नई दिल्ली : समय बीतने के साथ शहर बदल जाते हैं, लोग बदल जाते हैं और रिश्तों की परिभाषा भी बदल जाती है, लेकिन कुछ यादें ऐसी होती हैं जो वर्षों बाद भी मन के किसी कोने में वैसी ही ताजा बनी रहती हैं। एक व्यक्ति जब लंबे समय बाद अपने पुराने शहर लौटता है तो उसे एहसास होता है कि केवल इमारतें ही नहीं बदलीं, बल्कि उन गलियों की पहचान भी बदल चुकी है, जहां कभी उसकी किशोरावस्था के सपने पलते थे। इसी बदले हुए शहर के बीच उसे अपना अतीत याद आता है और उसके साथ जुड़ी एक ऐसी प्रेम कहानी, जो कभी शब्दों तक नहीं पहुंच सकी।
पुराने शहर की सड़कों पर चलते हुए उसे बचपन के वे परिचित दृश्य याद आते हैं। चौराहों की रौनक पहले जैसी है, लेकिन चेहरे अनजान हैं। कभी मोहल्ले के कोने पर बैठने वाले पंडित नानक चंद की मिठाई और रायते की खुशबू अब केवल स्मृतियों में रह गई है। जब वह अपने पुराने मोहल्ले में पहुंचता है तो वहां का हर मकान आधुनिक रूप में बदल चुका होता है। उन्हीं मकानों में एक ऐसा घर भी था, जिससे उसकी अनगिनत भावनाएं जुड़ी थीं। उस घर को देखते ही वर्षों पुरानी यादें उसके सामने जीवंत हो उठती हैं।
यही वह घर था, जहां रहने वाली सुरभि उसके किशोर मन का पहला आकर्षण थी। वह दो भाइयों की इकलौती और लाड़ली बहन थी। लेखक रोज उसके साथ भविष्य के सपने देखता था, लेकिन कभी अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करने का साहस नहीं जुटा पाया। उस दौर में प्रेम का इजहार आज जितना सहज नहीं था। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप का दौर नहीं था। प्रेम पत्र भी बड़ी हिम्मत से लिखे जाते थे और उन्हें पहुंचाने के लिए दोस्तों का सहारा लिया जाता था। लेकिन लेखक स्वभाव से बेहद शर्मीला था, इसलिए उसने कभी उस रास्ते पर कदम नहीं बढ़ाया।
उस समय समाज की परंपराएं भी अलग थीं। लड़कियों की कम उम्र में शादी होना सामान्य बात थी। परिवार योग्य वर की तलाश में जुट जाते थे और युवाओं की व्यक्तिगत इच्छाओं की तुलना में सामाजिक मान्यताओं को अधिक महत्व दिया जाता था। ऐसे माहौल में दोनों एक-दूसरे को पसंद तो करते रहे, लेकिन कभी अपने मन की बात नहीं कह पाए। समय ने दोनों की राहें अलग कर दीं और दोनों अपने-अपने परिवार तथा जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गए।
सालों बाद एक दिन लेखक पुस्तकालय में किताबें देख रहा था कि उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से कॉल आई। दूसरी ओर से आई आवाज ने वर्षों पुरानी यादों को फिर से जगा दिया। वह सुरभि थी, जो अब गुजरात के सूरत शहर में रहती थी। बातचीत की शुरुआत औपचारिक रही, लेकिन धीरे-धीरे दोनों पुराने दिनों की यादों में खो गए। लेखक ने स्वीकार किया कि वह कभी उसे भूल नहीं पाया। वहीं सुरभि ने भी कहा कि उसने भी हमेशा उसे याद रखा।
बातचीत के दौरान दोनों ने एक-दूसरे के परिवार, बच्चों और वर्तमान जीवन के बारे में जानकारी साझा की। सुरभि ने मुस्कुराते हुए पूछा कि जब इतना प्रेम था तो कभी बताया क्यों नहीं। लेखक ने कहा कि उस समय की परिस्थितियां ही ऐसी थीं कि दोनों में से कोई भी सामाजिक मर्यादाओं को लांघने का साहस नहीं कर सका। दोनों इस बात पर सहमत हुए कि शायद नियति को यही मंजूर था।
बातचीत के अंत में सुरभि ने एक ऐसा सवाल पूछा जिसने वर्षों से दबे एहसासों को फिर से जगा दिया। उसने कहा कि क्या कभी ऐसा नहीं लगता कि अगर दोनों साथ होते तो जिंदगी कुछ और होती। लेखक ने जवाब दिया कि अधूरापन भी जीवन का हिस्सा है और हर इच्छा पूरी नहीं होती। इसके बावजूद उसने स्वीकार किया कि कई बार ऐसा जरूर महसूस होता है कि यदि हालात अलग होते तो शायद कहानी भी अलग होती।
कुछ देर की भावुक बातचीत के बाद फोन कट गया, लेकिन उस बातचीत ने यह एहसास फिर से ताजा कर दिया कि समय चाहे कितना भी बदल जाए, सच्चे और निष्कलुष भाव कभी पूरी तरह खत्म नहीं होते। वे यादों के रूप में जीवनभर साथ चलते रहते हैं और किसी पुराने शहर, किसी पुराने घर या एक अनजान फोन कॉल के जरिए अचानक फिर सामने आ खड़े होते हैं।