आदिवासियों की अनोखी दिवाली, खास बाजे पर होता है नृत्य
सींग वाले बाजे पर रातभर झूमते हैं आदिवासी
महाराष्ट्र: देशभर में दिवाली का त्योहार दीपों, रंगोली, मिठाइयों और आतिशबाजी के साथ मनाया जाता है, लेकिन महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में इस पर्व की एक अलग ही रौनक देखने को मिलती है। यहां कई आदिवासी समुदाय दिवाली के अवसर पर एक खास पारंपरिक वाद्ययंत्र की धुन पर सामूहिक नृत्य करते हैं। इस वाद्ययंत्र को 'तारपा' कहा जाता है। इसकी बनावट किसी लंबे सींग जैसी दिखाई देती है। इसकी मधुर धुन पर पुरुष और महिलाएं गोल घेरा बनाकर नृत्य करते हैं। यह परंपरा केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम भी है।
महाराष्ट्र के पालघर और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में तारपा नृत्य विशेष रूप से लोकप्रिय है। वारली, मल्हार कोली और कोकणा समुदायों में यह नृत्य दिवाली और फसल कटाई के अवसर पर किया जाता है। इसमें कलाकार पारंपरिक वेशभूषा पहनकर एक-दूसरे के साथ तालमेल बनाते हुए नृत्य करते हैं। तारपा एक पारंपरिक सुषिर वाद्ययंत्र है, जिसे फूंक मारकर बजाया जाता है। इसे तैयार करने में सूखी लौकी, बांस और प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। इसके आगे का हिस्सा सींग जैसा चौड़ा होता है, जिससे विशेष प्रकार की ध्वनि निकलती है। इसकी धुन अन्य सामान्य वाद्ययंत्रों से अलग होती है।
महाराष्ट्र सरकार के आदिवासी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान के अनुसार, वारली समुदाय में तारपा का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। नई फसल आने की खुशी में इसे बजाया जाता है। पारंपरिक तारपा नृत्य में लगभग 50 से 100 पुरुष और महिलाएं भी हिस्सा ले सकते हैं। इस नृत्य की सबसे बड़ी खासियत इसका सामूहिक स्वरूप है। तारपा बजाने वाला कलाकार धुन तैयार करता है और बाकी लोग उसी लय में कदम मिलाते हैं। नृत्य करने वाले लोग एक गोलाकार आकृति बनाते हैं। उनकी चाल और कदमों का तालमेल इस लोकनृत्य को बेहद आकर्षक बनाता है।
दिवाली के समय गांवों में इस नृत्य का उत्साह विशेष रूप से दिखाई देता है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, लोग सामूहिक रूप से त्योहार मनाते हैं और पारंपरिक धुनों पर देर रात तक नृत्य करते हैं। इसमें आधुनिक डीजे या फिल्मी संगीत की आवश्यकता नहीं होती। हालांकि, महाराष्ट्र के सभी आदिवासी समुदायों में उत्सव मनाने का तरीका एक जैसा नहीं है। तारपा नृत्य का संबंध खेती और प्रकृति से भी जुड़ा हुआ है। फसल कटाई के बाद लोग अपनी मेहनत और प्रकृति से मिले उपहारों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। इस अवसर पर सामूहिक नृत्य गांव के लोगों को एक साथ लाने का माध्यम बनता है।
वारली समाज की मान्यताओं में तारपा को वर्षा देवता नारन का उपहार माना जाता है। इसी कारण इस वाद्ययंत्र के इस्तेमाल से जुड़ी विशेष परंपराएं हैं। गर्मी और वर्षा ऋतु में इसे बजाने पर पारंपरिक प्रतिबंध भी माना जाता है। महाराष्ट्र की आदिवासी संस्कृति में केवल तारपा ही नहीं, बल्कि घोर नृत्य और अन्य पारंपरिक नृत्य भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन नृत्यों के माध्यम से स्थानीय देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा, प्रकृति से जुड़ाव और सामाजिक एकता की भावना व्यक्त की जाती है।
आधुनिक संगीत और बदलती जीवनशैली के बीच तारपा जैसी लोककलाओं का संरक्षण महत्वपूर्ण है। यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का काम करती है। महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों में दिवाली के अवसर पर सुनाई देने वाली तारपा की धुन इस बात का उदाहरण है कि त्योहार केवल रोशनी और सजावट तक सीमित नहीं हैं, बल्कि लोकसंस्कृति और सामुदायिक जीवन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।