नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और संघर्ष के बीच नई दिल्ली में आयोजित 18वां BRICS शिखर सम्मेलन दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मंच बन गया है। भारत की मेजबानी में एक तरफ ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन पहुंचे हैं तो दूसरी तरफ संयुक्त अरब अमीरात का प्रतिनिधित्व अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान कर रहे हैं। सम्मेलन के दौरान ईरान और UAE के बीच संवाद ने इस सवाल को चर्चा के केंद्र में ला दिया है कि क्या भारत की धरती से पश्चिम एशिया में तनाव कम करने का कोई रास्ता निकल सकता है?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS के भीतर ईरान और UAE दोनों मौजूद हैं और पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों पर दोनों की अपनी रणनीतिक प्राथमिकताएं हैं। इसके बावजूद नई दिल्ली में BRICS देश एक साझा घोषणापत्र पर सहमत हुए हैं और क्षेत्रीय संघर्षों के समाधान के लिए संयम, बातचीत और कूटनीति पर जोर दिया है।
नई दिल्ली बनी कूटनीतिक बातचीत का मंच
BRICS Summit 2026 केवल आर्थिक सहयोग और ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा है। पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति ने सम्मेलन को शांति और सुरक्षा से जुड़ी बातचीत का बड़ा मंच भी बना दिया है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन सम्मेलन में व्यक्तिगत रूप से हिस्सा लेने नई दिल्ली पहुंचे हैं।
वहीं UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की ओर से अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं।
दोनों पक्षों की मौजूदगी भारत को ऐसी स्थिति देती है जहां वह अलग-अलग हित रखने वाले देशों के बीच संवाद को बढ़ावा दे सकता है।
BRICS ने दिया ‘Maximum Restraint’ का संदेश
BRICS देशों ने नई दिल्ली घोषणा में पश्चिम एशिया की बिगड़ती स्थिति पर गहरी चिंता जताई है।
घोषणा में सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने की अपील की गई है। साथ ही संघर्षों का समाधान संवाद, परामर्श और कूटनीति के माध्यम से निकालने पर जोर दिया गया है।
यह सहमति अपने आप में महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS के सदस्य देशों की पश्चिम एशिया को लेकर अलग-अलग रणनीतिक और राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं।
इसके बावजूद सभी देशों का एक साझा भाषा पर सहमत होना भारत की अध्यक्षता के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है।
मोदी-पेजेशकियन की मुलाकात भी अहम
BRICS Summit से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच भी महत्वपूर्ण बैठक हुई।
यह दोनों नेताओं की दो सप्ताह से भी कम समय में दूसरी मुलाकात थी।
प्रधानमंत्री मोदी ने बैठक में पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति पर चर्चा की और भारत का पुराना रुख दोहराया कि विवादों तथा संघर्षों का समाधान बातचीत और कूटनीति से होना चाहिए।
भारत ने क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता की आवश्यकता पर जोर दिया।
मोदी ने समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता, व्यापार की सुरक्षा और नाविकों की सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण बताया।
भारत के लिए क्यों जरूरी है पश्चिम एशिया में शांति?
भारत के लिए पश्चिम एशिया में शांति केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं है। इसका सीधा संबंध देश की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और लाखों भारतीय नागरिकों से है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े स्तर पर आयात पर निर्भर है।
पश्चिम एशिया दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल और गैस उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। इस क्षेत्र में युद्ध बढ़ने पर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है।
इसका सीधा असर भारत के आयात बिल, रुपये, महंगाई और पेट्रोल-डीजल की लागत पर पड़ सकता है।
यही कारण है कि भारत लगातार तनाव कम करने और बातचीत शुरू करने की वकालत करता रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे बड़ी चिंता
भारत की नजर खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य पर है।
यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में से एक है। पश्चिम एशिया से निकलने वाले तेल और गैस का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से वैश्विक बाजार तक पहुंचता है।
अगर क्षेत्रीय संघर्ष के कारण यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में बड़ा संकट पैदा हो सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ईरानी राष्ट्रपति के साथ बातचीत में freedom of navigation और commerce पर जोर देना इसी चिंता को दर्शाता है।
भारत चाहता है कि किसी भी परिस्थिति में समुद्री व्यापार बाधित न हो।
UAE भी भारत का बेहद अहम साझेदार
ईरान के साथ पुराने ऐतिहासिक संबंधों के साथ भारत के UAE से भी बेहद मजबूत रिश्ते हैं।
दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, ऊर्जा, रक्षा, तकनीक और लोगों के बीच संपर्क तेजी से बढ़ा है।
BRICS Summit के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद से भी मुलाकात की।
दोनों नेताओं ने रक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अंतरिक्ष, महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की।
भारत ने मजबूत भारत-UAE साझेदारी को क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण बताया।
ईरान और UAE दोनों से रिश्ते भारत की ताकत
भारत की कूटनीतिक स्थिति की खासियत यही है कि उसके ईरान और UAE दोनों से महत्वपूर्ण संबंध हैं।
ईरान भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। चाबहार बंदरगाह के जरिए भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का वैकल्पिक रास्ता मिलता है।
दूसरी तरफ UAE भारत के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक और निवेश साझेदारों में शामिल है।
लाखों भारतीय UAE में रहते और काम करते हैं।
इस कारण नई दिल्ली किसी एक पक्ष को चुनने के बजाय दोनों के साथ बातचीत बनाए रखने की नीति अपनाती है।
क्या भारत मध्यस्थ बन सकता है?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि भारत औपचारिक मध्यस्थ की भूमिका निभाने जा रहा है।
नई दिल्ली ने ऐसी किसी औपचारिक मध्यस्थता की घोषणा नहीं की है।
लेकिन भारत एक ऐसा संवाद मंच उपलब्ध करा सकता है जहां अलग-अलग पक्ष आमने-सामने बैठ सकें।
कूटनीति में कई बार बड़ी शांति प्रक्रिया की शुरुआत औपचारिक समझौते से नहीं बल्कि ऐसी छोटी मुलाकातों और बैक-चैनल बातचीत से होती है।
BRICS Summit ने कम से कम इतना जरूर किया है कि अलग-अलग पक्षों को एक ही शहर और एक ही बहुपक्षीय मंच पर बातचीत का अवसर मिला है।
BRICS के लिए भी बड़ी परीक्षा
पश्चिम एशिया का संकट BRICS की एकता की भी परीक्षा है।
समूह के विस्तार के बाद इसमें ऐसे देश शामिल हुए हैं जिनके क्षेत्रीय और रणनीतिक हित कई मामलों में एक-दूसरे से अलग हैं।
ईरान और UAE इसका प्रमुख उदाहरण हैं।
अगर BRICS इन मतभेदों के बावजूद शांति, समुद्री सुरक्षा और कूटनीतिक समाधान पर साझा रुख बना सकता है तो इससे संगठन की वैश्विक विश्वसनीयता बढ़ सकती है।
नई दिल्ली घोषणा पर सहमति इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
मोदी का संदेश बातचीत से निकले समाधान
भारत लगातार कहता रहा है कि युद्ध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
प्रधानमंत्री मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति के साथ बातचीत में भी इसी नीति को दोहराया।
भारत की कोशिश खुद को ऐसे देश के रूप में पेश करने की है जो अलग-अलग वैश्विक शक्तियों के साथ बातचीत कर सकता है।
नई दिल्ली के अमेरिका और यूरोप से मजबूत संबंध हैं। रूस के साथ उसकी पुरानी रणनीतिक साझेदारी है। ईरान से ऐतिहासिक रिश्ते हैं और UAE तथा दूसरे खाड़ी देशों के साथ आर्थिक और सुरक्षा संबंध तेजी से बढ़े हैं।
यह बहुआयामी कूटनीतिक नेटवर्क भारत को संवाद के लिए उपयोगी मंच बना सकता है।
तेल की कीमतों ने बढ़ाई भारत की चिंता
पश्चिम एशिया में तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर पहले ही दिखाई दे रहा है।
11 सितंबर को ब्रेंट क्रूड 104.61 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ और WTI भी 100 डॉलर के स्तर के आसपास पहुंच गया।
अगर तनाव और बढ़ता है तो कच्चा तेल और महंगा हो सकता है।
भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह गंभीर आर्थिक चुनौती होगी।
इसलिए पश्चिम एशिया में शांति भारत के लिए केवल आदर्शवादी कूटनीतिक लक्ष्य नहीं बल्कि आर्थिक आवश्यकता भी है।
भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भी प्राथमिकता
पश्चिम एशिया में लाखों भारतीय रहते हैं।
UAE, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, ओमान और दूसरे खाड़ी देशों में बड़ी भारतीय आबादी रोजगार से जुड़ी है।
किसी बड़े क्षेत्रीय युद्ध की स्थिति में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और निकासी भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
भारत ने पिछले संकटों में बड़े स्तर पर निकासी अभियान चलाए हैं।
इसलिए नई दिल्ली के लिए तनाव को बढ़ने से रोकना सीधे अपने नागरिकों के हित से भी जुड़ा है।
शांति का रास्ता आसान नहीं
हालांकि BRICS Summit में हुई मुलाकातों को लेकर उम्मीद बनी है, लेकिन पश्चिम एशिया की समस्या बेहद जटिल है।
इसमें केवल ईरान और UAE शामिल नहीं हैं।
अमेरिका, इजरायल, सऊदी अरब और क्षेत्र के कई दूसरे देशों के सुरक्षा और रणनीतिक हित भी जुड़े हुए हैं।
इसके अलावा परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध, समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे कई विवाद मौजूद हैं।
इसलिए नई दिल्ली में हुई एक या दो मुलाकातों से तुरंत शांति समझौते की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं होगा।
फिर भी नई दिल्ली का संदेश महत्वपूर्ण
कूटनीति में संवाद का रास्ता खुला रहना अपने आप में महत्वपूर्ण माना जाता है।
जब युद्ध और तनाव बढ़ता है तब ऐसे बहुपक्षीय मंचों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है जहां विरोधी या अलग-अलग खेमों के देश एक साथ मौजूद हों।
BRICS की नई संरचना इसे ऐसी क्षमता देती है।
भारत इस क्षमता का इस्तेमाल संगठन को टकराव का मंच बनाने के बजाय संवाद का मंच बनाने में करना चाहता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने भी BRICS को किसी के खिलाफ गठबंधन मानने से इनकार करते हुए इसे सहयोग और ग्लोबल साउथ की आवाज का मंच बताया है।
नई दिल्ली घोषणा ने बढ़ाई उम्मीद
BRICS देशों द्वारा पश्चिम एशिया पर साझा भाषा स्वीकार करना सबसे सकारात्मक संकेत माना जा सकता है।
समूह ने संघर्ष पर चिंता जताते हुए अधिकतम संयम और कूटनीतिक समाधान की अपील की है।
ईरान स्वयं BRICS सदस्य है और UAE भी समूह का हिस्सा है। ऐसे में दोनों से स्वीकार्य साझा घोषणा तैयार होना आसान नहीं था।
यही कारण है कि नई दिल्ली घोषणा को भारत की कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है।
क्या भारत से निकलेगा शांति का फॉर्मूला?
अभी इसका निश्चित जवाब देना संभव नहीं है।
भारत ने किसी औपचारिक शांति वार्ता की घोषणा नहीं की है और न ही पश्चिम एशिया के सभी पक्ष नई दिल्ली में किसी समझौते पर पहुंचे हैं।
लेकिन BRICS Summit ने संवाद के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक जगह जरूर बनाई है।
ईरान के राष्ट्रपति का भारत आना, UAE के शीर्ष नेतृत्व का प्रतिनिधित्व, मोदी की दोनों पक्षों के साथ बातचीत और BRICS की साझा शांति अपील—ये सभी घटनाक्रम संकेत देते हैं कि नई दिल्ली तनाव कम करने के लिए सक्रिय कूटनीतिक भूमिका निभाना चाहती है।
अगर आने वाले दिनों में इन मुलाकातों से आगे बैक-चैनल बातचीत या औपचारिक वार्ता शुरू होती है तो BRICS Summit 2026 को पश्चिम एशिया के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मोड़ के रूप में देखा जा सकता है।
फिलहाल इतना साफ है कि युद्ध और तनाव के बीच नई दिल्ली से संदेश निकला है—**संघर्ष का समाधान हथियारों से नहीं बल्कि संवाद, संयम और कूटनीति से तलाशा जाना चाहिए।**