नई दिल्ली। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर ने नई संसद भवन की वास्तुकला और उसके माहौल को लेकर तीखी टिप्पणी की है। गुरुवार को नई दिल्ली में एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान थरूर ने नई संसद भवन को “बिना किसी भावना वाला कॉन्फ्रेंस सेंटर” बताते हुए कहा कि इसमें आराम और दूरी की कमी देश की राजनीति में बढ़ते ध्रुवीकरण को दर्शाती है।
थरूर पत्रकार और लेखिका सोभना के. नायर की नई किताब Housing the Republic: A Biography of the Indian Parliament के लॉन्च कार्यक्रम में बोल रहे थे। पुस्तक भारतीय संसद की इमारतों, उनके इतिहास और लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकास पर केंद्रित है। कार्यक्रम में थरूर के अलावा प्रियंका चतुर्वेदी, मनोज कुमार झा, मेनका गुरुस्वामी और लेखिका सोभना के. नायर भी शामिल थीं। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार निधि राजदान ने किया।
नई संसद की वास्तुकला पर सवाल
थरूर ने अपने संबोधन में नई संसद भवन और पुराने संसद भवन के बीच के अंतर को रेखांकित किया। उनके अनुसार, संसद केवल विधायी कामकाज के लिए बनी एक इमारत नहीं होती, बल्कि वह लोकतंत्र की भावनाओं, राजनीतिक संवाद और देश की सामूहिक स्मृतियों को भी अपने भीतर समेटती है।
उन्होंने नई इमारत को लेकर कहा कि उसमें पुराने संसद भवन जैसी भावनात्मक गर्माहट महसूस नहीं होती। उनके मुताबिक, नई इमारत का स्वरूप ज्यादा औपचारिक और सम्मेलन केंद्र जैसा प्रतीत होता है। उन्होंने यह टिप्पणी ऐसे समय की है जब नई संसद को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर इसके डिजाइन, उपयोग और प्रतीकात्मक महत्व पर चर्चा जारी है।
थरूर ने यह भी कहा कि इमारत में मौजूद भौतिक दूरी और सहजता की कमी राजनीति में बढ़ती दूरी का प्रतीक बनती दिखाई देती है। उनके मुताबिक, संसद भवन का डिजाइन केवल वास्तुकला का विषय नहीं है, बल्कि वह यह भी बताता है कि लोकतंत्र में लोगों और उनके प्रतिनिधियों के बीच किस तरह का संबंध होना चाहिए।
‘राष्ट्रीय राजधानी पर भौतिक छाप छोड़ने की इच्छा’
कार्यक्रम के दौरान थरूर ने दावा किया कि राष्ट्रीय राजधानी पर एक विशेष तरह की “फिजिकल छाप छोड़ने की इच्छा” रही है। उनके इस बयान को नई दिल्ली के पुनर्विकास और सेंट्रल विस्टा परियोजना के व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।
सेंट्रल विस्टा परियोजना के तहत नई संसद भवन का निर्माण पुराने संसद भवन के समीप किया गया है। सरकार के अनुसार नई इमारत का उद्देश्य आधुनिक सुविधाओं से लैस ऐसी संसद उपलब्ध कराना था, जो भविष्य में सांसदों की बढ़ती संख्या और आधुनिक तकनीकी जरूरतों को पूरा कर सके। सरकारी योजना के मुताबिक नई लोकसभा में संयुक्त बैठकों के लिए 1,272 सदस्यों तक की क्षमता रखी गई है।
सरकार ने नई संसद को आधुनिक, सुरक्षित और तकनीकी रूप से उन्नत भवन के रूप में प्रस्तुत किया है। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, इसमें लोकसभा और राज्यसभा के बड़े कक्ष, आधुनिक समिति कक्ष, सांसदों के लिए कार्यालय और अन्य सुविधाएं शामिल हैं। भवन के डिजाइन में भारत के राष्ट्रीय पक्षी, राष्ट्रीय फूल और राष्ट्रीय वृक्ष जैसे प्रतीकों को भी शामिल किया गया है।
सरकार ने बताई थी नई इमारत की जरूरत
नई संसद भवन के निर्माण को लेकर सरकार का तर्क रहा है कि पुरानी संसद इमारत 1927 में बनी थी और वर्तमान समय की जरूरतों के लिहाज से उसकी क्षमता तथा बुनियादी ढांचा सीमित हो गया था। सेंट्रल विस्टा की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, पुरानी इमारत में लोकसभा और सेंट्रल हॉल की क्षमता सीमित थी तथा आधुनिक तकनीक, सुरक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाओं को अपग्रेड करने की आवश्यकता थी।
सरकार के अनुसार, नई संसद भवन को भविष्य में संसद के विस्तार को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। भवन में आधुनिक तकनीकी सुविधाओं के साथ भारतीय कला और संस्कृति से जुड़े तत्वों को भी जगह दी गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई संसद के उद्घाटन के दौरान इसे भारत की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं और सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक बताया था।
पुरानी संसद से जुड़ी भावनाएं
थरूर की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण पहलू पुरानी संसद भवन से जुड़ी भावनात्मक विरासत भी है। पुरानी इमारत में स्वतंत्र भारत की संविधान सभा की बैठकों से लेकर दशकों तक संसद की कार्यवाही हुई। यही वजह है कि उसके साथ सांसदों, पूर्व सांसदों और आम लोगों की गहरी ऐतिहासिक और भावनात्मक स्मृतियां जुड़ी हुई हैं।
प्रधानमंत्री ने भी पुराने संसद भवन के सेंट्रल हॉल को लेकर कहा था कि वहां संविधान सभा की बैठकों में संविधान पर विस्तृत चर्चा हुई और संविधान का निर्माण हुआ।
इसी ऐतिहासिक संदर्भ में नई इमारत को लेकर यह बहस जारी है कि आधुनिक सुविधाओं के साथ संसद भवन में लोकतांत्रिक संस्थाओं की भावनात्मक विरासत किस तरह कायम रखी जा सकती है।
राजनीतिक ध्रुवीकरण से जोड़ा वास्तुकला को
थरूर ने नई संसद भवन की संरचना और राजनीति के बीच संबंध स्थापित करते हुए कहा कि इमारत में आराम और दूरी का जो अनुभव होता है, वह मौजूदा राजनीतिक माहौल के ध्रुवीकरण को भी प्रतिबिंबित करता है। उनका कहना था कि संसद का वातावरण ऐसा होना चाहिए जहां अलग-अलग राजनीतिक विचारों के प्रतिनिधियों के बीच संवाद और मेल-जोल की गुंजाइश बनी रहे।
उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब संसद की भूमिका, राजनीतिक संवाद और सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच संबंधों को लेकर लगातार बहस होती रही है। नई संसद भवन को लेकर थरूर की टिप्पणी इस व्यापक बहस में वास्तुकला और लोकतांत्रिक संस्कृति के संबंध का एक नया पहलू सामने रखती है।
हालांकि, नई संसद के समर्थकों का तर्क है कि आधुनिक भारत की बदलती जरूरतों के लिए नई इमारत आवश्यक थी और इसमें भारतीय कला, संस्कृति तथा आधुनिक तकनीक का समावेश किया गया है। सरकारी परियोजना के मुताबिक नई इमारत को भविष्य की संसद की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
इस तरह नई संसद भवन को लेकर बहस केवल एक इमारत के डिजाइन तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी सामने है कि संसद जैसी लोकतांत्रिक संस्था के लिए वास्तुकला कितनी महत्वपूर्ण है और क्या कोई भवन राजनीतिक संवाद, ऐतिहासिक स्मृति और लोकतांत्रिक भावना को अपने स्वरूप में व्यक्त कर सकता है। शशि थरूर की टिप्पणी ने इसी बहस को एक बार फिर राजनीतिक और सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।