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मोदी के लिए क्यों खास है नई दिल्ली घोषणापत्र जानें BRICS के बड़े फैसले
Ratna Netam
12 Sept 2026 5:47 PM IST

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नई दिल्ली। भारत की मेजबानी में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के पहले दिन **New Delhi Declaration 2026** पर सहमति बनना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय कूटनीति के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इसकी वजह केवल यह नहीं है कि सभी सदस्य देशों ने एक संयुक्त घोषणापत्र स्वीकार किया, बल्कि यह भी है कि मौजूदा वैश्विक तनाव, पश्चिम एशिया के युद्ध और BRICS के भीतर अलग-अलग रणनीतिक हितों के बावजूद सर्वसम्मति बनाई गई।
BRICS अब पहले वाला पांच देशों का छोटा समूह नहीं रह गया है। इसके सदस्य देशों की संख्या बढ़ चुकी है और उनके हित भी काफी विविध हैं। भारत, चीन, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका के अलावा ईरान, UAE, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया जैसे देश भी इसका हिस्सा हैं। ऐसे में सभी को एक साझा भाषा पर सहमत कराना अपने आप में चुनौतीपूर्ण था।
यही वजह है कि नई दिल्ली घोषणापत्र को भारत की अध्यक्षता की सबसे अहम उपलब्धियों में गिना जा रहा है।
घोषणापत्र का सबसे बड़ा संदेश क्या है?
नई दिल्ली घोषणापत्र का केंद्रीय संदेश है कि BRICS खुद को किसी देश के खिलाफ सैन्य या राजनीतिक गठबंधन के रूप में पेश नहीं करना चाहता। इसका जोर वैश्विक संस्थाओं में सुधार, विकासशील देशों की आवाज मजबूत करने, व्यापार और वित्तीय सहयोग बढ़ाने और वैश्विक संघर्षों का समाधान संवाद के जरिए निकालने पर है।
भारत लंबे समय से BRICS को एक constructive और solutions-oriented मंच के रूप में पेश करता रहा है। 2026 की भारतीय अध्यक्षता की थीम भी **Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability** रखी गई है।
UNSC सुधार पर जोर
घोषणापत्र और शिखर सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण बातों में वैश्विक संस्थाओं में सुधार का मुद्दा शामिल है।
प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC के ढांचे को मौजूदा वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप बदलने की जरूरत दोहराई। भारत लंबे समय से स्थायी सदस्यता और विकासशील देशों के बेहतर प्रतिनिधित्व की मांग करता रहा है।
मोदी और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की बैठक में भी दोनों नेताओं ने बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और UNSC सहित बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की जरूरत पर जोर दिया।
भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS के मंच से इस मुद्दे को उठाने से UNSC सुधार की उसकी मांग को अतिरिक्त राजनीतिक वजन मिलता है।
ग्लोबल साउथ की आवाज
नई दिल्ली घोषणापत्र में ग्लोबल साउथ को मजबूत प्रतिनिधित्व देने की सोच भी प्रमुख है।
भारत का तर्क है कि दुनिया की बड़ी आबादी एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में रहती है, लेकिन वैश्विक वित्तीय और राजनीतिक संस्थाओं में इन देशों की भागीदारी उनकी वास्तविक आर्थिक और जनसांख्यिकीय ताकत के अनुपात में नहीं है।
BRICS के सदस्य अब दुनिया की बड़ी आबादी, वैश्विक GDP और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत सरकार के मुताबिक सदस्य देश करीब आधी वैश्विक आबादी, लगभग 40 प्रतिशत वैश्विक GDP और करीब 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं।
ऐसे में BRICS खुद को ग्लोबल साउथ के लिए एक मजबूत आवाज के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
IMF और World Bank में सुधार
BRICS के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक प्रमुखों ने भी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार की मांग की है।
संयुक्त बयान में IMF और World Bank जैसी संस्थाओं को ज्यादा प्रतिनिधित्वपूर्ण, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने पर जोर दिया गया।
यह भारत की उस पुरानी मांग से मेल खाता है जिसमें उभरती अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक आर्थिक फैसलों में ज्यादा भूमिका देने की बात कही जाती रही है।
इस मुद्दे पर BRICS की साझा आवाज भारत के लिए कूटनीतिक रूप से फायदेमंद है।
पश्चिम एशिया पर सहमति सबसे मुश्किल
नई दिल्ली घोषणापत्र की सबसे बड़ी परीक्षा पश्चिम एशिया का संकट था।
ईरान BRICS का सदस्य है जबकि UAE का ईरान के साथ मौजूदा संघर्ष को लेकर बेहद अलग दृष्टिकोण है। हालिया क्षेत्रीय तनाव ने दोनों देशों के रिश्तों को और कठिन बनाया है।
इसी कारण सम्मेलन से पहले यह सवाल था कि क्या BRICS सदस्य देश साझा घोषणापत्र पर सहमत हो पाएंगे।
लेकिन आखिरकार सभी देशों ने एक ऐसी भाषा पर सहमति बनाई जिसमें किसी खास देश का नाम लिए बिना एकतरफा आक्रामक कार्रवाई की निंदा की गई और संवाद तथा कूटनीति पर जोर दिया गया।
यही सहमति भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता मानी जा रही है।
रूस और चीन को साथ रखना बड़ी चुनौती
BRICS के भीतर रूस और चीन की रणनीतिक प्राथमिकताएं कई मामलों में भारत से अलग हो सकती हैं।
रूस BRICS को पश्चिमी प्रभाव का मुकाबला करने वाले मजबूत आर्थिक और राजनीतिक मंच के रूप में देखता है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी समूह को तकनीक, भुगतान, इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश के क्षेत्र में अधिक व्यावहारिक गठबंधन बनाने की बात कही।
चीन भी BRICS को ग्लोबल साउथ के नेतृत्व वाले मंच के रूप में आगे बढ़ाना चाहता है और पश्चिम एशिया में समूह की शांति स्थापित करने वाली भूमिका की वकालत कर रहा है।
भारत की रणनीति अलग है। वह BRICS को किसी विरोधी गुट की छवि से बचाते हुए आर्थिक और विकास सहयोग के मंच के रूप में आगे बढ़ाना चाहता है।
इन अलग-अलग सोचों के बावजूद घोषणापत्र पर सहमति बनना भारत की मध्यस्थ भूमिका को मजबूत करता है।
स्थानीय मुद्राओं में व्यापार
नई दिल्ली में हुई BRICS बैठकों का आर्थिक एजेंडा भी बेहद महत्वपूर्ण रहा।
भारत ने सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और भुगतान प्रणालियों को जोड़ने पर जोर दिया है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने BRICS देशों से आपसी बाजार पहुंच आसान करने, नियामकीय बाधाएं कम करने और भुगतान प्रणालियों को अधिक interoperable बनाने की बात कही।
BRICS वित्त मंत्रियों ने भी तेज, सुरक्षित और कम लागत वाले cross-border payments को बढ़ावा देने की जरूरत जताई।
इससे डॉलर पर निर्भरता कम करने की बहस को नई गति मिल सकती है।
क्या BRICS अपनी मुद्रा लाएगा?
BRICS मुद्रा को लेकर अक्सर चर्चा होती है, लेकिन अभी कोई साझा मुद्रा घोषित नहीं की गई है।
फिलहाल फोकस स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, भुगतान प्रणालियों को जोड़ने और संभावित डिजिटल करेंसी कनेक्टिविटी पर अधिक है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार भी BRICS देशों के बीच सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी को जोड़ने की संभावनाओं पर नजर रख रहा है।
इसलिए यह कहना गलत होगा कि नई दिल्ली घोषणापत्र ने कोई नई BRICS मुद्रा शुरू कर दी है।
व्यापारिक प्रतिबंधों पर भी संदेश
BRICS देशों ने एकतरफा व्यापार और वित्तीय प्रतिबंधों को लेकर भी चिंता जताई है।
वित्त मंत्रियों के संयुक्त बयान में ऐसे टैरिफ और वित्तीय कदमों की आलोचना की गई जिन्हें WTO नियमों के खिलाफ माना गया।
भारत के लिए यह मुद्दा महत्वपूर्ण है क्योंकि वह वैश्विक व्यापार में नियम आधारित व्यवस्था और अधिक संतुलित व्यापार की वकालत करता है।
इसके साथ ही भारत ने BRICS के भीतर अपने व्यापार घाटे को कम करने के लिए बाजार पहुंच और संतुलित व्यापार की भी मांग की है।
डिजिटल और टेक सहयोग
2026 की भारतीय अध्यक्षता में नवाचार और डिजिटल सहयोग को भी प्राथमिकता मिली है।
भारत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टार्टअप, AI और तकनीकी साझेदारी को BRICS सहयोग का बड़ा क्षेत्र बनाना चाहता है।
BRICS Business Forum में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि समूह और उसके पार्टनर देश मिलकर दुनिया की लगभग 50 प्रतिशत आबादी, 40 प्रतिशत GDP और 25 प्रतिशत से ज्यादा व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने बिजनेस, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन को आपसी सहयोग का प्रमुख आधार बताया।
समुद्री सुरक्षा पर भारत का फोकस
भारत के लिए ऊर्जा और समुद्री व्यापार सुरक्षा भी बड़ी प्राथमिकता रही।
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ बातचीत में मोदी ने freedom of navigation, समुद्री व्यापार और नाविकों की सुरक्षा पर जोर दिया।
पश्चिम एशिया के मौजूदा तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका के बीच यह मुद्दा भारत के लिए सीधे आर्थिक हित से जुड़ा है।
भारत बड़ी मात्रा में तेल आयात करता है, इसलिए सुरक्षित समुद्री मार्ग उसके लिए बेहद जरूरी हैं।
भारत-चीन संबंधों के लिए भी बड़ा मंच
BRICS Summit 2026 का एक बड़ा पहलू चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का सात साल बाद भारत आना भी है।
2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के रिश्तों में गंभीर तनाव आया था। हालांकि 2024 के बाद से धीरे-धीरे संबंधों में सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई है।
शी जिनपिंग की नई दिल्ली यात्रा और मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक को इसी सुधार प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है।
भारत के लिए यह कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है कि वह सीमा विवाद के बावजूद चीन को बहुपक्षीय मंच पर बातचीत में बनाए रख सके।
मोदी के लिए क्यों बड़ी सफलता?
प्रधानमंत्री मोदी के लिए नई दिल्ली घोषणापत्र की सफलता कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है।
पहला, भारत ने बेहद विविध सदस्य देशों के बीच सर्वसम्मति बनाई।
दूसरा, UNSC और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे भारत के पुराने मुद्दों को BRICS एजेंडे में प्रमुखता मिली।
तीसरा, BRICS को पश्चिम विरोधी गठबंधन बनाने के बजाय ग्लोबल साउथ और विकास के मंच के रूप में पेश करने की भारत की कोशिश सफल दिखाई देती है।
चौथा, पश्चिम एशिया के गंभीर तनाव के बावजूद ईरान और UAE जैसे अलग-अलग पक्षों को साझा घोषणापत्र पर सहमत कराया गया।
और पांचवां, भारत ने रूस और चीन के साथ रिश्ते संभालते हुए पश्चिमी देशों के साथ अपनी साझेदारी को प्रभावित किए बिना रणनीतिक संतुलन दिखाने की कोशिश की।
भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ कूटनीति
भारत की विदेश नीति को अक्सर strategic autonomy या multi-alignment के रूप में देखा जाता है।
भारत अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भी मजबूत साझेदारी रखता है, लेकिन साथ ही रूस के साथ पुराने संबंध बनाए हुए है और BRICS तथा SCO जैसे मंचों पर चीन और ईरान के साथ भी काम करता है।
नई दिल्ली BRICS Summit इसी रणनीति का उदाहरण है।
भारत किसी एक वैश्विक शक्ति खेमे में पूरी तरह जाने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है।
क्या BRICS वास्तव में मजबूत हुआ?
नई दिल्ली घोषणापत्र ने BRICS की एकजुटता तो दिखाई है, लेकिन समूह के भीतर चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं।
सदस्य देशों के बीच भू-राजनीतिक मतभेद मौजूद हैं। चीन और भारत के अपने सीमा विवाद हैं। ईरान और UAE के संबंध तनावपूर्ण हैं। रूस पर पश्चिमी प्रतिबंध हैं और समूह के आर्थिक हित भी अलग-अलग हैं।
इसलिए असली परीक्षा घोषणापत्र के बाद होगी।
क्या सदस्य देश घोषित लक्ष्यों को जमीन पर लागू कर पाएंगे? क्या भुगतान प्रणाली, व्यापार, निवेश और वैश्विक संस्थाओं में सुधार पर ठोस प्रगति होगी? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में मिलेंगे।
फिलहाल भारत के लिए बड़ी उपलब्धि यह है कि तमाम मतभेदों के बावजूद नई दिल्ली में BRICS देश एक साझा घोषणापत्र पर सहमत हुए हैं।
यही कारण है कि **New Delhi Declaration 2026 को भारत की अध्यक्षता और प्रधानमंत्री मोदी की बहुपक्षीय कूटनीति की बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।**
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