नई दिल्ली। समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। AIMIM प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया है कि UCC का मकसद देश के करीब 18 करोड़ मुसलमानों को निशाना बनाना है। ओवैसी ने कहा कि समानता के नाम पर धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को खत्म करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। हालांकि, यह ओवैसी का राजनीतिक आरोप है और इसे स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
UCC को लेकर अमित शाह की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए ओवैसी ने कई सवाल उठाए। उनका कहना है कि संविधान देश के नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता और अपनी परंपराओं का पालन करने का अधिकार देता है। ऐसे में सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि प्रस्तावित समान नागरिक संहिता का स्वरूप क्या होगा और इससे अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों पर क्या असर पड़ेगा।
अमित शाह के बयान पर भड़के ओवैसी
ओवैसी ने गृह मंत्री अमित शाह के UCC से जुड़े बयान को लेकर कहा कि इस मुद्दे को बार-बार मुस्लिम समुदाय से जोड़कर पेश किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके जरिए देश के मुसलमानों को राजनीतिक रूप से निशाना बनाने की कोशिश हो रही है।
AIMIM प्रमुख ने सवाल किया कि अगर समान नागरिक संहिता वास्तव में सभी नागरिकों के लिए समान कानून की बात करती है तो सरकार को इसका पूरा मसौदा सार्वजनिक करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मसौदा सामने आने के बाद ही इस पर वास्तविक और व्यापक बहस संभव होगी।
ओवैसी लंबे समय से UCC के आलोचक रहे हैं। उनका तर्क है कि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में अलग-अलग समुदायों की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को ध्यान में रखना जरूरी है। उनका कहना है कि समानता का अर्थ हर समुदाय की परंपरा को एक जैसा कर देना नहीं होना चाहिए।
क्या है यूनिफॉर्म सिविल कोड?
समान नागरिक संहिता का सामान्य अर्थ देश के नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, विरासत, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे नागरिक मामलों में समान कानून से है। फिलहाल भारत में इन मामलों से जुड़े कई प्रावधान समुदायों के पर्सनल लॉ के आधार पर अलग-अलग हैं।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य के नीति निदेशक तत्वों के तहत कहा गया है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। हालांकि, इसे लागू करने के तरीके और इसके दायरे को लेकर लंबे समय से राजनीतिक, कानूनी और सामाजिक बहस चलती रही है।
UCC के समर्थकों का तर्क है कि अलग-अलग पर्सनल लॉ की जगह समान कानून होने से लैंगिक समानता मजबूत होगी और सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक तथा उत्तराधिकार जैसे मामलों में एक समान व्यवस्था बनेगी।
वहीं इसके विरोधियों का कहना है कि भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए किसी भी समान कानून को लागू करने से पहले व्यापक विचार-विमर्श जरूरी है। उनकी चिंता है कि जल्दबाजी में बनाई गई व्यवस्था अल्पसंख्यक और आदिवासी समुदायों की परंपराओं को प्रभावित कर सकती है।
मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर सवाल
ओवैसी ने UCC की बहस में मुस्लिम पर्सनल लॉ का मुद्दा भी उठाया है। उनका कहना है कि संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अधिकार दिए गए हैं और इन अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि अगर सरकार UCC लाती है तो मुस्लिम विवाह, तलाक और विरासत से जुड़े मौजूदा नियमों का क्या होगा। इसके साथ ही उन्होंने अन्य समुदायों के रीति-रिवाजों और परंपराओं का मुद्दा भी उठाया।
ओवैसी का तर्क है कि UCC को केवल हिंदू-मुस्लिम के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। देश में विभिन्न जनजातीय समुदायों और दूसरे समूहों की भी अपनी अलग परंपराएं और प्रथाएं हैं। इसलिए किसी भी कानून को बनाने से पहले इन सभी पक्षों से चर्चा की जानी चाहिए।
सरकार का क्या रहा है तर्क?
भाजपा लंबे समय से समान नागरिक संहिता की समर्थक रही है। पार्टी इसे अपने प्रमुख राजनीतिक और वैचारिक मुद्दों में शामिल करती रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि संविधान में भी UCC का उल्लेख है और समान नागरिक कानून सामाजिक न्याय तथा लैंगिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
सरकार और भाजपा से जुड़े नेताओं की ओर से समय-समय पर यह भी कहा गया है कि UCC किसी धर्म के खिलाफ नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य नागरिक मामलों में समानता स्थापित करना है।
दूसरी ओर विपक्ष के कई नेता और मुस्लिम संगठन इसकी जरूरत, स्वरूप और संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार को किसी भी राष्ट्रीय स्तर की व्यवस्था से पहले सभी संबंधित पक्षों को भरोसे में लेना चाहिए।
UCC पर पहले भी हो चुका है सियासी घमासान
समान नागरिक संहिता भारतीय राजनीति में नया मुद्दा नहीं है। दशकों से इसे लेकर चर्चा होती रही है। हर बार जब केंद्र या किसी राज्य की ओर से UCC पर कोई कदम उठाया जाता है, राजनीतिक बहस तेज हो जाती है।
उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा बढ़ी। इसके बाद दूसरे राज्यों में भी UCC को लेकर संभावनाओं और प्रस्तावों पर राजनीतिक बयान सामने आते रहे हैं।
इस मुद्दे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि राष्ट्रीय स्तर पर UCC का कोई प्रस्ताव आता है तो उसमें किन कानूनों को शामिल किया जाएगा, किन समुदायों या परंपराओं को छूट मिलेगी और मौजूदा पर्सनल लॉ पर इसका कितना प्रभाव पड़ेगा।
ओवैसी के बयान से राजनीतिक तापमान बढ़ा
अमित शाह पर ओवैसी के ताजा हमले के बाद UCC को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है। ओवैसी ने इसे मुस्लिम समुदाय के अधिकारों से जोड़ते हुए सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं, जबकि भाजपा का रुख रहा है कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य सभी नागरिकों को समान नागरिक कानून के दायरे में लाना है।
ऐसे में UCC पर बहस केवल कानून तक सीमित नहीं है। इसके साथ संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार, पर्सनल लॉ और देश की सांस्कृतिक विविधता जैसे कई महत्वपूर्ण पहलू जुड़े हुए हैं।
आने वाले समय में यदि केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्तर पर UCC का कोई मसौदा या विधायी प्रस्ताव सामने लाती है, तो उसके वास्तविक प्रावधानों से तस्वीर ज्यादा स्पष्ट होगी। फिलहाल ओवैसी का यह दावा कि UCC का उद्देश्य देश के 18 करोड़ मुसलमानों को टारगेट करना है, उनका राजनीतिक आरोप है। सरकार और UCC समर्थक इस तरह के आरोपों से असहमति जताते रहे हैं। ऐसे में खबर की निष्पक्ष प्रस्तुति के लिए दोनों पक्षों के रुख को अलग-अलग और स्पष्ट रूप से रखना जरूरी है।
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