इस बात पर काफी बहस चल रही है कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) भविष्य में इंसानों के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है। कुछ लोगों का मानना ​​है कि बहुत अधिक शक्तिशाली मशीनें इंसानों के नियंत्रण से बाहर हो सकती हैं, जबकि कुछ लोग इन आशंकाओं को खारिज करते हैं। ये भविष्यवाणियां सच होंगी या नहीं, यह बहस का विषय है, लेकिन एक खतरा अब केवल कल्पना नहीं रह गया है—AI साइबर अपराध के तरीके बदल रहा है, जिसका बैंकिंग, वित्तीय बाजारों और आर्थिक स्थिरता पर गंभीर असर पड़ सकता है।
भारत में, छोटी NBFC (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों) से जुड़ी साइबर घटनाओं के कारण दो महीनों में लगभग 300 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, और इस संबंध में करीब 150 शिकायतें दर्ज की गई हैं और FIRs हुई हैं। हमलावरों ने API और पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियों का फायदा उठाकर बिना अनुमति के पैसे ट्रांसफर किए। देश के सबसे बड़े बैंक, SBI से जुड़ी घटना भी काफी कुछ सिखाती है। हाल ही में, SBI ने डेटा लीक होने की आशंका जताई। शुरुआती जांच में हजारों ऐसे रिकॉर्ड मिले जिनमें लोगों की निजी जानकारी—जैसे नाम, फोन नंबर, पता और लोन से जुड़ी डिटेल—शामिल थीं। हालांकि बैंक के मुख्य कामकाज और ग्राहकों के बैलेंस पर कोई असर नहीं पड़ा, लेकिन इस घटना ने डेटा सुरक्षा और थर्ड-पार्टी एक्सेस (बाहरी लोगों की पहुंच) को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दक्षिण कोरिया में 16 वित्तीय संस्थानों से डेटा लीक होने की खबर है, जिसमें लगभग 100,000 रिकॉर्ड उजागर हुए हैं। इटली में, जालसाजों ने एक वरिष्ठ अधिकारी की आवाज की AI से नकल की और फर्जी व्हाट्सएप मैसेज भेजे। इसके जरिए उन्होंने एक बैंक को 95 मिलियन यूरो ट्रांसफर करने के लिए राजी कर लिया, जिसमें से ज्यादातर रकम वापस नहीं मिल पाई।
हाल ही में 'बायनेन्स' (Binance) के साथ हुई घटना भी एक गंभीर चेतावनी है। एक हफ्ते पहले, हैकर्स ने एक्सचेंज के 'हॉट वॉलेट्स' से लगभग 6.3 बिलियन डॉलर की क्रिप्टोकरेंसी चुरा ली। जांच से पता चला कि एक 'डेवऑप्स' (DevOps) इंजीनियर का लैपटॉप हैक हो गया था, जिससे हमलावरों को इंटरनल सिस्टम और वॉलेट साइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तक अनधिकृत पहुंच मिल गई। एथेरियम (Ethereum) पर, हमलावरों ने 'अकाउंट डेलिगेशन' फीचर का फायदा उठाकर हॉट वॉलेट के जरिए गलत ट्रांजैक्शन किए। इसमें ब्लॉकचेन क्रिप्टोग्राफी को नहीं तोड़ा गया था, बल्कि समस्या इंटरनल एक्सेस कंट्रोल और ट्रांजैक्शन ऑथराइजेशन (लेन-देन की मंजूरी) में थी। जांचकर्ताओं ने इस हमले के पीछे उत्तर कोरिया के 'ट्रेडरट्रेटर' (TraderTraitor) समूह का हाथ बताया है।
इन सभी घटनाओं के लिए सीधे तौर पर AI को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। फिर भी, ये घटनाएं दिखाती हैं कि कैसे तकनीक और कमजोर सिस्टम वित्तीय संस्थानों के लिए बहुत बड़े पैमाने पर खतरा बन सकते हैं। हालांकि, AI ने जटिल साइबर अपराध करना आसान बना दिया है। अपराधी अब कमियों का पता लगाने, किसी और का रूप धरने (impersonation), फिशिंग कैंपेन चलाने और एक साथ कई हमले करने के काम को ऑटोमेट (स्वचालित) कर सकते हैं। जिस काम के लिए पहले काफी विशेषज्ञता की जरूरत होती थी, उसे अब आसानी से उपलब्ध टूल्स की मदद से किया जा सकता है।
यह असंतुलन चिंताजनक है। एक वित्तीय संस्थान ग्राहकों का भरोसा जीतने में दशकों लगा सकता है। वहीं, साइबर अपराधियों को भारी नुकसान पहुंचाने के लिए बस किसी कर्मचारी के हैक हुए क्रेडेंशियल्स (लॉगिन जानकारी) और ट्रांजेक्शन अप्रूवल प्रक्रिया में मौजूद किसी कमजोरी (vulnerability) की जरूरत होती है।
साइबर सुरक्षा और वित्तीय स्थिरता
इसका खतरा केवल वित्तीय नुकसान या गोपनीय जानकारी लीक होने तक सीमित नहीं है। एक सुनियोजित हमला किसी बैंक के पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को ठप कर सकता है, क्लियरिंग कॉर्पोरेशन को खतरे में डाल सकता है, स्टॉक एक्सचेंज के ट्रेडिंग सिस्टम में बाधा डाल सकता है या सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी को पूरी तरह पंगु बना सकता है। इससे पेमेंट में देरी हो सकती है, ट्रेडिंग रुक सकती है और सेटलमेंट प्रक्रिया बाधित हो सकती है। युद्ध या भू-राजनीतिक संघर्ष के दौरान, दुश्मन देशों या विरोधी तत्वों द्वारा भारत के वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे हमले आर्थिक भरोसे को कमजोर कर सकते हैं और व्यापक अस्थिरता पैदा कर सकते हैं।
साइबर सुरक्षा अब केवल IT से जुड़ा मुद्दा नहीं रह गया है; यह वित्तीय स्थिरता का विषय है और राष्ट्रीय सुरक्षा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
क्या करने की जरूरत है?
पहला, साइबर सुरक्षा को बोर्डरूम की जिम्मेदारी बनाया जाना चाहिए। कमजोरियों का आकलन करने, जरूरी निवेश सुनिश्चित करने और तैयारियों की समीक्षा करने के लिए बोर्ड और सीनियर मैनेजमेंट को जवाबदेह होना चाहिए। स्वतंत्र ऑडिट नियमित रूप से और पूरी गंभीरता के साथ किए जाने चाहिए।
दूसरा, RBI और SEBI को केवल नियमों के पालन (compliance) की जांच से आगे बढ़कर, अनिवार्य 'साइबर स्ट्रेस टेस्टिंग' की ओर बढ़ना चाहिए। बैंकों, NBFCs, एक्सचेंजों, क्लियरिंग कॉर्पोरेशन और डिपॉजिटरी को ऐसे हमलों का सिम्युलेशन (नकली अभ्यास) करना चाहिए, जिनमें हैक किए गए क्रेडेंशियल्स, छेड़छाड़ की गई API, रैनसमवेयर और अनधिकृत ट्रांजेक्शन शामिल हों। इसके जरिए हमलों को रोकने, उन्हें सीमित करने और रिकवरी करने की क्षमताओं का परीक्षण किया जाना चाहिए।
तीसरा, भारत को वित्तीय क्षेत्र के लिए एक 'रियल-टाइम साइबर इंटेलिजेंस नेटवर्क' की आवश्यकता है। खतरों से जुड़ी जानकारी बैंकों, NBFCs, फिनटेक कंपनियों, पेमेंट ऑपरेटरों और सिक्योरिटीज मार्केट की संस्थाओं के बीच साझा की जानी चाहिए। यदि किसी एक संस्थान पर हमला होता है, तो उसी कमजोरी के खतरे का सामना कर रहे अन्य संस्थानों को तुरंत अलर्ट मिल जाना चाहिए।
चौथा, संस्थानों को सुरक्षा के लिए AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का उपयोग करना चाहिए। लगातार निगरानी के जरिए असामान्य लॉगिन, अजीब ट्रांजेक्शन और कर्मचारियों द्वारा संदिग्ध एक्सेस की पहचान की जानी चाहिए। बड़ी रकम वाले ट्रांजेक्शन के लिए कई स्वतंत्र मंजूरियों और उस विशेष ट्रांजेक्शन के लिए अलग से ऑथेंटिकेशन की जरूरत होनी चाहिए। कभी भी केवल वॉयस रिकग्निशन (आवाज पहचान) या व्हाट्सएप पर मिले निर्देशों के आधार पर बड़ी रकम का ट्रांसफर नहीं किया जाना चाहिए।




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