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Delhi दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को फैसला सुनाया कि पुलिस 'प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स (PCPNDT) एक्ट, 1994' के तहत अपराधों की जांच नहीं कर सकती। इस कानून का मकसद भ्रूण के लिंग का पता लगाने के लिए प्री-नेटल डायग्नोस्टिक तकनीकों के इस्तेमाल पर रोक लगाना था। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि पुलिस PCPNDT एक्ट के तहत अपराधों के लिए सिर्फ़ इसलिए FIR दर्ज नहीं कर सकती कि ऐसे अपराधों को 'कॉग्निजेबल' (बिना वारंट गिरफ्तारी योग्य) और 'नॉन-बेलेबल' (गैर-जमानती) माना गया है; बल्कि कानून के तहत तय अधिकारियों को ही ऐसे मामलों में कार्रवाई करनी चाहिए। PCPNDT एक्ट के तहत बनाया गया खास एनफोर्समेंट मैकेनिज्म ही लागू होगा और इसे आम पुलिस जांच प्रक्रिया से नहीं बदला जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि इस एक्ट के तहत अपराधों की जांच का अधिकार 'एप्रोप्रिएट अथॉरिटी' (उचित प्राधिकारी) के पास है और मजिस्ट्रेट पुलिस चार्ज-शीट के आधार पर मामले का संज्ञान (कॉग्निजेंस) नहीं ले सकते। संज्ञान केवल एक्ट की धारा 28 के अनुसार दर्ज शिकायत पर ही लिया जा सकता है। PCPNDT एक्ट की धारा 28 अदालतों को इस एक्ट के तहत किसी अपराध का संज्ञान लेने से रोकती है, जब तक कि अधिकृत 'एप्रोप्रिएट अथॉरिटी' या किसी व्यक्ति द्वारा 15 दिन का पूर्व नोटिस देकर सीधे औपचारिक शिकायत दर्ज न कराई गई हो। केवल मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट या फर्स्ट क्लास ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ही इस एक्ट के तहत अपराधों की सुनवाई करने के लिए अधिकृत हैं।
हालांकि, कानूनी कामों को प्रभावी ढंग से पूरा करने के लिए बहुत ज़रूरी और गंभीर स्थितियों में पुलिस की मदद ली जा सकती है, इसे मानते हुए शीर्ष अदालत ने पुलिस की मदद और पुलिस जांच के बीच अंतर स्पष्ट किया। शीर्ष अदालत ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने, तलाशी लेने, ज़ब्ती करने या सबूतों को नष्ट होने से बचाने जैसी स्थितियों में पुलिस मदद तो कर सकती है, लेकिन ऐसी सीमित मदद पुलिस को PCPNDT एक्ट के तहत तय जांच को अपने हाथ में लेने की इजाज़त नहीं देती। यह फैसला उत्तर प्रदेश सरकार की उस याचिका पर आया जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के 30 सितंबर, 2024 के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसने PCPNDT एक्ट के तहत पुलिस की कार्रवाई पर रोक लगाई थी।





