- Home
- /
- दिल्ली-एनसीआर
- /
- रातभर चली वार्ता के...
रातभर चली वार्ता के बाद ब्रिक्स घोषणा पर सहमति भारत की कूटनीति की बड़ी परीक्षा

नई दिल्ली। नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति बनने की खबर सामने आई है। पश्चिम एशिया के संघर्ष और सदस्य देशों के अलग-अलग रुख के कारण इस दस्तावेज को अंतिम रूप देना भारत के लिए चुनौतीपूर्ण था। विशेष रूप से ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच तनाव ने बातचीत को जटिल बनाया। सम्मेलन शुरू होने से पहले घोषणापत्र पर सहमति की जानकारी सामने आने को भारतीय अध्यक्षता की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है। हालांकि, सहमति बनने और नेताओं द्वारा अंतिम दस्तावेज औपचारिक रूप से स्वीकार किए जाने के बीच अंतर है। रॉयटर्स
संयुक्त बयान को लेकर दिए गए विवरण में सुबह चार बजे तक मंथन चलने की बात कही गई है। उपलब्ध स्वतंत्र रिपोर्टों में भी वार्ताकारों के रातभर काम करने का उल्लेख मिलता है। बातचीत का सबसे कठिन हिस्सा पश्चिम एशिया के युद्ध पर साझा भाषा तैयार करना था। ईरान और खाड़ी देशों के सुरक्षा हित तथा संघर्ष को देखने का नजरिया अलग होने के कारण ऐसा मसौदा बनाना जरूरी था, जिसे सभी संबंधित पक्ष स्वीकार कर सकें। इसी वजह से घोषणापत्र के इस हिस्से पर विशेष मेहनत करनी पड़ी। वेना न्यूज
भारत 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। भारतीय अध्यक्षता का विषय लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता पर केंद्रित है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस वर्ष अध्यक्षता के तहत देश के 25 से अधिक शहरों में 350 से ज्यादा बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। सम्मेलन का उद्देश्य राजनीतिक तथा सुरक्षा सहयोग, आर्थिक साझेदारी और लोगों के बीच संपर्क को आगे बढ़ाना है।
संयुक्त घोषणा पर समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मई में हुई ब्रिक्स की मंत्रिस्तरीय बैठक साझा बयान जारी नहीं कर सकी थी। पश्चिम एशिया के संघर्ष को लेकर मतभेद उस समय भी सामने आए थे। ऐसे में नेताओं के सम्मेलन से पहले फिर वही स्थिति बनने का जोखिम था। अध्यक्ष देश के रूप में भारत के सामने जिम्मेदारी थी कि विवादास्पद मुद्दे पूरे समूह के व्यापक सहयोग एजेंडे को बाधित न करें। रातभर चली बातचीत इसी पृष्ठभूमि में विशेष महत्व रखती है।
इस तरह की बहुपक्षीय बातचीत में सहमति का अर्थ सभी देशों की विदेश नीति एक जैसी हो जाना नहीं होता। आम तौर पर वार्ताकार ऐसे सिद्धांत तलाशते हैं, जिन पर अलग-अलग पक्ष साथ आ सकें। किसी संघर्ष के लिए जिम्मेदारी तय करने वाली भाषा पर मतभेद हो सकते हैं, जबकि संवाद, स्थिरता और नागरिकों की सुरक्षा जैसी व्यापक प्राथमिकताओं पर साझा आधार मिल सकता है। उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर यह समझा जा सकता है कि भारत के सामने चुनौती सभी पक्षों की संवेदनशीलताओं के बीच स्वीकार्य शब्दावली तैयार करने की थी।
भारत की द्विपक्षीय बातचीत भी इसी समय जारी रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन से पहले ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से मुलाकात की। बातचीत में उन्होंने नौवहन की स्वतंत्रता, समुद्री व्यापार और नाविकों की सुरक्षा का महत्व रेखांकित किया। मोदी ने संघर्षों के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति पर भारत का जोर दोहराया। हालांकि, इस बैठक को संयुक्त घोषणा पर सहमति का एकमात्र कारण बताने के लिए पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है।
घोषणापत्र का एजेंडा पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है। संभावित प्रमुख विषयों में आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख, वैश्विक शासन संस्थाओं में सुधार और बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करना शामिल है। विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में पर्याप्त स्थान दिलाना भी महत्वपूर्ण विषय है। रिपोर्ट में भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की दावेदारी के समर्थन और विकास अनुभव साझा करने जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया है। इन विषयों को अंतिम घोषणा की औपचारिक पुष्टि के साथ पढ़ना आवश्यक होगा।
ब्रिक्स को संवाद और रचनात्मक सहयोग के मंच के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश भी इस प्रक्रिया का हिस्सा है। समूह में अलग राजनीतिक व्यवस्थाएं, आर्थिक प्राथमिकताएं और रणनीतिक रिश्ते रखने वाले देश शामिल हैं। इसलिए साझा बयान तैयार करते समय अध्यक्षता को किसी एक विवाद के साथ पूरे सहयोग कार्यक्रम का संतुलन बनाए रखना पड़ता है। भारत के लिए घोषणा पर सहमति का महत्व इसी में है कि मतभेदों के बावजूद सदस्य साझा मंच पर आगे बढ़ने की इच्छा दिखा रहे हैं। यह निष्कर्ष उपलब्ध बातचीत संबंधी रिपोर्टों का आकलन है।
अब अंतिम घोषणापत्र की शब्दावली से स्पष्ट होगा कि पश्चिम एशिया के संघर्ष और अन्य संवेदनशील मुद्दों पर किस सीमा तक सहमति बनी है। किसी दस्तावेज को स्वीकार करना क्षेत्रीय विवादों का समाधान नहीं करता, लेकिन संवाद जारी रखने का आधार प्रदान कर सकता है। भारत की अध्यक्षता के लिए यह महत्वपूर्ण पड़ाव है। आगे इसकी उपयोगिता इस बात से तय होगी कि साझा घोषणाओं को आर्थिक सहयोग, संस्थागत सुधार और विकास साझेदारियों में कितना बदला जाता है।





