हमारे समकालीन विश्व में अर्थव्यवस्था और राजनीति में अमिट साठगांठ है-दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जिस दर से आर्थिक प्रगति होती है, उसी दर से प्राकृतिक संसाधन सिकुड़ते हैं, उसी दर से पर्यावरण का दूषण होता है। और जलवायु परिवर्तन का जिन्न भी तो इसी आर्थिक दौड़ की आंधी से पैदा हुआ है। दूसरी ओर, पारिस्थितिकी और दर्शनशास्त्र जुड़वां पहलू हैं-दोनों प्राकृतिक विकास और सांस्कृतिक प्रगति के आधार हैं।

राष्ट्र की बौद्धिक एवं सांस्कृतिक शक्तियां वास्तव में उसके अपने मौलिक दर्शन में निहित होती हैं। संस्कृति की जड़ें एक भौगोलिक परिधि के पारिस्थितिक तंत्र में होती हैं। जब कोई राष्ट्र बौद्धिक और सांस्कृतिक शक्तियों को चुनता है, तो वह अपनी स्थिरता और प्रसन्नता का मार्ग चुनता है।
ऐसे राष्ट्र को चलताऊ वर्गीकरण में 'अविकसित' अथवा 'दरिद्र' की श्रेणी में भले ही रख दिया जाता हो, लेकिन उसे संपन्नताओं भरे अपने पारिस्थितिक परिवेशों और सुख से भरे भविष्य पर गर्व होता है। भूटान ऐसे राष्ट्र का एक ज्वलंत उदाहरण है। भूटान के लोग के लिए सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता (ग्रॉस नेशनल हैपीनेस-जीएनएच) महत्व रखता है, न कि जीडीपी। अपनी भूमि पर 98 फीसदी वन के साथ दक्षिण अमेरिका का सूरीनाम एक स्वस्थ और जीवंत भविष्य सुरक्षित करने पर गर्व कर सकता है।
वनों का संरक्षण और विस्तार अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि प्रकाश संश्लेषण को चरम पर बनाए रखने के लिए है, जिसके माध्यम से सौर ऊर्जा जीवन में प्रवाहित होती है और जो जैव मंडल में जीवन प्रक्रियाओं को अक्षुण्ण रखता है और पृथ्वी पर मानव के साथ सभी थलचर और अधिकांश जलचरों को पोषित करता है।
राजनीतिक और आर्थिक कारणों से पृथ्वी के अधिकतर वन सफाचट कर दिए गए हैं। पृथ्वी हरियाली से हाथ मल रही है और प्रकाश संश्लेषण के चरमराने से पृथ्वी पर जीवन की कड़ियां टूट रही हैं। सांस्कृतिक विविधता उतनी ही विविध और समृद्ध है, जितनी प्रकृति की जैव विविधता। प्रत्येक देश मोटे तौर पर एक विशिष्ट संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है।
विशिष्ट भौगोलिक संस्कृति एक ऐसी सभ्यता का भी प्रतिनिधित्व करती है, जिसकी अपनी गौरव गाथाएं रचने वाले नायक-नायिकाएं होते हैं। इनकी अद्भुत कहानियां होती हैं, अनूठा इतिहास होता है और अपनी एक स्थायी छाप होती है। कोई भी संस्कृति अपने अद्वितीय दर्शन से ही पोषित होती है। आयातित अथवा राजनीति द्वारा थोपा गया दर्शन मौलिक संस्कृति को प्रदूषित और विकृत करने का प्रयास करता है।
पृथ्वी के कुछ भौगोलिक क्षेत्रों में प्राकृतिक जैव विविधता से रहित रेगिस्तान में हिंसक (अप) संस्कृतियों का जन्म भी हुआ है। हिंसा, आक्रामकता, निर्दयता, परजीवी प्रकृति, लूट-मार और असभ्य व्यवहार जैसे अवगुण इन संस्कृतियों की मुख्य विशेषताएं रही हैं। इन अपसंस्कृतियों ने मानव सभ्यता को बहुत घाव दिए हैं।
मध्यकालीन विश्व ने सबसे बड़ा संकट इसलिए झेला, क्योंकि आस्था का चोला पहन कर जीवन-विरोधी संस्कृतियों ने दुनिया में कुत्सित और जीवन-विनाशक राजनीति फैलाई, इन्होंने दूसरों की हरी-भरी भूमियों पर लूट-मार की और उनके ज्ञान-विज्ञान पर आधारित साम्राज्यों और संस्कृतियों का विनाश किया। लेकिन हमारे समकालीन विश्व में, खासकर यूरोप और पश्चिम में, पारिस्थितिक मूल्य को स्थापित करने वाले राजनीतिक पैटर्न भी उभर रहे हैं, जिनका वैकल्पिक राजनीति के रूप में स्वागत किया जा रहा है।
मौलिक भारतीय दर्शन स्वयं में एक पारिस्थितिक दर्शन है, जो सभी जीव को संरक्षण और प्रकृति को विस्तार देने वाले मूल्यों से ओतप्रोत है और इसमें विश्व की सभी समस्याओं को हल करने की कलाएं धड़कती हैं। किसी समाज और राष्ट्र को स्वस्थ, सचेत, ज्ञानधर्मी, सृजनशील, जुझारु और प्रफुल्लताओं से सराबोर रखने का सबसे बड़ा स्रोत उसकी मौलिक संस्कृति होता है।
संस्कृति द्वारा प्रदत्त शक्तियों के बल पर हम अपनी भारतीयता और अपने लोकाचार को विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा थोपी गई एकरूपता से बचाने में सक्षम रहे हैं। हम अपने जीवंत कृतिपरक, ज्ञानार्जन क्षमताओं और जीवन-मूल्यों को संजोने वाले दर्शन के बल पर प्रकृति विनाशक एवं नरसंहार के डिजाइन को ध्वस्त करने में सफल रहे हैं।
यही वह जीवन-पोषक पारिस्थितिकी-केंद्रित भारतीय दर्शन है, जिसने मानव सभ्यता को सागर मंथन से लेकर आकाशगंगा तक का ज्ञान उपहार में दिया है। यह दर्शन हमारी संस्कृति की धुरी है, सभ्यता का अलंकार है। संसार ने बहुत भयानक और तनावपूर्ण समय देखा है। पारिस्थितिकी-उन्मुख दर्शन पर अर्थव्यवस्था-उन्मुख राजनीति का वर्चस्व और ज्ञान-उन्मुख धर्म पर क्षुद्र आस्थाओं का ग्रहण हमारे समकालीन विश्व में व्याप्त सभी प्रकार के तनाव और रोग के मूल कारण हैं।
लेकिन उथल-पुथल और हिंसक प्रवृत्तियों की शिकार दुनिया का एक उज्ज्वल पहलू भी है। वह यह कि समाज भूखंड के मौलिक दर्शन को मरने नहीं देता। दर्शन होता भी प्रकाश की तरह अजर और अमर है, और वह राजनीतिक विद्रूप के विरुद्ध एक मूक विद्रोह करता चलता है।

सोर्स: अमर उजाला


Tags: