नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अगली पीढ़ी के ‘जॉइंट ग्रीन क्रैकर्स’ यानी जुड़े हुए ग्रीन पटाखों के निर्माण को सशर्त मंजूरी दे दी। अदालत ने साफ किया कि इन पटाखों का निर्माण तभी किया जा सकेगा जब कोर्ट और संबंधित प्राधिकरणों की ओर से तय तकनीकी और पर्यावरणीय शर्तों का पालन किया जाए। मामला लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और पटाखों से होने वाले प्रदूषण तथा उद्योग के हितों के बीच संतुलन को लेकर लगातार सुनवाई होती रही है।
जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए अगली पीढ़ी के जॉइंट ग्रीन क्रैकर्स को लेकर राहत दी। इससे पहले कोर्ट ने केंद्र और तकनीकी संस्थाओं से यह स्पष्ट करने को कहा था कि नए प्रकार के जुड़े हुए पटाखों में किस तरह के सुरक्षा और प्रदूषण मानक लागू किए जाएंगे।
सुप्रीम कोर्ट के 2 सितंबर के आदेश में यह रिकॉर्ड किया गया था कि नए जनरल जॉइंट फायरक्रैकर्स को तय ध्वनि सीमा के भीतर अनुमति देने पर विचार किया जा सकता है। इसके लिए शेल की संख्या, शेल का आकार और एक विस्फोट से दूसरे विस्फोट के बीच समय अंतराल जैसी तकनीकी शर्तों का पालन जरूरी बताया गया था।
इसी प्रक्रिया के तहत वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थाओं की रिपोर्ट के आधार पर अगली पीढ़ी के ग्रीन पटाखों की संरचना में बदलाव किए गए हैं। इन बदलावों का उद्देश्य पारंपरिक पटाखों की तुलना में प्रदूषण और ध्वनि प्रभाव को कम करना है।
मामले में केंद्र की ओर से पहले यह भी बताया गया था कि नई पीढ़ी के ग्रीन पटाखों के परीक्षण के लिए दिल्ली, भोपाल, कोलकाता और चेन्नई जैसे अलग-अलग प्रदूषण स्तर वाले शहरों को चुना गया है। इन स्थानों पर उत्सर्जन के प्रभाव का अध्ययन कराने की बात कही गई थी।
अदालत की मंजूरी का अर्थ यह नहीं है कि सभी तरह के पटाखों को बिना रोक-टोक निर्माण और बिक्री की अनुमति मिल गई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि संबंधित उत्पादों को पर्यावरणीय, तकनीकी और सुरक्षा मानकों पर खरा उतरना होगा।
अदालत पहले भी पटाखों के मामले में पूर्ण प्रतिबंध और बिना किसी रोक के उपयोग, दोनों के बीच संतुलित रास्ते की जरूरत पर जोर देती रही है। 30 सितंबर को ही सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में पटाखों के इस्तेमाल को लेकर पूर्ण प्रतिबंध के बजाय समयबद्ध और नियंत्रित उपयोग की दिशा में रुख दिखाया।
ग्रीन क्रैकर्स को लेकर लंबे समय से शोध चल रहा है। इसका मकसद ऐसे पटाखे विकसित करना है जिनसे पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम उत्सर्जन हो और पर्यावरण पर कम प्रभाव पड़े। इसमें कच्चे माल, रासायनिक संरचना और ध्वनि स्तर पर तकनीकी नियंत्रण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
‘जॉइंट ग्रीन क्रैकर्स’ मूल रूप से ऐसे जुड़े हुए पटाखों की श्रेणी है जिनमें एक के बाद एक विस्फोट होता है। पहले ऐसे पटाखों को लेकर ध्वनि और वायु प्रदूषण की चिंता अधिक थी। नई पीढ़ी के डिजाइन में इसी समस्या को कम करने का प्रयास किया गया है।
अदालत के सामने तकनीकी पक्ष रखते हुए यह भी बताया गया था कि नए डिजाइन में शेल की संख्या सीमित रखने, शेल के आकार पर नियंत्रण और विस्फोट के बीच निश्चित अंतराल जैसी शर्तें लागू की जा सकती हैं। इससे अत्यधिक ध्वनि और लगातार होने वाले प्रदूषण को सीमित करने का उद्देश्य है।
तमिलनाडु फायरवर्क्स एंड एमोर्सेस मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन यानी TANFAMA ने सुप्रीम कोर्ट के इस कदम को भारतीय आतिशबाजी उद्योग के लिए महत्वपूर्ण बताया है। संगठन का कहना है कि इससे पर्यावरण के लिहाज से बेहतर और वैज्ञानिक रूप से विकसित पटाखों के निर्माण को बढ़ावा मिल सकता है।
तमिलनाडु का शिवकाशी क्षेत्र देश के आतिशबाजी उद्योग का प्रमुख केंद्र माना जाता है। बड़ी संख्या में छोटे और मध्यम उद्योग पटाखा निर्माण से जुड़े हैं और हजारों लोगों की आजीविका इस क्षेत्र पर निर्भर है। ऐसे में नियमों में बदलाव या न्यायिक आदेश का सीधा असर उद्योग और रोजगार पर पड़ता है।
उद्योग से जुड़े संगठनों का कहना है कि वे ऐसी तकनीक अपनाने के पक्ष में हैं जिससे प्रदूषण कम हो और सुरक्षा मानक भी मजबूत हों। हालांकि इसके लिए स्पष्ट नियम, परीक्षण प्रक्रिया और प्रमाणन व्यवस्था जरूरी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में लगातार वैज्ञानिक साक्ष्यों और तकनीकी रिपोर्टों को महत्व दिया है। कोर्ट का रुख रहा है कि पटाखों से जुड़े फैसले केवल परंपरा या कारोबार के आधार पर नहीं, बल्कि पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए लिए जाने चाहिए।
अदालत के वर्तमान आदेश के बाद निर्माताओं को संबंधित तकनीकी मानकों का पालन करना होगा। केवल वही उत्पाद बाजार में आ सकेंगे जिन्हें सक्षम प्राधिकरण द्वारा तय प्रक्रिया के तहत मंजूरी मिलेगी।
प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े प्राधिकरण और वैज्ञानिक संस्थाएं इन उत्पादों की संरचना, ध्वनि स्तर और उत्सर्जन की जांच कर सकते हैं। मानकों का उल्लंघन पाए जाने पर निर्माण या बिक्री पर कार्रवाई संभव होगी।
यह मामला 2015 से न्यायालय में लंबित व्यापक पटाखा विवाद का हिस्सा है। वर्षों के दौरान अदालत ने पटाखों के निर्माण, बिक्री और उपयोग को लेकर कई आदेश जारी किए हैं। इनमें पर्यावरण संरक्षण और नागरिकों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी गई है।
नए जॉइंट ग्रीन क्रैकर्स की अनुमति से उद्योग को एक नया विकल्प मिला है, लेकिन इसके साथ सख्त अनुपालन की जिम्मेदारी भी जुड़ी है। अदालत ने इस राहत को पूर्ण स्वतंत्रता के रूप में नहीं, बल्कि शर्तों के साथ तकनीकी अनुमति के तौर पर देखा है।
अब आगे नजर इस बात पर रहेगी कि संबंधित प्राधिकरण इन पटाखों के निर्माण, परीक्षण और प्रमाणन के लिए किस तरह की विस्तृत प्रक्रिया लागू करते हैं। नई तकनीक से बने पटाखों का वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव भी आगे होने वाले परीक्षणों और उपयोग के बाद अधिक स्पष्ट होगा।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने यह संकेत दिया है कि पर्यावरणीय चिंताओं के बीच भी तकनीकी सुधार और वैज्ञानिक नवाचार के आधार पर आतिशबाजी उद्योग के लिए नियंत्रित रास्ता खुला रखा जा सकता है।