नई दिल्ली : भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष और भाजपा नेता बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ दर्ज यौन उत्पीड़न मामले में दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत के फैसले में महिला पहलवानों के बयानों में सामने आए विरोधाभास को अहम आधार माना गया है। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अश्वनी पंवार ने अपने 239 पन्नों के फैसले में कथित घटनाओं के स्थान, देश और वर्ष को लेकर शिकायतकर्ताओं के शुरुआती और बाद के बयानों में अंतर पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने इन विरोधाभासों को अभियोजन पक्ष के मामले की विश्वसनीयता प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण पहलू माना।
अदालत के अनुसार, शिकायतकर्ता पहलवानों ने अपने बयानों में यह कहा था कि उन्हें अपने करियर पर असर पड़ने और पेशेवर नुकसान का डर था। इसी वजह से उन्होंने कथित घटनाओं के संबंध में लंबे समय तक शिकायत नहीं की। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि जब शिकायतकर्ताओं ने बाद में आरोप लगाए तो कथित पहली घटना के स्थान, देश और वर्ष को लेकर उनके बयानों में बदलाव सामने आया। कोर्ट ने माना कि किसी कथित यौन उत्पीड़न की घटना के स्थान और समय को लेकर इस तरह का महत्वपूर्ण अंतर सामान्य परिस्थिति नहीं माना जा सकता।
फैसले में कहा गया कि गवाह के शुरुआती बयान और बाद में दिए गए बयान के बीच कथित घटना की जगह और समय को लेकर बदलाव अभियोजन की पूरी कहानी पर असर डालता है। अदालत ने इस विरोधाभास को केवल मामूली अंतर नहीं माना, बल्कि इसे गवाह की विश्वसनीयता से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। कोर्ट के मुताबिक, जिस घटना को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हों, उसके स्थान को याद रखने में इतना बड़ा अंतर अभियोजन के मामले को कमजोर करता है।
अदालत ने शिकायतकर्ताओं के बृजभूषण शरण सिंह के साथ कथित तौर पर लंबे समय तक बने रहे सामाजिक और पारिवारिक संबंधों का भी उल्लेख किया। फैसले में कहा गया कि शिकायतकर्ताओं ने एक तरफ यह तर्क दिया कि करियर खत्म होने के डर से वे लंबे समय तक आरोप नहीं लगा सकीं, जबकि दूसरी तरफ अदालत के सामने यह तथ्य आया कि वे कथित आरोपी के साथ वर्षों तक सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने का दावा करती रहीं। फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि बृजभूषण को कुछ पारिवारिक और शादी समारोहों में आमंत्रित किया गया था।
कोर्ट ने इन परिस्थितियों को भी अभियोजन के दावों की जांच करते समय महत्वपूर्ण माना। हालांकि, अदालत के फैसले का आधार केवल एक तथ्य नहीं था। 239 पन्नों के आदेश में गवाहों के बयानों, उनमें आए अंतर और मामले से जुड़े अन्य तथ्यों का परीक्षण किया गया। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अभियोजन पक्ष के मामले की विश्वसनीयता का आकलन किया।
फैसले में अदालत ने आरोपों को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए इन्हें झूठा, मनगढ़ंत और राजनीति से प्रेरित साजिश का हिस्सा माना। अदालत के अनुसार, कथित पहली घटना को लेकर गलत देश और वर्ष बताए जाने सहित बयानों में सामने आए विरोधाभासों ने अभियोजन के मामले पर गंभीर संदेह पैदा किया। फैसले में यह भी कहा गया कि आरोप अन्य शिकायतकर्ता पहलवानों और एक कोच के कथित प्रभाव या कहने पर लगाए जाने की बात सामने आई।
बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ यह मामला महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था। पहलवानों ने लंबे समय तक सार्वजनिक रूप से विरोध प्रदर्शन भी किया था और मामले में कार्रवाई की मांग की थी। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने जांच कर अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया था। मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ताओं और अन्य गवाहों के बयानों की जांच की गई।
अब अदालत के फैसले में बयानों के बीच कथित विरोधाभास को अभियोजन के मामले के लिए निर्णायक माना गया है। विशेष रूप से घटना के स्थान, देश और वर्ष में बदलाव को अदालत ने गंभीर विसंगति माना। इसी आधार पर अदालत ने अभियोजन पक्ष की कहानी की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए और बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ मामले में राहत दी।
इस फैसले के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। बृजभूषण समर्थकों ने इसे उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की सच्चाई सामने आने के रूप में पेश किया, जबकि पूरे मामले को लेकर पहले से राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी बहस होती रही है। अदालत का फैसला उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के न्यायिक मूल्यांकन पर आधारित है। मामले में अदालत द्वारा दर्ज की गई टिप्पणियां अब इस पूरे विवाद में महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ बन गई हैं।
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