अगरतला। भारत के पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा की रघुनंदन पहाड़ियों के बीच स्थित उनाकोटी धार्मिक आस्था, प्राचीन शिल्पकला और रहस्यमयी किंवदंतियों के कारण देशभर में प्रसिद्ध है। घने जंगलों और प्राकृतिक झरनों से घिरे इस ऐतिहासिक स्थल की चट्टानों पर भगवान शिव, गणेश, दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की विशाल आकृतियां उकेरी गई हैं। इन मूर्तियों को किसने और कब बनाया, इसका कोई निश्चित और सर्वमान्य उत्तर आज भी उपलब्ध नहीं है।
उनाकोटी शब्द का अर्थ एक करोड़ से एक कम होता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यहां 99 लाख 99 हजार 999 देवी-देवताओं की प्रतिमाएं हैं। हालांकि इतनी बड़ी संख्या की पुरातात्विक पुष्टि नहीं हुई है। यह संख्या मुख्य रूप से सदियों से चली आ रही धार्मिक किंवदंतियों से जुड़ी है। पहाड़ियों, चट्टानों और आसपास के क्षेत्र में मौजूद असंख्य छोटी-बड़ी आकृतियों के कारण इस स्थान का नाम उनाकोटी प्रचलित हुआ।
यहां की सबसे प्रमुख प्रतिमा भगवान शिव की विशाल चट्टानी आकृति है, जिसे उनाकोटिश्वर काल भैरव के नाम से जाना जाता है। इसके विशाल चेहरे और सिर पर बनी अलंकृत सजावट पर्यटकों को आकर्षित करती है। आसपास नंदी, भगवान गणेश और विभिन्न देवी-देवताओं की आकृतियां भी दिखाई देती हैं। कुछ मूर्तियां सीधे पहाड़ी चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं, जबकि कुछ पत्थरों पर अलग से तराशी गई प्रतीत होती हैं।
इन मूर्तियों के निर्माण को लेकर इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों के बीच अलग-अलग मत हैं। कुछ विशेषज्ञ इनका संबंध पाल काल से जोड़ते हैं, जबकि कई अध्ययनों में इन्हें आठवीं से नौवीं शताब्दी के बीच निर्मित माना गया है। शिल्पकला में स्थानीय जनजातीय संस्कृति और हिंदू धार्मिक प्रतीकों का मिश्रण दिखाई देता है। ठोस ऐतिहासिक अभिलेख नहीं मिलने के कारण इनके निर्माण की वास्तविक कहानी अब भी रहस्य बनी हुई है।
उनाकोटी से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कथा भगवान शिव और एक करोड़ देवी-देवताओं की यात्रा की है। मान्यता के अनुसार भगवान शिव अन्य देवी-देवताओं के साथ काशी जा रहे थे। रास्ते में रात होने पर सभी ने रघुनंदन पहाड़ियों पर विश्राम किया। शिव ने सभी को सूर्योदय से पहले उठकर यात्रा शुरू करने के लिए कहा, लेकिन अगली सुबह उनके अलावा कोई नहीं जागा। क्रोधित होकर भगवान शिव ने सभी को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया और अकेले आगे चले गए। माना जाता है कि इन पत्थर की आकृतियों के कारण ही इस स्थान का नाम उनाकोटी पड़ा।
दूसरी कथा कल्लू कुम्हार नामक शिल्पकार से जुड़ी है। कहा जाता है कि कल्लू भगवान शिव और माता पार्वती के साथ कैलाश जाना चाहता था। उसकी परीक्षा लेने के लिए उसे एक रात में एक करोड़ देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाने को कहा गया। कल्लू ने पूरी रात मेहनत की, लेकिन सुबह तक एक करोड़ से एक कम मूर्तियां ही बना पाया। शर्त पूरी नहीं होने के कारण वह कैलाश नहीं जा सका और यह स्थान उनाकोटी कहलाया।
धार्मिक महत्व के साथ उनाकोटी एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक और पर्यटन स्थल भी है। यहां की विशाल चट्टानी मूर्तियां, हरियाली, झरने और शांत वातावरण पर्यटकों को विशेष अनुभव प्रदान करते हैं। इसे चेहरों का खोया हुआ पहाड़ यानी लॉस्ट हिल ऑफ फेसेज भी कहा जाता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित यह स्थल त्रिपुरा की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यहां हर वर्ष अशोकाष्टमी के अवसर पर बड़ा मेला आयोजित होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। उनाकोटी की यात्रा के दौरान पर्यटकों को सीढ़ियों और पहाड़ी रास्तों से गुजरना पड़ता है। बारिश के मौसम में फिसलन के कारण विशेष सावधानी जरूरी होती है। रहस्य, आस्था और अद्भुत शिल्पकला का संगम उनाकोटी को भारत के सबसे अनोखे धार्मिक स्थलों में स्थान देता है।
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