पश्चिम बंगाल और बिहार में उत्तर प्रदेश पुलिस की तर्ज पर 'एक्स्ट्राज्यूडिशियल किलिंग' (न्यायेतर हत्याओं) और 'हाफ-एनकाउंटर' (पैर में गोली मारने की घटनाओं) में तेज़ी देखी जा रही है। बंगाल या बिहार के लिए एनकाउंटर कोई नई बात नहीं है, लेकिन चिंता की बात यह है कि बीजेपी सरकार के दौर में इस 'एनकाउंटर मॉडल' का खुलेआम समर्थन किया जा रहा है।
26 अक्टूबर को, उत्तर 24 परगना के गायघाटा में प्रहलाद दास को एक 17 वर्षीय लड़की के कथित बलात्कार और हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया। कुछ घंटों बाद ही पुलिस ने उसे गोली मार दी। पुलिस का दावा है कि जब उसे अपराध स्थल पर ले जाया गया, तो उसने पुलिस की सर्विस रिवॉल्वर छीन ली और उन पर गोली चला दी, जिसके बाद आत्मरक्षा में पुलिस को उसे गोली मारनी पड़ी।
राज्य में तीन महीने के भीतर यह दूसरी ऐसी घटना है। जुलाई में, दक्षिण 24 परगना जिले के बारुईपुर में 11 वर्षीय बच्ची के बलात्कार और हत्या के एक आरोपी को पुलिस ने गोली मार दी थी। इस आरोपी ने भी कथित तौर पर एक अधिकारी की बंदूक छीनने की कोशिश की थी और पुलिस पर गोली चलाई थी, जिसके जवाब में पुलिस को आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी।
बिहार में भी फैला 'एनकाउंटर मॉडल'
बिहार के जमुई में 19 सितंबर को नकाबपोश लोगों द्वारा 10वीं कक्षा की एक छात्रा के साथ छेड़छाड़ करने का वीडियो पूरे देश में वायरल हो गया। इससे बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के वे दावे खोखले साबित हो गए, जिनमें उन्होंने कहा था कि उनके कार्यकाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति में सुधार हुआ है। तीन दिन बाद, बिहार पुलिस ने मुख्य आरोपी नंदन यादव को सबके सामने पेश किया; उसके पैर में गोली लगी थी और वह लंगड़ा कर चल रहा था। पुलिस ने वही पुराना बहाना दिया—आरोपी ने उनकी सर्विस रिवॉल्वर छीन ली और उन पर गोली चला दी, जिसके जवाब में पुलिस को आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी।
सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बिहार में अपनाई जा रही यह सख्त सुरक्षा नीति—जो उत्तर प्रदेश के 'एनकाउंटर-प्रधान' पुलिसिंग मॉडल जैसी ही है—तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाली आरजेडी (RJD) जैसी पार्टियों की आलोचना का शिकार हो रही है। यादव ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया है कि पुलिस की कुछ कार्रवाइयों में लोगों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है और जाति के आधार पर प्रोफाइलिंग की जा रही है।
मध्य प्रदेश के हालात भी कुछ अलग नहीं लगते। सितंबर 2026 की शुरुआत में, इस त्रासदी के तीन मुख्य सूत्रधारों—जिसके कारण 40 से अधिक लोगों की जान गई—को पुलिस ने तीन अलग-अलग घटनाओं में पैर में गोली मारी। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र, जो कभी अपने डाकुओं के लिए कुख्यात था, अब 'हाफ-एनकाउंटर' (पैर में गोली मारने की घटनाओं) के लिए चर्चा में है। ये घटनाएं इतनी अधिक हैं कि मध्य प्रदेश पुलिस इन्हें दर्ज करने की जहमत भी नहीं उठाती।
उत्तर प्रदेश सबसे आगे
बेशक, कोई भी राज्य उत्तर प्रदेश के रिकॉर्ड को नहीं पछाड़ सकता। 2017 में योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के बाद से, यहाँ औसतन हर दिन पांच एनकाउंटर हुए हैं और हर 12 दिन में एक एनकाउंटर में किसी की जान गई है। पहले, ज्यादातर एनकाउंटरों में कथित अपराधियों की मौत हो जाती थी। जब NHRC (राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग) और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इन मौतों पर सवाल उठाए, तो पुलिस ने 'हाफ-एनकाउंटर' का तरीका अपना लिया।
योगी आदित्यनाथ अक्सर दावा करते हैं कि उनके कार्यकाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति में सुधार हुआ है। आदित्यनाथ ने कहा है, "अगर किसी अपराधी को गोली चलाने की छूट है, तो पुलिस के पास भी उनका सामना करने के लिए बंदूकें हैं। उन्हें ऐसी ही स्थितियों के लिए प्रशिक्षित किया जाता है—ताकि अपराधी को उसी भाषा में समझाया जा सके जिसे वह समझता है।"
समस्या यह है कि यह सारी बयानबाजी राज्य में बढ़ते अपराध के आंकड़ों को छिपा नहीं सकती। मार्च 2017 में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद से, यूपी पुलिस ने 17,043 एनकाउंटरों में कम से कम 11,834 कथित अपराधियों को गोली मारकर घायल किया है। पुलिस के पास इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि इनमें से कितने युवा—जो मुख्य रूप से अल्पसंख्यक या दलित समुदायों से आते हैं—हमेशा के लिए विकलांग हो गए हैं।
अक्टूबर 2024 में, 'टाइम्स ऑफ इंडिया' ने रिपोर्ट दी कि अकेले नोएडा के गौतम बुद्ध नगर में, पिछले दो वर्षों के दौरान हर तीन दिन में एक एनकाउंटर हुआ। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में, 327 एनकाउंटरों में 49 कथित अपराधी मारे गए और 416 घायल हुए। साल 2025 और 2026 के पहले छह महीनों में, उत्तर प्रदेश में 4,000, बिहार में 50 और मध्य प्रदेश में 15 'हाफ-एनकाउंटर' हुए हैं। इन 'हाफ-एनकाउंटर' की सबसे शर्मनाक बात यह है कि जिन लोगों को गोली मारी जाती है, उन्हें अस्पताल ले जाकर पट्टी बांधी जाती है और फिर मीडिया के सामने पेश किया जाता है।
पुलिस अधिकारियों ने 'एनकाउंटर कल्चर' पर सवाल उठाए
स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेने वाले IPS अधिकारी अमिताभ ठाकुर का मानना है कि समीक्षा बैठकों के दौरान अक्सर पुलिस अधीक्षकों (SP) से पूछा जाता है कि उनके जिलों में कितने एनकाउंटर हुए हैं और कितने अपराधी मारे गए हैं। अगर कोई SP बताता है कि उसके जिले में कोई अपराधी नहीं मारा गया, तो उसकी कार्यक्षमता पर सवाल उठाए जाते हैं। ऐसे में, ज्यादातर SP आसान रास्ता चुनते हैं और अपने मातहतों से कहते हैं कि अगली समीक्षा बैठक से पहले कुछ एनकाउंटर कर दिए जाएं। 'एनकाउंटर स्पेशलिस्ट' माने जाने वाले पुलिसकर्मी अक्सर छोटे-मोटे अपराधियों को मार गिराते हैं, ताकि वे इनाम पा सकें और उन्हें समय से पहले प्रमोशन मिल सके।
अन्य IPS अधिकारी भी इस पर कड़ी आलोचना करते हैं। UP कैडर के सेवानिवृत्त IG पुलिस, S.R. दारापुरी का कहना है कि जब वे सेवा में थे, तब पुलिस एनकाउंटर बहुत कम होते थे। उनका कहना है कि अब "न्याय-प्रक्रिया से बाहर हत्याएं (एक्स्ट्रा-जुडिशियल किलिंग्स) राज्य की एक अघोषित नीति का हिस्सा बन गई हैं।" उनका मानना है कि कोई भी सरकार एनकाउंटर का सहारा तभी लेती है, जब वह वैध तरीकों से कानून-व्यवस्था बनाए रखने में विफल हो जाती है।
असम पुलिस को भी कई एनकाउंटर और 'हाफ-एनकाउंटर' (पैर में गोली मारने की घटनाएं) को लेकर गंभीर आरोपों और कानूनी जांच का सामना करना पड़ा है। मई 2021 में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के कार्यभार संभालने के बाद से पुलिस द्वारा गोलीबारी की घटनाओं में काफी तेजी आई है। आदित्यनाथ की तरह, सरमा ने भी इन गोलीबारी की घटनाओं का समर्थन किया है। उनका कहना है कि पुलिस को उन संदिग्ध अपराधियों पर गोली चलाने से पीछे नहीं हटना चाहिए, जो अक्सर पुलिस की सर्विस पिस्तौल छीनने या हिरासत से भागने की कोशिश करते हैं, जिससे पुलिस को गोली चलानी पड़ती है। तेलंगाना पुलिस का भी हाई-प्रोफाइल और विवादित 'एक्स्ट्रा-जुडिशियल किलिंग्स' का लंबा इतिहास रहा है।
न्यायपालिका ने भी एनकाउंटर पर सवाल उठाए हैं
UP के मामले में, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में अपराध कई गुना बढ़ गए हैं। 2023 के आंकड़ों के अनुसार, केवल एक साल में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 65,743 मामले सामने आए, जिनमें गैंगरेप, हत्या और अपहरण जैसी घटनाएं शामिल हैं। उसी साल, राज्य में हत्या के 3,491 मामले और SC/ST समुदाय के लोगों के खिलाफ अत्याचार के 15,368 मामले दर्ज किए गए। पुलिस अधिकारियों और सेवानिवृत्त पुलिसकर्मियों का कहना है कि उन्हें अब कम FIR दर्ज करने के निर्देश दिए जाते हैं, ताकि अपराध दर कम दिखाई जा सके। न्यायपालिका ने इन एनकाउंटरों के खिलाफ कड़ी आपत्ति जताई है। जनवरी 2019 में, जब सुप्रीम कोर्ट के सामने उत्तर प्रदेश में हुई एनकाउंटर हत्याओं की एक श्रृंखला का मामला आया, तो कोर्ट ने इस पर गंभीर चिंता जताई। लेकिन क्या सिर्फ ऐसी आलोचना काफी है? निश्चित रूप से, कोर्ट को ऐसे अधिकारियों के खिलाफ स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर व्यक्ति के जीवन की सुरक्षा की गारंटी है।
समस्या यह है कि हमारी न्यायिक प्रक्रियाएं बहुत जटिल और महंगी हैं। सितंबर 2026 तक, न्यायपालिका के सभी स्तरों पर लंबित मामलों की कुल संख्या 5.9 करोड़ (59 मिलियन) से अधिक हो गई है, जिसमें से 5.2 करोड़ (52 मिलियन) से अधिक मामले अकेले जिला और अधीनस्थ अदालतों में अटके हुए हैं। दूसरी ओर, आम जनता तुरंत न्याय चाहती है और गलतफहमी में यह मान लेती है कि इन एनकाउंटरों के जरिए अपराधियों का तुरंत खात्मा हो जाता है।