लाइफ स्टाइल। देश के कई हिस्सों में बढ़ता वायु प्रदूषण लोगों की सेहत के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। आमतौर पर प्रदूषित हवा का नाम सुनते ही खांसी, सांस लेने में परेशानी, अस्थमा और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का ख्याल आता है। लेकिन हाल ही में सामने आए वैज्ञानिक अध्ययनों ने स्वास्थ्य से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण खतरा उजागर किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। विशेष रूप से क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) से पीड़ित लोगों में प्रदूषण बीमारी के तेजी से बढ़ने के जोखिम से जुड़ा पाया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि हवा में मौजूद अत्यंत सूक्ष्म कण शरीर के कई अंगों पर प्रभाव डाल सकते हैं और किडनी भी इससे अछूती नहीं है।
सितंबर 2026 में वैज्ञानिक पत्रिका Environmental Health में प्रकाशित ताइवान के एक बड़े अध्ययन में वायु प्रदूषण और किडनी रोग के बीच महत्वपूर्ण संबंध सामने आया है। शोधकर्ताओं ने शुरुआती चरण की क्रॉनिक किडनी डिजीज से पीड़ित मरीजों का अध्ययन किया और पाया कि हवा में मौजूद पीएम 2.5 कणों के संपर्क में कमी आने से गंभीर किडनी रोग, डायलिसिस की आवश्यकता और मृत्यु के जोखिम में भी कमी का संबंध दिखाई दिया।
अध्ययन के मुताबिक, पीएम 2.5 के स्तर में प्रत्येक एक माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की कमी के साथ गंभीर किडनी रोग की ओर बढ़ने का जोखिम लगभग पांच प्रतिशत कम पाया गया। इसी तरह डायलिसिस शुरू होने के जोखिम में तीन प्रतिशत और मृत्यु के जोखिम में छह प्रतिशत कमी का संबंध देखा गया। हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि ये आंकड़े सांख्यिकीय संबंध दर्शाते हैं। इससे यह निश्चित रूप से साबित नहीं होता कि प्रदूषण में कमी ही इन सभी परिणामों का प्रत्यक्ष कारण थी।
विशेषज्ञों के अनुसार, पीएम 2.5 हवा में मौजूद ऐसे सूक्ष्म कण होते हैं जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। ये कण वाहनों के धुएं, औद्योगिक उत्सर्जन, ईंधन जलने और अन्य प्रदूषण स्रोतों से उत्पन्न हो सकते हैं। बेहद छोटे आकार के कारण ये सांस के माध्यम से फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं। इनके संपर्क से शरीर में सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस जैसी प्रक्रियाएं बढ़ सकती हैं, जिनका असर रक्त वाहिकाओं और विभिन्न अंगों पर पड़ सकता है।
किडनी शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में शामिल है। इसका मुख्य काम रक्त से अपशिष्ट पदार्थों और अतिरिक्त पानी को छानकर मूत्र के माध्यम से बाहर निकालना है। इसके अलावा किडनी शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखने, रक्तचाप को नियंत्रित करने और लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण से जुड़ी प्रक्रियाओं में भी भूमिका निभाती है।
जब किडनी की कार्यक्षमता लंबे समय तक प्रभावित होती है, तो इसे क्रॉनिक किडनी डिजीज कहा जाता है। शुरुआती चरण में इस बीमारी के लक्षण बहुत कम दिखाई दे सकते हैं। यही कारण है कि कई लोगों को काफी समय तक अपनी किडनी की समस्या का पता नहीं चल पाता।
जुलाई 2026 में Clinical Kidney Journal में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन ने भी प्रदूषण और किडनी की सेहत के बीच संबंध को रेखांकित किया। चीन में 45 वर्ष या उससे अधिक आयु के 4,365 लोगों पर किए गए शोध में पाया गया कि लंबे समय तक अधिक पीएम 2.5 प्रदूषण के संपर्क में रहने वालों में किडनी की कार्यक्षमता तेजी से घटने का जोखिम अधिक था।
इस अध्ययन में विशेष रूप से उच्च रक्तचाप और पहले से कम किडनी कार्यक्षमता वाले लोगों में जोखिम अधिक पाया गया। शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि वायु प्रदूषण को किडनी स्वास्थ्य के संदर्भ में भी एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय जोखिम के रूप में देखा जाना चाहिए।
भारत के संदर्भ में भी यह विषय महत्वपूर्ण है। सितंबर 2026 में Kidney International Reports में प्रकाशित शोध में दिल्ली और चेन्नई के 12,271 वयस्कों से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इस अध्ययन का उद्देश्य लंबे समय तक पीएम 2.5 प्रदूषण के संपर्क और किडनी की कार्यक्षमता के बीच संभावित संबंध को समझना था। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय आबादी में भी वायु प्रदूषण के व्यापक स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर वैज्ञानिक शोध बढ़ रहे हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और पहले से किडनी की बीमारी से पीड़ित लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। मधुमेह और उच्च रक्तचाप क्रॉनिक किडनी डिजीज के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं। यदि ऐसे मरीज लंबे समय तक अत्यधिक प्रदूषण वाले वातावरण में रहते हैं, तो उनके समग्र स्वास्थ्य पर अतिरिक्त प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
किडनी की बीमारी के संभावित लक्षणों में पैरों या चेहरे पर सूजन, अत्यधिक थकान, पेशाब में झाग आना, पेशाब की मात्रा में बदलाव, भूख कम लगना और रक्तचाप बढ़ना शामिल हो सकते हैं। हालांकि, ये लक्षण अन्य बीमारियों में भी दिखाई दे सकते हैं। कई मरीजों में शुरुआती चरण में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते।
किडनी की स्थिति जानने के लिए डॉक्टर खून में क्रिएटिनिन की जांच, अनुमानित ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट यानी ईजीएफआर और पेशाब में एल्ब्यूमिन की जांच कराने की सलाह दे सकते हैं। इन जांचों से किडनी की कार्यक्षमता और संभावित नुकसान का आकलन करने में मदद मिलती है।
प्रदूषण से बचाव के लिए लोगों को अपने क्षेत्र के एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी एक्यूआई पर ध्यान देना चाहिए। हवा की गुणवत्ता बेहद खराब होने पर बाहर की अनावश्यक गतिविधियां सीमित करना उपयोगी हो सकता है। विशेष रूप से अधिक प्रदूषण वाले इलाकों में उपयुक्त तरीके से फिट किया गया एन95 मास्क सूक्ष्म कणों के संपर्क को कम करने में मदद कर सकता है।
घर के भीतर धूम्रपान और कचरा जलाने जैसी गतिविधियों से बचना भी जरूरी है। जहां संभव हो, वहां पर्याप्त क्षमता वाले HEPA एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल घर के भीतर सूक्ष्म कणों का स्तर कम करने में मदद कर सकता है।
किडनी को स्वस्थ रखने के लिए रक्तचाप और ब्लड शुगर को नियंत्रित रखना, संतुलित भोजन करना तथा डॉक्टर की सलाह के बिना दर्द निवारक दवाओं का बार-बार इस्तेमाल करने से बचना महत्वपूर्ण है। जिन लोगों को पहले से किडनी की बीमारी है, उन्हें पानी, नमक और प्रोटीन की मात्रा अपने चिकित्सक की सलाह के अनुसार निर्धारित करनी चाहिए।
वैज्ञानिकों का कहना है कि वायु प्रदूषण केवल सांस संबंधी बीमारी नहीं, बल्कि पूरे शरीर के स्वास्थ्य से जुड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा है। ताजा शोध संकेत देते हैं कि प्रदूषण कम करने से किडनी रोग के मरीजों को भी लाभ मिल सकता है। हालांकि, इसके प्रत्यक्ष कारणों और प्रभाव की मात्रा को समझने के लिए आगे और अध्ययन आवश्यक हैं।
फिलहाल इन अध्ययनों का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि किडनी की सुरक्षा के लिए केवल खानपान और दवाइयों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। स्वच्छ हवा और प्रदूषण से बचाव भी स्वास्थ्य संरक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं।