प्रधानमंत्री मोदी जाति जनगणना की मांग करने वालों को ‘अर्बन नक्सल’ करार देते थे। अब वह खुद को और ‘सुपर कैबिनेट’ के सदस्यों को क्या कहेंगे, जिन्होंने जनगणना में ही जातियों को गिनने का अचानक फैसला लिया है? उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आज भी मानना है कि जातीय गणना ‘तालिबानी मानसिकता’ है और यह दलितों को आरक्षण से वंचित करने की कोशिश है। प्रधानमंत्री इस बयान पर क्या टिप्पणी करेंगे? भाजपा और संघ में जाति जनगणना को लेकर कुछ असमंजस जरूर थे, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में जातीय ध्रुवीकरण ऐसा सामने आया कि उप्र में भाजपा 80 में से 33 सीटों पर ही अटक गई, नतीजतन लोकसभा में सामान्य बहुमत नहीं पा सकी। केंद्र में गठबंधन सरकार बनानी पड़ी। हालांकि 2014 के बाद ओबीसी और दलित भाजपा के नए समर्थन-आधार बने। भाजपा ‘ब्राह्मणों-बनियों की पार्टी’ नहीं रही। ओबीसी ने 2024 के संसदीय चुनाव में भाजपा को 42 फीसदी से अधिक वोट दिए, लेकिन दलित भाजपा के पक्ष में आते-जाते रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद संघ और भाजपा के भीतर ऐसे विश्लेषण किए गए कि नए जातीय आधार तय किए जाएं। जातियों को उनकी संख्या के आधार पर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, आवास आदि क्षेत्रों की सुविधाएं और जातीय हिस्सेदारी भी सुनिश्चित की जाए। यह भी आकलन सामने आया कि अब जातियों, उपजातियों के प्रभाव और जनादेश को नजरअंदाज करना संभव नहीं है, लिहाजा जाति जनगणना के फैसले पर सरकार आई। अभी यह तय नहीं है कि किस आधार पर जाति जनगणना कराई जाए। यह जरूर निश्चित है कि जिस तरह 2011 की सामाजिक-आर्थिक जातीय जनगणना के बाद 46 लाख से अधिक जातियां सामने आई थीं, कमोबेश उस आधार पर जनगणना नहीं कराई जाएगी। 1931 की जनगणना के दौरान गिनी गई जातियों की कुल संख्या 4147 थी।
इतना अंतर कैसे आ गया? 2011 की जनगणना के निष्कर्षों को सार्वजनिक भी नहीं किया गया। बहरहाल आरक्षण पर भाजपा की सोच अलग रही है। जाति जनगणना का मकसद सीधे आरक्षण से जुड़ा है। 1990 के चुनाव घोषणापत्र में भाजपा ने लिखा था कि आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए। अब जाति जनगणना के बाद जो संख्या सामने आएगी, सभी को आरक्षण और हिस्सेदारी देना संभव नहीं होगा। भाजपा-संघ की बुनियादी दृष्टि यह है कि जातियों की गणना और उन्हें अलग-थलग करने से कितना राजनीतिक लाभ होगा और देश में सामाजिक ताना-बाना भी बरकरार रहेगा। दरअसल जाति जनगणना न तो भाजपा, कांग्रेस और न ही सपा, बसपा, राजद, जनता दल-यू सरीखे क्षेत्रीय दलों के लिए ‘समाजवाद’ है। सामाजिक न्याय और समरसता भी राजनीतिक नारे हैं। 1990 में मंडल आयोग की रपट के बाद ओबीसी को शिक्षा, नौकरी में आरक्षण तय किया गया। दक्षिण के राज्यों को छोड़ कर शेष भारत में यह आरक्षण 27.5 फीसदी है। आरक्षण के नतीजतन कुछ ओबीसी समृद्ध होने लगे और मुख्यधारा में भी आए। ओबीसी की सियासत के आधार पर छोटे-छोटे राजनीतिक दल भी बने। कुछ आज भी अस्तित्व में हैं। मंडल के समानांतर कमंडल राजनीति भी शुरू हुई, लिहाजा भाजपा देश और सदन में सबसे बड़ी पार्टी बन गई। यह भी यथार्थ है कि 994 जातियां आज भी ऐसी हैं, जिन्हें मात्र 1-2 फीसदी ही आरक्षण का लाभ मिला।
आरक्षण की विसंगतियां जाति जनगणना से पहले ही खत्म की जानी चाहिए। जातीय गणना के जरिए भाजपा नए नेरेटिव गढ़ेगी और तमिलनाडु, केरल में राजनीतिक सेंध लगाने की कोशिश करेगी। तमिलनाडु में गौंडर, थेवर जैसी जातियों के बीच उनकी संख्या के आधार पर हिस्सेदारी का मुद्दा उठाकर द्रविड़ वोट में सेंध लगाई जा सकती है। जाति जनगणना से हिंदी पट्टी का सियासी नजरिया बदलेगा और यह बदलाव गैर-हिंदी पट्टी में भी महसूस किया जा सकता है। भाजपा का मानना है कि अब मराठा आरक्षण, जाट और गुर्जर आरक्षण सरीखे आंदोलन कमजोर पड़ेंगे। बहरहाल अभी तो जातीय जनगणना का फैसला कैबिनेट ने लिया है और विपक्ष का एक तबका श्रेय लूटने की राजनीति करने में मस्त हो गया है। आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी से बढ़ा कर 63 फीसदी या अधिक की जाए, इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ज्यादा शोर मचाना शुरू कर दिया है। यह मामला सर्वोच्च अदालत के विशेषाधिकार का है। अब राजनीति के दूरगामी परिणाम क्या होते हैं, उन पर नजर रहेगी।