कई दशकों तक, भारत में म्यूज़िक स्टार बनने का रास्ता आमतौर पर सिनेमा से होकर गुज़रता था। गायक प्लेबैक के ज़रिए मशहूर होते थे, गाने फ़िल्मों के साथ आगे बढ़ते थे, और साउंडट्रैक ही लोगों की पसंद पर छाए रहते थे। अब यह मॉडल बदल रहा है।
भारत की स्ट्रीमिंग इकॉनमी पर आई एक नई रिपोर्ट से पता चलता है कि 'आर्टिस्ट-फ़र्स्ट म्यूज़िक' — यानी फ़िल्म साउंडट्रैक से अलग बनाए और रिलीज़ किए गए गाने — तेज़ी से मुख्यधारा में आ रहे हैं। स्पॉटिफ़ाई की 'लाउड एंड क्लियर इंडिया' रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में भारत में साल के टॉप 10 गानों में से आधे फ़िल्म साउंडट्रैक से बाहर के थे, जबकि इसके 'डेली टॉप 50' में 90 प्रतिशत गाने भारतीय कलाकारों के थे।
अनुव जैन, आदित्य रिखारी, कुशाग्रा और फ़हीम अब्दुल्ला जैसे नाम उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो फ़िल्म के बजाय कलाकार के इर्द-गिर्द श्रोता वर्ग बना रही है। उदाहरण के लिए, रिखारी का इंडिपेंडेंट गाना 'साहिबा' लगातार 11 हफ़्तों से ज़्यादा समय तक स्पॉटिफ़ाई इंडिया पर नंबर 1 पर रहा।
स्पॉटिफ़ाई इंडिया में म्यूज़िक और पॉडकास्ट के हेड, ध्रुवांक वैद्य कहते हैं, "कुछ साल पहले भारतीय संगीत पर फ़िल्म संगीत का दबदबा था — प्लेबैक गायक और फ़िल्म साउंडट्रैक ही मुख्य थे। पिछले तीन सालों में हमने 'आर्टिस्ट-फ़र्स्ट म्यूज़िक' में ज़बरदस्त बढ़ोतरी देखी है।"
यह बदलाव आर्थिक और सांस्कृतिक, दोनों तरह का है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में स्पॉटिफ़ाई पर भारतीय कलाकारों से मिलने वाली रॉयल्टी में साल-दर-साल 29 प्रतिशत की वृद्धि हुई। सालाना 1 करोड़ रुपये से ज़्यादा कमाने वाले कलाकारों की संख्या में 21 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि 5 करोड़ रुपये से ज़्यादा कमाने वाले कलाकारों की संख्या 2023 के मुक़ाबले दोगुनी से भी ज़्यादा हो गई है।
क्षेत्रीय भारत का उदय
शायद सबसे बड़ा बदलाव भाषा के स्तर पर आ रहा है। तेलुगु संगीत की रॉयल्टी में साल-दर-साल 120 प्रतिशत से ज़्यादा, मराठी में लगभग 50 प्रतिशत, बंगाली में लगभग 40 प्रतिशत और मलयालम में 30 प्रतिशत से ज़्यादा की वृद्धि हुई। फरवरी 2023 और फरवरी 2026 के बीच हरियाणवी गानों की स्ट्रीमिंग में लगभग सात गुना बढ़ोतरी हुई।
यह एक ऐसे बाज़ार को दर्शाता है जहाँ कलाकारों को बड़े स्तर पर पहचान पाने के लिए अब ज़रूरी नहीं कि वे हिंदी की ओर रुख़ करें। वैद्य कहते हैं, "जब आप अपनी संस्कृति और कला के प्रति सच्चे रहते हैं, तो आपकी आवाज़ में असलियत झलकती है।" वे कहते हैं कि युवा सुनने वाले इन कलाकारों की कहानियों और पहचान से जुड़ाव महसूस करते हैं, जिससे संगीतकार अलग-अलग भाषाओं में अपने फ़ैन बना पाते हैं।
और अब तो ये फ़ैन भारत के बाहर भी हो सकते हैं। 2025 में Spotify पर भारतीय कलाकारों को मिली रॉयल्टी का 40 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा विदेशों में सुनने वालों से आया। प्लेटफ़ॉर्म पर सबसे ज़्यादा सुने गए 15 भारतीय गानों में से 11 स्वतंत्र (इंडिपेंडेंट) और सीधे कलाकारों द्वारा रिलीज़ किए गए गाने थे। दुनिया भर में, सुनने वालों ने 2025 के दौरान 12.8 अरब बार ऐसे भारतीय कलाकारों को खोजा या सुना, जिन्हें उन्होंने पहले कभी नहीं सुना था; यह संख्या पिछले साल के मुकाबले 14 प्रतिशत ज़्यादा है।
ये आँकड़े भारतीय संगीत कारोबार में एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करते हैं। डिजिटल माध्यम से नई चीज़ों की खोज ने फ़िल्म, भूगोल और भाषा से जुड़ी पुरानी बाधाओं को कमज़ोर कर दिया है। अब राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने के लिए किसी गायक-गीतकार को बॉलीवुड साउंडट्रैक की ज़रूरत नहीं है; और न ही मलयालम, हरियाणवी या तेलुगु कलाकार को दुनिया भर में सुनने वाले पाने के लिए अपनी क्षेत्रीय पहचान छोड़ने की ज़रूरत है।
बॉलीवुड का दबदबा अब भी बना हुआ है। लेकिन भारत के आने वाले दौर के संगीतकारों के लिए, अब यह एकमात्र ऐसा मंच नहीं है जो मायने रखता है।
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