दिनई दिल्ली: दिल्ली के सत्य निकेतन में हुई इमारत गिरने की घटना को लेकर सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। अदालत के सामने दाखिल एक याचिका में दावा किया गया कि 6 सितंबर को गिरी पांच मंजिला इमारत के मलबे के नीचे अब भी कुछ लोग दबे हो सकते हैं। इस दावे पर कोर्ट ने याचिकाकर्ता से ही सवाल कर दिया कि आखिर उन्हें यह जानकारी कहां से मिली और इसका आधार क्या है।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ के सामने हुई। याचिका में आरोप लगाया गया था कि नगर निगम ने गिरी हुई सत्य निकेतन इमारत के पास वाली बिल्डिंग को मलबा हटाए बिना ही गिरा दिया। याचिकाकर्ता की ओर से आशंका जताई गई कि दूसरी इमारत के अंदर भी लोग फंसे हो सकते हैं।
हाईकोर्ट ने पूछा—जानकारी का स्रोत क्या है?
याचिका में किए गए दावे पर अदालत ने तत्काल सवाल उठाया। मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि उन्हें कैसे पता चला कि मलबे के नीचे लोग दबे हुए हैं। कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि इस जानकारी का स्रोत क्या है और याचिका दाखिल करने में इतनी जल्दबाजी की जरूरत क्यों है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि बगल की इमारत को गिराने का फैसला लेने से पहले अधिकारियों ने किसी तरह का तकनीकी ऑडिट जरूर कराया होगा। अदालत ने इसी आधार पर याचिकाकर्ता को अपनी याचिका दाखिल करने के लिए कहा।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका दाखिल होने के बाद इसे अगले दिन स्वतः सूचीबद्ध किया जाएगा। अदालत की टिप्पणी का केंद्र यही था कि इमारत को गिराने से पहले प्रशासन की ओर से तकनीकी जांच की गई होगी और इस प्रक्रिया को भी देखा जाना जरूरी है।
6 सितंबर को गिरी थी पांच मंजिला इमारत
सत्य निकेतन में यह हादसा 6 सितंबर को हुआ था। दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास स्थित इस इलाके में पांच मंजिला इमारत अचानक गिर गई थी। बताया गया कि इस इमारत का इस्तेमाल लड़कों के लिए पीजी के रूप में किया जा रहा था।
हादसे में कुल सात लोगों की मौत हुई थी। मृतकों में छात्र और मजदूर दोनों शामिल थे। इस घटना के बाद इमारतों की सुरक्षा और पीजी-हॉस्टल की संरचनात्मक स्थिति को लेकर सवाल उठे हैं।
पीड़ित परिवारों के मुआवजे और ऑडिट की मांग
सत्य निकेतन हादसे को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट पहले से ही एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है। इस याचिका में हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा देने की भी मांग की गई है।
इसके साथ ही दिल्ली में संचालित पीजी और हॉस्टल की इमारतों का संरचनात्मक ऑडिट कराने की मांग भी अदालत के सामने रखी गई है। यानी सिर्फ सत्य निकेतन की घटना तक मामला सीमित नहीं है, बल्कि दूसरी ऐसी इमारतों की सुरक्षा की भी जांच कराने की मांग की गई है।
इसके अलावा हाईकोर्ट एक दूसरी जनहित याचिका पर भी विचार कर रहा है। इसमें मांग की गई है कि दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े हर कॉलेज के लिए हॉस्टल की सुविधा सुनिश्चित करने के संबंध में जरूरी निर्देश दिए जाएं।
इस तरह सत्य निकेतन हादसे से जुड़ी सुनवाई में सोमवार को अदालत ने मलबे में लोगों के दबे होने के दावे के आधार पर सवाल उठाया और याचिकाकर्ता से उसकी जानकारी के स्रोत के बारे में पूछा। साथ ही अदालत ने इमारत गिराने से पहले तकनीकी ऑडिट किए जाने की प्रक्रिया पर भी जोर दिया।