जीवन के हर पड़ाव पर प्रेरणा देती है शांत गरिमा
पड़ाव पर प्रेरणा देती है शांत गरिमा
हम अक्सर अपने धर्मग्रंथों और महाकाव्यों में छिपी समझदारी की बात करते हैं और इस बात पर ज़ोर देते हैं कि बच्चों को इनसे परिचित कराया जाए ताकि वे ज़िंदगी की मुश्किलों को बेहतर ढंग से समझ सकें। मुझे ये संस्कार अपने माता-पिता, शिक्षकों, बुज़ुर्गों से मिली कहानियों और सालों तक चली अनगिनत बातचीत से मिले। इनमें से महाभारत ने शायद मुझ पर सबसे ज़्यादा असर डाला है।
बचपन से ही एक बात मेरे मन में बैठ गई थी। हमें सिखाया जाता है कि बिना नतीजे की चिंता किए अपनी पूरी क्षमता से अपना कर्तव्य निभाएं। हमें बताया जाता है कि नतीजे पूरी तरह हमारे हाथ में नहीं होते। हमारी सीमित समझ से परे कोई बड़ी व्यवस्था है जो आखिरकार हमारा ध्यान रखती है।
जैसे-जैसे साल गुज़रे, मुझे आम इंसानी रिश्तों में भी उस समझदारी की झलक दिखने लगी। ज़िंदगी भर, जब भी मुझे मार्गदर्शन या हौसले की सबसे ज़्यादा ज़रूरत पड़ी, तो कुछ लोग चुपचाप मेरे साथ खड़े रहे - मेरे माता-पिता, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे, मेरे दोस्त, मेरे शिक्षक, मेरे सीनियर और यहाँ तक कि अजनबी भी, जिनकी सलाह ने मेरे फैसलों की दिशा बदल दी। मुझे रेलवे में अपनी पहली पोस्टिंग के समय की एक घटना याद है। मैंने हेडक्वार्टर को एक सरकारी चिट्ठी लिखी और एक सीनियर अफ़सर से निजी जवाब पाकर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ। उन्होंने मेरे पहले सरकारी पत्र का स्वागत किया और भविष्य के पत्राचार के लिए बेहतर शब्दों के इस्तेमाल का विनम्रता से सुझाव दिया। उस छोटी सी बात ने मुझे कर्तव्य से कुछ ज़्यादा करने के लिए प्रेरित किया। बाद में मुझे एहसास हुआ कि ऐसी मेंटरिंग (मार्गदर्शन) संगठन की संस्कृति का हिस्सा थी और अफ़सरों को उनके पूरे करियर के दौरान मिलती रहती थी। पीछे मुड़कर देखने पर मुझे एहसास होता है कि यह ऐसे कई पलों में से पहला था जिसने इन मूल्यों के बारे में मेरी समझ को आकार दिया। मैंने अक्सर खुद को उस परंपरा को अपने पेशेवर और निजी जीवन में आगे बढ़ाते हुए पाया है।
हालाँकि, जब मैं आज अपने आस-पास की दुनिया को देखता हूँ, तो कभी-कभी सोचता हूँ कि क्या नई पीढ़ी को भी वैसा ही भरोसा और हौसला मिलता है। हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ लगभग हर चीज़ को तुरंत मापा जाता है। सफलता को फ़ॉलोअर्स, लाइक्स, प्रमोशन, विज़िबिलिटी और लगातार तुलना से मापा जाता है। हममें से कई लोग तेज़ी से बदलती और ज़्यादा माँग करने वाली दुनिया के साथ कदम मिलाने में अपनी इतनी ऊर्जा लगा देते हैं कि हम स्वाभाविक रूप से किसी और का चुपचाप हौसला बढ़ाने के बजाय अपनी ही यात्रा में ज़्यादा व्यस्त हो जाते हैं। अक्सर कोशिश से ज़्यादा नतीजे मायने रखते हैं और असलियत से ज़्यादा दिखावा। धैर्य अब पुराना फ़ैशन हो गया है, जबकि अनिश्चितता को ज़िंदगी का एक ज़रूरी हिस्सा मानने के बजाय अक्सर विफलता के तौर पर देखा जाता है। तो, क्या वे मूल्य जिनके साथ मैं बड़ा हुआ, आज भी मायने रखते हैं? मेरा मानना है कि हाँ, वे रखते हैं। हो सकता है कि आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में वे कम दिखाई देते हों, लेकिन उनकी अहमियत कम नहीं हुई है। जो लोग चुपचाप इन मूल्यों को अपनाते हैं, वे कहीं गायब नहीं हुए हैं। वे आज भी मार्गदर्शन करते हैं, हिम्मत बढ़ाते हैं और भरोसा दिलाते हैं—अक्सर उन्हें खुद भी पता नहीं चलता कि वे कितना बड़ा बदलाव ला रहे हैं। शायद बदला तो बस यह है कि आज की तेज़ और शोर-शराबे वाली ज़िंदगी में हम उन मूल्यों को देख नहीं पाते।
क्या कोई परम शक्ति हमें देख रही है, यह तो मैं आज भी नहीं जानता। लेकिन मेरा मानना है कि ईश्वर की कृपा अक्सर ऐसे ही लोगों के ज़रिए हम तक पहुँचती है। शायद ईश्वर हमेशा किसी असाधारण घटना के ज़रिए ही खुद को ज़ाहिर नहीं करता। कभी-कभी वह किसी सोच-समझकर कहे गए शब्द, किसी के अचानक दिखाए गए दयालुपन, या किसी ऐसे व्यक्ति में मिल जाता है जो ठीक सही समय पर सामने आ जाता है। और शायद यही वजह है कि हमें यह मानते रहना चाहिए कि जो मूल्य हमें विरासत में मिले हैं, उनकी आज की दुनिया में भी जगह है।
लेखक 'Kala - Krazy About Literature And Arts' के संस्थापक हैं और साथ ही लेखक, वक्ता, कोच, मध्यस्थ और रणनीति सलाहकार भी हैं; यहाँ व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं।