुए कहा कि आज भी दलित समुदाय के लोगों के साथ कई स्तरों पर भेदभाव की घटनाएं सामने आती हैं।
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि आज भी किसी दलित युवक को घोड़े पर चढ़ने से रोका जाता है और किसी दलित युवक को शादी का जुलूस निकालने से रोकने की घटनाएं सामने आती हैं।
आरक्षण की जरूरत पर जोर
चिराग पासवान के बयान का मुख्य जोर इस बात पर रहा कि आरक्षण की व्यवस्था को केवल आर्थिक या राजनीतिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने इसे उन सामाजिक परिस्थितियों से जोड़कर देखने की बात कही, जिनके कारण समाज के कुछ वर्ग लंबे समय तक शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में समान अवसरों से वंचित रहे।
उनके मुताबिक, जब तक समाज में जाति आधारित भेदभाव और असमानता मौजूद है, तब तक आरक्षण की जरूरत को समझना महत्वपूर्ण है।
जंतर-मंतर के प्रदर्शन के बीच आया बयान
दिल्ली के जंतर-मंतर पर जातिगत आरक्षण के खिलाफ आंदोलन के बीच चिराग पासवान का यह बयान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आंदोलन के दौरान आरक्षण व्यवस्था को लेकर कई तरह की मांगें और तर्क सामने रखे जा रहे हैं।
वहीं, चिराग पासवान ने अपने बयान में आरक्षण खत्म करने की मांग का स्पष्ट विरोध किया। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति या समूह की मांग के आधार पर संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता।
राजनीतिक दलों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं
आरक्षण का मुद्दा लंबे समय से भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण विषयों में रहा है। विभिन्न राजनीतिक दल समय-समय पर आरक्षण की व्यवस्था, उसके विस्तार, समीक्षा और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते रहे हैं।
जंतर-मंतर के आंदोलन के बाद भी अलग-अलग राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। ऐसे में चिराग पासवान का बयान आरक्षण के समर्थन में स्पष्ट राजनीतिक रुख के रूप में देखा जा रहा है।
‘सामाजिक बराबरी तक जारी रहनी चाहिए बहस’
चिराग पासवान के बयान से यह संकेत मिलता है कि वे आरक्षण को सामाजिक बराबरी से जोड़कर देखते हैं। उन्होंने सामाजिक भेदभाव की घटनाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि जब समाज में इस तरह की स्थितियां मौजूद हैं, तब आरक्षण की जरूरत पर सवाल उठाने से पहले उसके मूल उद्देश्य को समझना चाहिए।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि आरक्षण पर चर्चा केवल इसे खत्म करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि सामाजिक असमानता को कैसे कम किया जाए और वंचित वर्गों को समान अवसर कैसे मिलें।
फिलहाल जंतर-मंतर पर हुए आरक्षण विरोधी आंदोलन के बाद यह मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। एक ओर प्रदर्शनकारी आरक्षण व्यवस्था में बदलाव या इसके विरोध की बात कर रहे हैं, वहीं चिराग पासवान जैसे नेता इसे संवैधानिक अधिकार बताते हुए इसके बचाव में सामने आए हैं। उनके बयान ने साफ कर दिया है कि आरक्षण को लेकर राजनीतिक मतभेद आने वाले दिनों में भी जारी रहने की संभावना है।