नई दिल्ली। भारत की मेजबानी में हो रहे 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के बीच एक बड़ी कूटनीतिक सफलता सामने आई है। सदस्य देश लंबे और बेहद कठिन दौर की बातचीत के बाद साझा घोषणापत्र पर सहमति बनाने में कामयाब हुए हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और सदस्य देशों के अलग-अलग हितों के कारण संयुक्त बयान पर सहमति बनाना आसान नहीं था। वार्ताकारों के बीच बातचीत शुक्रवार रात से शनिवार तड़के करीब चार बजे तक चलती रही। आखिरकार ऐसा फॉर्मूला तैयार किया गया जिस पर सदस्य देशों के बीच सहमति बन सकी।
भारत के लिए यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह 2026 में BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और नई दिल्ली में शिखर सम्मेलन की मेजबानी भी भारत के हाथ में है। किसी बड़े बहुपक्षीय सम्मेलन में साझा घोषणापत्र जारी होना मेजबान देश की कूटनीतिक क्षमता की महत्वपूर्ण परीक्षा माना जाता है।
इस बार चुनौती सामान्य से कहीं ज्यादा कठिन थी। पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण BRICS के भीतर ही अलग-अलग सदस्य देशों के हित और दृष्टिकोण टकरा रहे थे। इसके बावजूद भारत की अध्यक्षता में चली बातचीत आखिरकार सहमति तक पहुंच गई।
सुबह 4 बजे तक क्यों चली बातचीत?
BRICS का साझा बयान तैयार करने के लिए सदस्य देशों के शेरपा और वरिष्ठ वार्ताकार कई दिनों से बातचीत कर रहे थे। सबसे कठिन सवाल पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर था।
ईरान BRICS का सदस्य है, जबकि संयुक्त अरब अमीरात भी समूह का हिस्सा है। क्षेत्रीय संघर्ष के कारण दोनों देशों की प्राथमिकताओं और चिंताओं को एक ही दस्तावेज में समाहित करना चुनौतीपूर्ण था।
वार्ताकारों को ऐसी भाषा तलाशनी थी जिसे सभी सदस्य स्वीकार कर सकें। किसी एक पक्ष के पक्ष या विरोध में बहुत स्पष्ट शब्द इस्तेमाल करने से सहमति टूटने का खतरा था।
यही कारण है कि बातचीत देर रात तक खिंची और शनिवार सुबह लगभग चार बजे तक माथापच्ची चलती रही।
किस फॉर्मूले पर बनी सहमति?
रिपोर्टों के मुताबिक घोषणापत्र में किसी विशेष देश का नाम लिए बिना एकतरफा युद्ध या आक्रामक कार्रवाई की निंदा करने वाली भाषा शामिल होने की संभावना है।
यह कूटनीतिक भाषा महत्वपूर्ण है। इससे BRICS पश्चिम एशिया में युद्ध और अस्थिरता को लेकर अपना सामूहिक रुख रख सकता है, लेकिन किसी एक सदस्य को ऐसी स्थिति में नहीं डालता जहां उसके लिए दस्तावेज पर सहमत होना मुश्किल हो जाए।
बहुपक्षीय कूटनीति में ऐसे शब्दों का चयन बेहद सावधानी से किया जाता है। एक शब्द या वाक्य भी कई घंटे की बातचीत का कारण बन सकता है क्योंकि हर देश अपनी विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर दस्तावेज को देखता है।
भारत के लिए क्यों बड़ी सफलता?
BRICS 2026 की अध्यक्षता भारत के पास है। ऐसे में सम्मेलन को सफलतापूर्वक आयोजित करने के साथ सभी सदस्य देशों को साझा घोषणापत्र पर सहमत कराना भी नई दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण था।
भारत ने अपनी विदेश नीति में लंबे समय से संवाद और कूटनीति के जरिए विवादों के समाधान पर जोर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के साथ बातचीत में भी पश्चिम एशिया में स्थायी शांति और स्थिरता की जरूरत दोहराई है।
भारत की चुनौती यह थी कि उसे ऐसे देशों को एक मंच पर साथ लेकर चलना था जिनके आपसी हित कई मामलों में एक-दूसरे से अलग हैं।
ऐसे माहौल में सर्वसम्मति वाला दस्तावेज तैयार होना भारत की बहुपक्षीय कूटनीति के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
पहले क्यों अटक गया था मामला?
शिखर सम्मेलन से पहले ही यह संकेत मिल रहे थे कि साझा घोषणापत्र तैयार करना इस बार बेहद मुश्किल होगा।
BRICS के वरिष्ठ वार्ताकार पश्चिम एशिया पर इस्तेमाल होने वाली भाषा को लेकर लगातार चर्चा कर रहे थे। प्रमुख सवाल यह था कि संघर्ष की निंदा किस तरह की जाए और क्या किसी देश का स्पष्ट नाम लिया जाए।
भारत की कोशिश एक ऐसा 'लैंडिंग जोन' तलाशने की थी जहां अलग-अलग विचार रखने वाले सदस्य भी सहमत हो सकें।
समूह का विस्तार होने के बाद यह चुनौती और बढ़ गई है। ज्यादा सदस्य होने का अर्थ ज्यादा राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक हित भी हैं। ऐसे में सर्वसम्मति बनाना पहले की तुलना में अधिक जटिल हो गया है।
BRICS का विस्तार बना ताकत और चुनौती दोनों
BRICS की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन के समूह के रूप में हुई थी। बाद में दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल हुआ। इसके बाद समूह का और विस्तार हुआ तथा मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE और इंडोनेशिया जैसे देश सदस्य बने।
समूह के विस्तार से इसकी आर्थिक और राजनीतिक ताकत बढ़ी है। आज BRICS और उसके साझेदार देशों का वैश्विक आबादी और अर्थव्यवस्था में बड़ा हिस्सा है।
लेकिन विविधता बढ़ने से किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर एक समान रुख तैयार करना भी मुश्किल हो गया है।
किसी देश के अमेरिका के साथ मजबूत संबंध हैं तो किसी के रूस या चीन के साथ। पश्चिम एशिया के देशों के अपने क्षेत्रीय हित हैं। भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर चलता है। इसलिए हर महत्वपूर्ण शब्द पर सहमति जरूरी होती है।
आतंकवाद भी घोषणापत्र का अहम मुद्दा
नई दिल्ली घोषणापत्र में आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख भी महत्वपूर्ण विषय रहने की उम्मीद है। भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों के खिलाफ स्पष्ट कार्रवाई की मांग करता रहा है।
इसके अलावा वैश्विक शासन संस्थाओं में सुधार का मुद्दा भी BRICS के एजेंडे का प्रमुख हिस्सा है।
भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में विकासशील देशों की अधिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व की वकालत करता रहा है।
BRICS का विस्तार भी ग्लोबल साउथ की आवाज को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में ज्यादा प्रभावशाली बनाने की कोशिश के रूप में देखा जाता है।
UNSC सुधार पर भी भारत की नजर
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है। BRICS के नई दिल्ली घोषणापत्र में वैश्विक संस्थाओं में सुधार और भारत की बड़ी भूमिका के समर्थन से जुड़े संकेत नई दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
भारत का तर्क है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाई गई वैश्विक संस्थाओं की संरचना आज की दुनिया की वास्तविकताओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती।
अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों का वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्व तेजी से बढ़ा है। इसलिए उन्हें निर्णय लेने वाली संस्थाओं में भी उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
व्यापार और भुगतान पर भी चर्चा
BRICS का एजेंडा केवल युद्ध और भू-राजनीति तक सीमित नहीं है। सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश और सीमा पार भुगतान को आसान बनाने पर भी चर्चा चल रही है।
BRICS देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक प्रमुखों ने सीमा पार भुगतान को अधिक आसान, सस्ता और सुरक्षित बनाने के उपायों पर चर्चा की है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल भी एजेंडे में शामिल है।
भारत ने BRICS देशों के बीच व्यापार के लिए स्थिर, पारदर्शी और भरोसेमंद माहौल बनाने पर जोर दिया है।
भारत की 'बैलेंसिंग डिप्लोमेसी' की परीक्षा
नई दिल्ली में हो रहा सम्मेलन भारत की संतुलित विदेश नीति की बड़ी परीक्षा भी है।
एक ही मंच पर रूस, चीन, ईरान, UAE और अन्य देशों के शीर्ष नेता मौजूद हैं। इनमें से कई देशों के अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ संबंध बिल्कुल अलग-अलग हैं।
भारत के अमेरिका और यूरोप के साथ रणनीतिक रिश्ते मजबूत हुए हैं। वहीं रूस के साथ उसके दशकों पुराने संबंध कायम हैं। चीन के साथ सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद दोनों देश BRICS और SCO में साथ काम करते हैं। पश्चिम एशिया में भारत के ईरान और खाड़ी देशों दोनों के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं।
इसलिए भारत की कोशिश किसी एक खेमे का पक्ष लेने के बजाय अलग-अलग देशों के बीच संवाद का रास्ता बनाए रखने की रही है।
साझा बयान से BRICS को क्या फायदा?
किसी शिखर सम्मेलन के अंत में साझा घोषणापत्र केवल औपचारिक दस्तावेज नहीं होता। इससे पता चलता है कि सदस्य देश बड़े वैश्विक मुद्दों पर कम से कम न्यूनतम साझा सहमति बनाने में सक्षम हैं।
अगर सम्मेलन बिना साझा बयान के समाप्त होता तो BRICS के भीतर मतभेदों को लेकर सवाल उठते। खासकर समूह के विस्तार के बाद यह कहा जा सकता था कि अधिक सदस्य होने से संगठन सामूहिक निर्णय लेने में कमजोर हो रहा है।
सहमति बनने से BRICS यह संदेश देने की स्थिति में है कि आंतरिक मतभेदों के बावजूद सदस्य बातचीत और समझौते के जरिए साझा रास्ता निकाल सकते हैं।
नई दिल्ली के खाते में कूटनीतिक उपलब्धि
सुबह चार बजे तक चली बातचीत के बाद साझा घोषणापत्र पर बनी सहमति भारत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। मेजबान और अध्यक्ष के रूप में नई दिल्ली के सामने केवल सम्मेलन आयोजित करने की जिम्मेदारी नहीं थी, बल्कि राजनीतिक रूप से अलग-अलग ध्रुवों पर खड़े देशों को साझा दस्तावेज तक पहुंचाना भी चुनौती थी।
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने इस काम को और कठिन बनाया। इसके बावजूद वार्ताकार किसी खास देश का नाम लिए बिना युद्ध और आक्रामकता पर सामूहिक चिंता व्यक्त करने वाले फॉर्मूले तक पहुंचने में सफल रहे।
अब सभी की नजर BRICS नेताओं द्वारा अनुमोदित अंतिम नई दिल्ली घोषणापत्र पर होगी। अंतिम दस्तावेज की भाषा से स्पष्ट होगा कि पश्चिम एशिया, आतंकवाद, वैश्विक संस्थाओं में सुधार, व्यापार और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर BRICS ने किस तरह का साझा रुख अपनाया है।
फिलहाल इतना साफ है कि बेहद कठिन बातचीत के बाद सहमति बनना भारत की अध्यक्षता के लिए राहत और कूटनीतिक सफलता दोनों है। यह ऐसे समय में हुआ है जब दुनिया कई संघर्षों और भू-राजनीतिक तनावों से गुजर रही है और BRICS खुद पहले से कहीं ज्यादा बड़ा तथा विविध समूह बन चुका है।
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