नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी CBSE की पढ़ाई और मूल्यांकन व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। कक्षा 9वीं में तीसरी भाषा के मूल्यांकन को केवल किताबों और लिखित परीक्षा तक सीमित रखने के बजाय रोजमर्रा की बातचीत और व्यावहारिक भाषा कौशल से जोड़ने की तैयारी है। प्रस्तावित व्यवस्था में तीसरी भाषा की लिखित परीक्षा 40 अंकों की होगी, जबकि बाकी मूल्यांकन में विद्यार्थियों की भाषा समझने, बोलने और उसका व्यावहारिक इस्तेमाल करने की क्षमता को महत्व दिया जाएगा।
नई व्यवस्था का मकसद विद्यार्थियों पर तीसरी भाषा का अतिरिक्त अकादमिक बोझ डालने के बजाय उन्हें भाषा का वास्तविक जीवन में इस्तेमाल सिखाना है। विद्यार्थी सामान्य बातचीत कर पा रहा है या नहीं, सामने वाले की बात समझता है या नहीं और दैनिक परिस्थितियों में भाषा का इस्तेमाल कितनी आसानी से करता है, इन पहलुओं को मूल्यांकन में जगह मिलने की बात सामने आई है।
यह बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा में भाषा सीखने को लेकर दिए गए सुझावों से जुड़ा है। नई शिक्षा व्यवस्था में रटने की जगह कौशल आधारित और व्यावहारिक शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है। इसी दिशा में भाषाओं को भी केवल व्याकरण और लिखित उत्तरों तक सीमित न रखकर संवाद से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। कक्षा 9वीं में तीसरी भाषा के लिए कुल मूल्यांकन में लिखित परीक्षा के 40 अंक रखे जाने की बात है। बाकी हिस्से में मौखिक संवाद, सुनने और बोलने की क्षमता तथा अन्य आंतरिक गतिविधियों को शामिल किया जा सकता है। हालांकि अंतिम पैटर्न और इसके क्रियान्वयन से जुड़े विस्तृत निर्देशों के लिए CBSE की आधिकारिक अधिसूचना महत्वपूर्ण होगी। इस व्यवस्था का एक बड़ा फायदा उन विद्यार्थियों को हो सकता है जो भाषा बोलने और समझने में अच्छे हैं, लेकिन पारंपरिक लिखित परीक्षा में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाते। भाषा सीखने का उद्देश्य भी केवल प्रश्नों के उत्तर लिखना नहीं बल्कि उसका इस्तेमाल संवाद के माध्यम के रूप में करना है।
स्कूलों की भूमिका भी इस बदलाव के बाद महत्वपूर्ण हो जाएगी। शिक्षकों को कक्षा में विद्यार्थियों के बीच बातचीत, संवाद आधारित गतिविधियां और भाषा के दैनिक इस्तेमाल को बढ़ावा देना होगा। बाजार, स्कूल, घर, यात्रा, परिचय और सामान्य सामाजिक परिस्थितियों से जुड़े संवाद अभ्यास का हिस्सा बन सकते हैं।
तीसरी भाषा को लेकर लंबे समय से छात्रों और अभिभावकों के बीच पाठ्यक्रम के बोझ की चर्चा होती रही है। व्यावहारिक मूल्यांकन लागू होने पर विद्यार्थियों को केवल पाठ याद करने और लंबे उत्तर लिखने के बजाय भाषा को समझने और बोलने पर ध्यान देना होगा।
नई व्यवस्था में शिक्षक विद्यार्थियों से सामान्य सवाल पूछकर उनकी भाषा क्षमता का आकलन कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर अपना परिचय देना, परिवार के बारे में बताना, किसी स्थान का रास्ता पूछना या दैनिक जीवन की किसी परिस्थिति पर छोटी बातचीत करना मूल्यांकन का हिस्सा हो सकता है। इस बदलाव का उद्देश्य भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के साथ विद्यार्थियों को बहुभाषी बनाना भी है। भारत में अलग-अलग क्षेत्रों और राज्यों में विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं। ऐसे में स्कूल स्तर पर अतिरिक्त भाषा सीखने से विद्यार्थियों की संवाद क्षमता बढ़ सकती है।
हालांकि तीसरी भाषा का चयन, स्कूलों में उपलब्ध शिक्षक और अलग-अलग क्षेत्रों में भाषाओं की उपलब्धता जैसे व्यावहारिक सवाल भी महत्वपूर्ण होंगे। इसलिए नई व्यवस्था लागू करते समय स्कूलों के संसाधनों और विद्यार्थियों की जरूरतों को ध्यान में रखना आवश्यक होगा। CBSE की इस दिशा में पहल शिक्षा प्रणाली में परीक्षा केंद्रित पढ़ाई से कौशल आधारित मूल्यांकन की ओर बढ़ते बदलाव का हिस्सा है। यदि तीसरी भाषा में रोजमर्रा की बातचीत को मूल्यांकन का प्रमुख आधार बनाया जाता है तो विद्यार्थियों के लिए भाषा केवल परीक्षा पास करने वाला विषय नहीं बल्कि वास्तविक जीवन में इस्तेमाल होने वाला कौशल बन सकती है।
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