नई दिल्ली/लखनऊ। भारत की मेजबानी में आयोजित BRICS Summit 2026 में आतंकवाद के मुद्दे पर आए बयान के बाद देश की राजनीति में भी इसकी चर्चा तेज हो गई है। एक तरफ जहां नई दिल्ली घोषणापत्र में **पहलगाम आतंकी हमले की निंदा** और आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख को भारत की कूटनीतिक सफलता बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा प्रमुख **मायावती** के हालिया फैसलों को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि एक तरफ केंद्र सरकार वैश्विक मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ भारत का पक्ष मजबूत कर रही है, वहीं दूसरी ओर मायावती अपनी पार्टी बसपा को 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले नए सिरे से खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि **BRICS के मंच से पाकिस्तान को दिए गए संदेश और मायावती की रणनीति के बीच क्या कोई राजनीतिक कनेक्शन है?**
हालांकि दोनों मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों ही घटनाएं भारतीय राजनीति और कूटनीति में बड़े बदलावों की ओर इशारा करती हैं।
BRICS में आतंकवाद पर भारत का सख्त रुख
BRICS Summit 2026 के दौरान जारी नई दिल्ली घोषणापत्र में आतंकवाद के खिलाफ कड़ा संदेश दिया गया।
घोषणापत्र में आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा की गई और कहा गया कि किसी भी स्थिति में आतंकवादी गतिविधियों को सही नहीं ठहराया जा सकता।
भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मुद्दा उठाता रहा है कि आतंकवाद को लेकर दुनिया को एक समान नीति अपनानी चाहिए।
नई दिल्ली घोषणापत्र में पहलगाम आतंकी हमले की निंदा को भारत की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
पाकिस्तान का नाम नहीं, लेकिन संदेश साफ?
BRICS के बयान में सीधे तौर पर पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया।
लेकिन भारत में इसे सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ एक मजबूत संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
भारत लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि पाकिस्तान की जमीन से संचालित आतंकी संगठन भारत के खिलाफ गतिविधियों को अंजाम देते हैं।
हालांकि पाकिस्तान इन आरोपों को खारिज करता रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की कोशिश रही है कि आतंकवाद के मुद्दे को किसी एक देश के विवाद के बजाय वैश्विक सुरक्षा चुनौती के रूप में पेश किया जाए।
BRICS जैसे बड़े समूह में आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख बनना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
मोदी सरकार की कूटनीतिक रणनीति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार लगातार यह संदेश देती रही है कि भारत आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर कायम है।
चाहे संयुक्त राष्ट्र हो, G20 हो या BRICS, भारत हर बड़े मंच पर आतंकवाद के मुद्दे को उठाता रहा है।
नई दिल्ली में BRICS देशों की सहमति से भारत को यह दिखाने का मौका मिला कि आतंकवाद के खिलाफ उसकी चिंता केवल द्विपक्षीय मामला नहीं बल्कि वैश्विक मुद्दा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जब रूस, चीन, भारत और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाएं एक ही भाषा में आतंकवाद की निंदा करती हैं तो इसका अंतरराष्ट्रीय प्रभाव बढ़ता है।
अब चर्चा मायावती की राजनीति की
दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा प्रमुख मायावती के फैसले भी चर्चा में हैं।
मायावती ने हाल में साफ संकेत दिया कि केवल पारिवारिक रिश्ते के आधार पर किसी को पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी।
उन्होंने अपने भतीजे आकाश आनंद और ईशान आनंद को लेकर भी स्पष्ट रुख अपनाया है।
साथ ही भतीजी दीपिका आनंद के लिए भविष्य की संभावना जरूर जताई, लेकिन इसके लिए पार्टी के प्रति निष्ठा और क्षमता साबित करने की शर्त रखी।
मायावती की रणनीति क्या है?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मायावती इस समय बसपा की पुरानी पहचान और नए राजनीतिक समीकरणों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं।
बसपा का मुख्य आधार दलित राजनीति रही है।
लेकिन बदलते चुनावी माहौल में पार्टी को युवाओं, नए मतदाताओं और सोशल मीडिया पर सक्रिय वर्ग तक पहुंच बनानी होगी।
यही कारण है कि मायावती संगठन में बदलाव और नई पीढ़ी को लेकर लगातार संकेत दे रही हैं।
क्या परिवारवाद से दूरी का संदेश?
मायावती का हालिया फैसला परिवारवाद की बहस से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है।
देश की राजनीति में कई दलों पर परिवार आधारित नेतृत्व के आरोप लगते रहे हैं।
ऐसे समय में मायावती यह संदेश देना चाहती हैं कि बसपा में किसी को सिर्फ परिवार का सदस्य होने के कारण पद नहीं मिलेगा।
उनका जोर संगठन, अनुशासन और बहुजन मिशन पर है।
2027 यूपी चुनाव की तैयारी
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं।
भाजपा जहां सत्ता बनाए रखने की कोशिश में जुटी है, वहीं समाजवादी पार्टी विपक्षी भूमिका को मजबूत करने में लगी है।
बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपना पुराना राजनीतिक प्रभाव वापस हासिल करना है।
मायावती के सामने सवाल है कि क्या पार्टी नए सामाजिक समीकरणों के साथ चुनावी मैदान में वापसी कर पाएगी।
युवाओं पर मायावती का फोकस
मायावती ने हाल में युवाओं को संगठन में ज्यादा जगह देने के संकेत दिए हैं।
यह रणनीति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर प्रदेश में युवा मतदाता चुनाव परिणामों को काफी प्रभावित करते हैं।
Gen-Z और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय युवाओं तक पहुंच बनाना अब हर राजनीतिक दल की प्राथमिकता बन चुका है।
बसपा भी इसी दिशा में बदलाव की कोशिश कर रही है।
BRICS और घरेलू राजनीति का संबंध
BRICS का मंच अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़ा विषय है, जबकि मायावती का फैसला उत्तर प्रदेश की आंतरिक राजनीति से संबंधित है।
दोनों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है।
लेकिन दोनों घटनाओं में एक समान बात दिखाई देती है—**बदलते समय के अनुसार अपनी रणनीति को मजबूत करना।**
भारत वैश्विक मंचों पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
वहीं मायावती अपनी पार्टी को नए राजनीतिक दौर के लिए तैयार करने की कोशिश कर रही हैं।
पाकिस्तान मुद्दे पर विपक्ष की राजनीति
भारत-पाकिस्तान संबंधों और आतंकवाद का मुद्दा हमेशा घरेलू राजनीति में भी प्रभाव डालता रहा है।
सत्ता पक्ष इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ता है, जबकि विपक्ष कई बार सरकार से जवाबदेही और कूटनीतिक रणनीति पर सवाल करता है।
ऐसे मुद्दों पर सभी दलों की अपनी-अपनी राजनीतिक स्थिति होती है।
बसपा प्रमुख मायावती भी राष्ट्रीय मुद्दों पर समय-समय पर अपना रुख रखती रही हैं।
मायावती के सामने सबसे बड़ी चुनौती
बसपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपना खोया जनाधार वापस पाना है।
2012 के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा का प्रभाव धीरे-धीरे कम हुआ है।
2014 के बाद भाजपा के मजबूत उभार और 2022 में समाजवादी पार्टी की बढ़ती ताकत के बीच बसपा को अपनी जगह बनानी होगी।
इसके लिए संगठन को मजबूत करना, नए चेहरों को आगे लाना और मतदाताओं का भरोसा वापस हासिल करना जरूरी होगा।
दीपिका आनंद पर क्यों नजर?
मायावती द्वारा दीपिका आनंद का नाम लेना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि अभी उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी गई है।
लेकिन यह संकेत जरूर है कि मायावती भविष्य के नेतृत्व विकल्पों पर विचार कर रही हैं।
अगर दीपिका पार्टी में सक्रिय होती हैं तो यह बसपा की नई पीढ़ी की राजनीति की शुरुआत हो सकती है।
आकाश आनंद के बाद नया समीकरण
आकाश आनंद को कभी बसपा का भविष्य का चेहरा माना जा रहा था।
लेकिन अब मायावती के फैसले के बाद पार्टी के अंदर नेतृत्व को लेकर नया समीकरण बन गया है।
यह देखना दिलचस्प होगा कि बसपा भविष्य में परिवार के बाहर से कोई नया चेहरा तलाशती है या किसी युवा पारिवारिक सदस्य को आगे बढ़ाती है।
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